उत्तम पुरुष में कभी दीनता नहीं आती : श्रमण संघीय प्रवर्तक श्री प्रकाशमुनिजी म.सा.
लिमड़ी श्रीसंघ द्वारा चातुर्मास पश्चात लिमड़ी पधारने की विनती की गई
रतलाम, 30 सितंबर(सम्यक दृष्टि, प्रकाश मूणत) मालव केसरी पूज्य गुरुदेव सौभाग्यमलजी म.सा. के सुशिष्य, रत्नपुरी के रत्न, श्रमण संघीय प्रवर्तक पूज्य श्री प्रकाशमुनिजी म.सा. निर्भय की पावन निश्रा में श्री सौभाग्य प्रकाश दरबार में इन दिनों तपस्या की झड़ी लगी हुई है। तप चक्रेश्वरी वीर वागेश्वरी पूज्या महासती श्री चंद्रयशाजी म.सा. ने 56 उपवास की कठिन तप आराधना पूर्ण कर ली है। चातुर्मास के दौरान अब तक 15 मासक्षमण सहित अनेक कठिन तपस्याएं पूर्ण हो चुकी हैं। तपस्वियों की इस साधना से धर्मनगरी रतलाम में आध्यात्मिक वातावरण बना हुआ है।
बुधवार को गुजरात से लिमड़ी श्रीसंघ का प्रतिनिधिमंडल प्रवर्तकश्री के दर्शन-वंदन के लिए रतलाम पहुंचा। श्रीसंघ ने चातुर्मास पश्चात् प्रवर्तकश्री से लिमड़ी पधारने की विनती की। लिमड़ी श्रीसंघ की ओर से संघ प्रमुख हंसमुख लाल गोलेचा, राजू भाई कर्णावत सहित अन्य श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे। संघ सदस्यों ने प्रवर्तकश्री के समक्ष अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए लिमड़ी आगमन का निवेदन किया।
तप आराधना करने वाले तपस्वीयों के हुए प्रत्याख्यान व बहुमान
धर्मसभा में तप आराधनाओं का क्रम भी जारी रहा। प्रवर्तकश्री से अनिता विकास चौपड़ा ने 31 उपवास के प्रत्याख्यान लिए। चातुर्मास आयोजन समिति एवं श्रीसंघ की ओर से मासक्षमण जैसी दीर्घ तप आराधना करने पर तपस्वी का बहुमान किया गया। वहीं पूजा-हेमंत गंग एवं मोनिका-लोकेश मेहता ने 26 उपवास के प्रत्याख्यान लिए। जोली-राजेंद्र गादिया सहित अन्य तपस्वियों ने 24 उपवास तथा केतन-सुनील गांधी, माला जैन एवं मुस्कान-महेश कटकानी ने 23-23 उपवास के प्रत्याख्यान ग्रहण किए। कई तपस्वियों ने सिद्धि तप, उपवास, एकासन, एकांतर उपवास, निरंतर एकासन आदि विभिन्न तप आराधनाओं के प्रत्याख्यान भी लिए।
संकल्प दृढ़ हो तो सफलता अवश्य मिलती है
मोहन टॉकीज स्थित श्री सौभाग्य प्रकाश दरबार में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए प्रवर्तक श्री प्रकाशमुनिजी म.सा. ने कहा कि उत्तम में उत्तम पुरुष वे होते हैं, जिनके जीवन में कभी दीनता नहीं आती। भगवान ने भी जीवन में अनेक कष्ट सहे, लेकिन उन्होंने कभी दीनता नहीं दिखाई। मनुष्य के जीवन में परिस्थितियां कैसी भी हों, उसे अपने संकल्प और उत्साह को बनाए रखना चाहिए।
उन्होंने कहा कि यदि संकल्प दृढ़ हो और कार्य उत्साह के साथ किया जाए तो सफलता अवश्य मिलती है। धर्म साधना का क्षेत्र भी ऐसा ही है। साधक को उत्साहपूर्वक निरंतर आगे बढ़ते रहना चाहिए। यह मानकर चलना चाहिए कि सच्ची साधना कभी निष्फल नहीं होती। साधना के मार्ग पर आने वाली कठिनाइयां व्यक्ति के मनोबल को कमजोर करने के लिए नहीं, बल्कि उसकी आंतरिक शक्ति को जागृत करने के लिए आती हैं।
प्रवर्तकश्री ने कहा कि जब भक्ति भाव से साधना की जाती है तो भगवान का नाम लेने मात्र से शरीर में ऊर्जा का संचार होने लगता है। श्रद्धा और भक्ति के साथ की गई साधना व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाती है। तप केवल शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि आत्मबल, संयम और संकल्प को मजबूत करने का माध्यम है।
विभिन्न शहरों से पहुंचे श्रावक-श्राविकाएं
धर्मसभा का शुभारंभ प्रवचन प्रभाविका श्री सुमनप्रभाजी म.सा. के संबोधन से हुआ। प्रवर्तकश्री के दर्शन-वंदन एवं धर्मसभा में शामिल होने के लिए अहमदनगर, पुणे, नासिक, सूरत, खाचरौद, नागदा, उज्जैन सहित विभिन्न स्थानों से श्रीसंघ के सदस्य रतलाम पहुंचे।
इस अवसर पर सेवाभावी श्री दर्शनमुनिजी म.सा., प्रवचन प्रभाविका श्री सुमनप्रभाजी म.सा. ठाणा-8, महासती श्री चंदनबालाजी म.सा. एवं महासती श्री कल्पनाजी म.सा. मंचासीन रहे। धर्मसभा का संचालन प्रकाश मूणत एवं आयुष गंग ने किया।
धर्मसभा में श्री धर्मदास जैन श्रीसंघ के सदस्यगण, श्री धर्मदास जैन मित्र मंडल ट्रस्ट, श्री सौभाग्य तीर्थ ट्रस्ट, श्री सौभाग्य जैन नवयुवक मंडल, श्री सौभाग्य प्रकाश युवक मंडल, श्री सौभाग्य जैन महिला मंडल, श्री सौभाग्य अणु बहु मंडल तथा श्री सौभाग्य प्रकाश बालक-बालिका मंडल के सदस्यगण उपस्थित रहे। तपस्वियों की कठिन आराधना और प्रवर्तकश्री के प्रेरणादायी प्रवचन से धर्मसभा में श्रद्धा, भक्ति और साधना का वातावरण बना रहा।




0 टिप्पणियाँ