अपेक्षाओं से तनाव, कर्मों को स्वीकार करने से मिलती है शांति : परम् पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा.
नागपुर, 28 सितंबर। धर्मदास संप्रदाय सुमेरु परम पूज्य गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने प्रवचन में कहा कि भगवान महावीर ने अपने अनुभव से भव्य जीवों के कल्याण के लिए मोक्ष का मार्ग बताया है। जीव के कर्म जब तक उदय में नहीं आते, तब तक उनसे छुटकारा संभव नहीं है। संसार में जीव को कभी अनुकूलता तो कभी प्रतिकूलता का सामना करना पड़ता है। ऐसे में परिस्थितियों को लेकर तनाव करने के बजाय उन्हें अपने कर्मों का परिणाम मानकर स्वीकार करना चाहिए।
परम् पूज्य गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि सबको खुश करना कठिन है, लेकिन उससे भी कठिन है स्वयं खुश रहना। मनुष्य अपना पूरा जीवन दूसरों को प्रसन्न करने में लगा देता है, फिर भी अपेक्षाएं पूरी नहीं होने पर दुखी हो जाता है। इसलिए जड़ हो या चेतन, सभी के प्रति शुभभाव रखना चाहिए। भोजन में स्वाद कम हो, कोई हमारी बात न माने या परिस्थितियां मन के अनुरूप न हों तो शिकायत करने के बजाय यह विचार करना चाहिए कि आज हमारे कर्मों के उदय में जितना था, उतना ही हमें प्राप्त हुआ है।
जीव स्वयं ही कर्मों का कर्ता और भोगता है। जिसे हम दुख समझते हैं, वह कई बार कोई नया कर्म नहीं बल्कि पूर्व में किए गए कर्मों का परिणाम होता है। यदि जीवन में शांति चाहिए तो परिस्थितियों को कर्मों का दोष मानकर स्वीकार करना सीखना होगा। भगवान महावीर ने साढ़े बारह वर्ष की साधना में अनेक कठिन परिस्थितियों को सहन किया। उन्होंने प्रतिकूलताओं के बीच भी समता नहीं छोड़ी। जब दुख देने वाला भी उपकारी नजर आने लगे, तब समझना चाहिए कि साधना में आगे बढ़ने का अवसर मिल रहा है।
अपेक्षा और आदर की भूख तनाव का कारण
परम् पूज्य गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि अपेक्षा, गलतफहमी, भय, प्रलोभन, निर्णय लेने में असमर्थता तथा आदर-कद्र की भूख मनुष्य के तनाव के प्रमुख कारण बनते हैं। हम जैसा करके आते हैं, वैसा ही जीवन में प्राप्त होता है। यदि हमने दूसरों का आदर किया है तो आदर मिलेगा और कद्र की है तो कद्र प्राप्त होगी।
इस संदर्भ में उन्होंने एक दिलदार सेठ का उदाहरण देते हुए कहा कि वह सभी की मदद करता था, लेकिन एक व्यक्ति की मदद करने से उसने इनकार कर दिया और उसका तिरस्कार किया। प्रवचन में इसे पूर्व कर्मों के परिणाम से जोड़ते हुए समझाया गया कि संसार में कई बार व्यक्ति को ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, जहां उसे सम्मान और सहयोग की अपेक्षा होती है, लेकिन इसके विपरीत अनुभव होता है। ऐसी स्थितियां भी तनाव का कारण बन जाती हैं।
उन्होंने कहा कि जब मन में बेचैनी, भारीपन अथवा अशांति महसूस हो तो समझना चाहिए कि किसी न किसी बात की अपेक्षा या चिंता मन पर प्रभाव डाल रही है। दुनिया की वस्तुओं से जुड़ी अनावश्यक अपेक्षाओं के बजाय मोक्ष की आकांक्षा रखनी चाहिए।
तनाव शरीर और मन दोनों को प्रभावित करता है
परम् पूज्य गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि तनाव का प्रभाव व्यक्ति के व्यवहार के साथ-साथ शरीर पर भी पड़ सकता है। परीक्षा के समय विद्यार्थियों में घबराहट के कारण पाचन संबंधी परेशानियां देखी जाती हैं। इसी प्रकार चिंता और मानसिक दबाव से बेचैनी, धड़कन तेज होना तथा अन्य शारीरिक परेशानियां महसूस हो सकती हैं।
उन्होंने तनाव को कर्मों के उदय से जोड़ते हुए कहा कि यदि किसी जीव को मानसिक पीड़ा दी है तो मानसिक असाता वेदनीय कर्म का उदय हो सकता है और शारीरिक पीड़ा देने पर शारीरिक कष्ट के रूप में उसका परिणाम सामने आ सकता है।
उन्होंने संदेश दिया—“तन स्वस्थ रखो, मन से आराधना में मस्त रहो।” तनाव शारीरिक, पारिवारिक, मानसिक और आर्थिक कई रूपों में सामने आ सकता है। इसलिए जीवन में परिस्थितियों को समझते हुए समता और प्रसन्नता बनाए रखना आवश्यक है।
संबंधों में अपेक्षा नहीं, समझ और प्रेम जरूरी
गुरुदेव ने कहा कि कई बार व्यक्ति के निकट संबंध ही उसके तनाव का कारण बन जाते हैं। पति-पत्नी, सास-बहू, देवरानी-जेठानी अथवा अन्य पारिवारिक संबंधों में अपेक्षाएं पूरी नहीं होने पर मन अशांत हो जाता है। चेहरे को उन्होंने ‘साइन बोर्ड’ बताते हुए कहा कि परिस्थितियां कैसी भी हों, अपना साइन बोर्ड अर्थात चेहरा कभी खराब नहीं करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि “खुश रहना सीख गए तो नए कर्मों के बंधन से बच सकते हैं।” जैसे लोहे की नियमित देखभाल नहीं की जाए तो उसमें जंग लग जाती है, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने जीवन और कर्मों का निरंतर आत्मावलोकन करते रहना चाहिए।
तनावग्रस्त व्यक्ति को चाहिए प्रेम और विश्वास
परम् पूज्य गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि जो व्यक्ति तनाव में है, उसे सबसे अधिक प्रेम, स्नेह और विश्वास की आवश्यकता होती है। ऐसे व्यक्ति को बार-बार उसकी गलतियां बताने अथवा कठोर शब्दों में टोके जाने के बजाय उसके भीतर मौजूद सद्गुणों की प्रशंसा करनी चाहिए। उसके साथ यह भाव रखना चाहिए कि “चिंता मत करो, मैं तुम्हारे साथ हूं।” प्रेमपूर्ण व्यवहार और सकारात्मक आश्वासन व्यक्ति का मनोबल बढ़ाने में सहायक हो सकते हैं।
उन्होंने एक विधवा महिला का उदाहरण दिया, जिसके पति की कम उम्र में मृत्यु हो गई थी और वह तीन छोटे बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित थी। एक सेठ ने बाहर से कुछ रुपये देकर सहायता की, लेकिन उसमें अपनापन नहीं था। वहीं एक गरीब महिला उसके पास बैठी, सिर पर हाथ रखा और कहा कि चिंता मत करो, बच्चे बड़े हो जाएंगे और हम तुम्हारे साथ हैं। इन शब्दों से उस महिला को मानसिक संबल मिला। श्री गुलाब मुनिजी ने कहा कि सहायता करनी हो तो आदर और आत्मीयता के साथ करें, तिरस्कार के साथ नहीं।
धन से नहीं, सम्मान से दी गई सहायता महत्वपूर्ण
गुरुदेव ने एक कपड़ा व्यापारी और संन्यासी का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि एक कपड़े का व्यापारी था, उसका काम बहुत ही जोरों से चल रहा था। एक दिन उसके पास एक संन्यासी आया। उसने दस रुपए मदद के लिए माँगे। पहले तो दुकानदार ने अनसुना किया, फिर आगे जाओ, आगे जाओ करने लगा। संन्यासी ने विनती कि, सेठ तुम दे सकते हो इसलिए ही तुम्हारे पास आया हूं। सेठ जी ने संन्यासी को फेक कर दस रुपए दिए। संन्यासी ने बोला ये तो लक्ष्मी है तुम इसे फेक कर दे रहे हो, ये अब तुम्हारे पास से जाने वाली है। इतना कह कर संन्यासी वहां से चला गया। धीरे धीर समय निकला और ऐसा समय आया कि, सेठ जी के पास सिर्फ दाल रोटी के दिन आ गए। जो सेठ कभी पकवान खाया करता था, आज वो सिर्फ दाल रोटी खा रहा है। किसी को भी कुछ भी देना हो तो आदर से दो, मन से दो। हीन समझ कर दान दिया तो वैसे ही भुगतान करना पड़ेगा। ध्यान रखना। समय बदला और व्यापारी की आर्थिक स्थिति भी बदल गई। इस प्रसंग के माध्यम से उन्होंने संदेश दिया कि किसी जरूरतमंद को सहायता देते समय उसे हीन समझकर नहीं, बल्कि सम्मान के साथ सहयोग करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि किसी का पद, धन या सामाजिक स्तर हमेशा एक जैसा नहीं रहता। इसलिए केवल स्टेटस के आधार पर किसी का तिरस्कार नहीं करना चाहिए। धनबल हो तो सम्मानपूर्वक आर्थिक सहायता करें और वचनबल हो तो मधुर शब्दों से किसी का मनोबल बढ़ाएं।
प्रसन्नता से दूर होता है तनाव
गुरुदेव ने कहा कि तनाव के समय व्यक्ति की स्मरण शक्ति और कार्यक्षमता भी प्रभावित हो सकती है। प्रसन्नता बनाए रखने से मानसिक और शारीरिक कष्टों को कम करने में सहायता मिलती है। उन्होंने कहा कि दुकान का काम दुकान तक ही रखना चाहिए। घर पहुंचने के बाद ऐसा प्रसन्न वातावरण बनाएं कि घर में कोई अप्रसन्न व्यक्ति भी हमें देखकर प्रसन्न हो जाए।
उन्होंने कहा कि “टेंशन से अप्रसन्नता आती है और प्रसन्नता से टेंशन दूर होता है।” जीवन में परिस्थितियां हमेशा मन के अनुरूप नहीं होंगी, लेकिन उन परिस्थितियों के प्रति हमारी प्रतिक्रिया हमारे हाथ में है। सुख स्थायी नहीं है तो दुख भी स्थायी नहीं है। आपत्ति को धैर्यपूर्वक सहन करने पर वह भी समय के साथ गुजर जाती है।
अंत में उन्होंने कहा कि प्रत्येक जीव में कोई न कोई सद्गुण अवश्य होता है। इसलिए तनावग्रस्त व्यक्ति की कमियां गिनाने के बजाय उसके गुणों को पहचानें, प्रेम दें, सम्मान दें और उसका मनोबल बढ़ाएं। जीवन में प्रसन्नता, समता और आत्मावलोकन को स्थान देकर मनुष्य अनेक मानसिक उलझनों से स्वयं को बचा सकता है।




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