ज्ञान का प्रभाव जीवन के आचरण में दिखाई नहीं देता, तब तक उसका वास्तविक लाभ प्राप्त नहीं होता

सम्यक् दृष्टि से पढ़ा गया ज्ञान आत्मा के लिए हितकारी : श्रमण संघीय पूज्य प्रवर्तक श्री प्रकाश मुनिजी म.सा.

श्री सौभाग्य प्रकाश दरबार में धर्मसभा, प्रवर्तकश्री ने कहा—सम्यक् दृष्टि के अभाव में शास्त्र भी शस्त्र बन जाता है

देश-प्रदेश से पहुंचे धर्मानुरागी, मेघनगर श्री संघ ने की विनती

रतलाम, 28 सितंबर (सम्यक दृष्टि, प्रकाश मुन्नत) सम्यक् दृष्टि का जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। सम्यक् दृष्टि के अभाव में शास्त्र भी शस्त्र बन जाता है, जबकि सम्यक् दृष्टि हो तो शस्त्र भी शास्त्र का स्वरूप ले लेते हैं। व्यक्ति के भीतर यदि सम्यक् दृष्टि जागृत है तो वह जीवन में प्राप्त होने वाले प्रत्येक ज्ञान का सदुपयोग करते हुए उसे आत्मकल्याण का माध्यम बना सकता है। सम्यक् दृष्टि के साथ पढ़ा और समझा गया ज्ञान ही आत्मा के लिए हितकारी होता है।

उक्त विचार मालव केसरी पूज्य गुरुदेव सौभाग्यमलजी म.सा. के सुशिष्य, रत्नपुरी के रत्न एवं श्रमण संघीय प्रवर्तक पूज्य श्री प्रकाश मुनिजी म.सा. निर्भय ने मोहन टॉकीज स्थित श्री सौभाग्य प्रकाश दरबार में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।

प्रवर्तकश्री ने कहा कि संसार में लोग सम्यक् दृष्टि प्राप्त करने के लिए जागरूक होते हैं और उनके भीतर श्रद्धा भी जागृत होती है, लेकिन केवल जागरूकता और श्रद्धा पर्याप्त नहीं है। जब तक ज्ञान का प्रभाव जीवन के आचरण में दिखाई नहीं देता, तब तक उसका वास्तविक लाभ प्राप्त नहीं होता। उन्होंने कहा कि तीर्थंकर भगवंतों ने जो ज्ञान प्रदान किया है, वह आत्मा के अनुभव से निकला हुआ ज्ञान है। यह केवल बाहरी जानकारी प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि जीवन को आत्मकल्याण की दिशा में ले जाने के लिए है।

उन्होंने कहा कि वीतरागों का ज्ञान पढ़ने-सुनने के बाद भी यदि उसका प्रभाव व्यक्ति के जीवन में दिखाई नहीं देता, तो उस ज्ञान की सार्थकता अधूरी रह जाती है। ज्ञान का उद्देश्य केवल जानना नहीं, बल्कि जीवन को बदलना है। व्यक्ति को अपने व्यवहार, विचार और दृष्टिकोण में उस ज्ञान को उतारना चाहिए।

प्रवर्तकश्री ने वर्तमान शिक्षा व्यवस्था और बच्चों पर बढ़ते दबाव की चर्चा करते हुए कहा कि पहले बच्चों के 33 प्रतिशत अंक आने पर भी माता-पिता इस बात से संतुष्ट हो जाते थे कि बच्चा उत्तीर्ण हो गया। आज 98-99 प्रतिशत अंक प्राप्त करने के बाद भी कई बार माता-पिता यह पूछते हैं कि 100 प्रतिशत क्यों नहीं आए। इस प्रकार की अपेक्षाएं बच्चों पर अनावश्यक मानसिक दबाव डालती हैं। उन्होंने कहा कि बच्चों की प्रतिभा और क्षमता को समझना तथा उन्हें सकारात्मक वातावरण देना आवश्यक है।

प्रभावना लेना और सहयोग देना भी धर्म

प्रवर्तकश्री ने कहा कि धर्म में प्रभावना का भी विशेष महत्व है। ज्ञानी व्यक्ति को ज्ञान से, तपस्वी को तप से और धनवान व्यक्ति को धन से धर्म की प्रभावना करनी चाहिए। प्रभावना केवल स्वयं करने की बात नहीं है, बल्कि प्रभावना में सहयोग देना और उसे सम्मान देना भी धर्म का ही एक अंग है। उन्होंने कहा कि धर्म के कार्यों में जो लोग सहयोग करते हैं, उनके भावों का सम्मान होना चाहिए और समाज को भी धर्मप्रभावना के अवसरों को बढ़ावा देना चाहिए।

धर्मसभा को प्रवचन प्रभाविका श्री सुमनप्रभाजी म.सा. ने भी संबोधित किया। मंच पर सेवाभावी श्री दर्शनमुनिजी म.सा., प्रवचन प्रभाविका श्री सुमनप्रभाजी म.सा. ठाणा-8, महासती श्री चंदनबालाजी म.सा. एवं महासती श्री कल्पनाजी म.सा. विराजित रहे। धर्मसभा का संचालन आयुष गंग ने किया।

इस अवसर पर श्री धर्मदास जैन श्री संघ, श्री धर्मदास जैन मित्र मंडल ट्रस्ट, श्री सौभाग्य तीर्थ ट्रस्ट, श्री सौभाग्य जैन नवयुवक मंडल, श्री सौभाग्य प्रकाश युवक मंडल, श्री सौभाग्य जैन महिला मंडल, श्री सौभाग्य अणु बहु मंडल तथा श्री सौभाग्य प्रकाश बालक-बालिका मंडल के सदस्य उपस्थित रहे।

देश-प्रदेश से पहुंचे धर्मानुरागी, मेघनगर श्री संघ ने की विनती

श्री सौभाग्य प्रकाश दरबार में श्रमण संघीय प्रवर्तक पूज्य श्री प्रकाश मुनिजी म.सा. से क्षमायाचना एवं दर्शन-वंदन के लिए देश-प्रदेश के विभिन्न स्थानों से धर्मानुरागी निरंतर पहुंच रहे हैं। धर्मसभा के दौरान पूना, चिंचवड, पिपलगांव वसंत, नासिक, उज्जैन, इंदौर एवं मेघनगर सहित अनेक स्थानों से श्री संघ के सदस्य पहुंचे और प्रवर्तकश्री के दर्शन-वंदन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।

मेघनगर से श्री संघ अध्यक्ष रवि सुराणा, वरिष्ठ सुश्रावक पंकज वागरेचा एवं यशवंत बाफना के नेतृत्व में आए श्री संघ की ओर से विपुल धोका ने प्रवर्तकश्री से वर्षावास के पश्चात मेघनगर पधारने की पुरजोर विनती की। उन्होंने श्री संघ की भावनाओं से अवगत कराते हुए प्रवर्तकश्री के सानिध्य की अभिलाषा व्यक्त की। इस दौरान धर्मसभा का संचालन श्री संघ के पूर्व अध्यक्ष प्रकाश मूणत ने किया।


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