साधना के लिए साधन नहीं, मनोबल और आत्मबल चाहिए : परम् पूज्य प्रवर्तक श्री प्रकाशमुनिजी म.सा.
रतलाम, 22 सितंबर (सम्यक दृष्टि, प्रकाश मुन्नत) मनुष्य के जीवन में साधना की सफलता बाहरी साधनों पर नहीं, बल्कि उसके दृढ़ मनोबल और आत्मबल पर निर्भर करती है। साधना के लिए संसाधनों से अधिक आवश्यकता उस आंतरिक शक्ति की होती है, जो प्रत्येक जीव के भीतर विद्यमान है। जब साधक का मनोबल और आत्मबल मजबूत हो जाता है, तो कठिन परिस्थितियां भी उसके संकल्प को डिगा नहीं सकतीं और वह आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है।
उक्त प्रेरक विचार मालव केसरी पूज्य गुरुदेव सौभाग्यमलजी म.सा. के सुशिष्य, रत्नपुरी के रत्न एवं श्रमण संघीय प्रवर्तक पूज्य श्री प्रकाशमुनिजी म.सा. निर्भय ने मंगलवार को मोहन टॉकीज स्थित श्री सौभाग्य प्रकाश दरबार में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए। प्रवर्तकश्री की निश्रा में महासती चंद्रयशाजी म.सा. ने 48वें उपवास की दीर्घ तपस्या का प्रत्याख्यान ग्रहण किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे और तपस्विनी की आराधना की अनुमोदना की।
प्रवर्तकश्री ने कहा कि संसार में बिना मन वाले अनंत जीव हैं, जबकि मन वाले जीव असंख्यात हैं। मनुष्य को प्राप्त मन उसकी शक्ति भी है और परीक्षा भी। यदि मन को सही दिशा में लगाया जाए तो वही साधना का माध्यम बन जाता है, लेकिन मन विषय-विकारों में उलझ जाए तो व्यक्ति अपने लक्ष्य से भटक सकता है। इसलिए साधक के लिए मनोबल का मजबूत होना अत्यंत आवश्यक है।
उन्होंने मनोबल और आत्मबल के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि मनोबल संसार के व्यवहार में व्यक्ति को आगे बढ़ने की शक्ति देता है, जबकि आत्मबल साधना के पथ पर दृढ़ता प्रदान करता है। जो व्यक्ति अपने मन, शरीर और आत्मा को संयमित करते हुए पापों अर्थात कर्मों से संघर्ष करता है, वही वास्तविक अर्थों में तपस्वी है। तपस्या केवल शारीरिक कष्ट सहन करने का नाम नहीं, बल्कि अपनी आंतरिक वृत्तियों पर विजय प्राप्त करने की साधना है।
प्रकाशमुनिजी म.सा. ने कहा कि तपस्या के दौरान मन को रोकना अपने आप में बहुत बड़ी साधना है। मन स्वभाव से चंचल है और निरंतर नए विचारों तथा विषयों की ओर आकर्षित होता रहता है। ऐसे में उसे आत्मचिंतन और संयम की दिशा में स्थिर करना साधक के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। सामायिक 48 मिनट की साधना है, लेकिन यह अवधि भी साधक के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस दौरान मन, वचन और काया को संयमित रखने का प्रयास किया जाता है। वास्तविक साधना बाहरी प्रदर्शन नहीं, बल्कि भीतर की यात्रा है।
उन्होंने वर्तमान जीवनशैली पर चिंतन करते हुए कहा कि आज मनुष्य के पास धन और भौतिक साधन पहले से अधिक हैं, लेकिन उसके मन की मजबूती कमजोर होती जा रही है। पहले साधन कम थे, लेकिन मनोबल अधिक था। आज सुविधाएं बढ़ी हैं, पर मन की स्थिरता कम हुई है। आत्मबल के बिना मन को स्थिर करना कठिन है। इसलिए साधना के लिए सबसे पहले अपने भीतर के बल को पहचानना और उसे मजबूत करना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि साधना के लिए मन, वचन और काया—तीनों का स्थिर होना जरूरी है। शरीर को एक स्थान पर रोक देना ही साधना नहीं है। जब मन शांत हो, वाणी संयमित हो और शरीर अनुशासित हो, तभी साधना अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करती है।
कर्म सिद्धांत की चर्चा करते हुए प्रवर्तकश्री ने कहा कि भगवान ने संसार को कर्मों का खेल बताया है। जीव के जीवन में आने वाले सुख-दुःख और विभिन्न परिस्थितियों के पीछे कर्मों की महत्वपूर्ण भूमिका है। जो व्यक्ति कर्मों के स्वरूप को जानने और समझने का प्रयास करता है, वही आत्मतत्व को पहचानने की दिशा में आगे बढ़ता है। आत्मकल्याण की यात्रा के लिए कर्मों को समझना और उनसे मुक्त होने का पुरुषार्थ करना आवश्यक है।
धर्मसभा को प्रवचन प्रभाविका श्री सुमनप्रभाजी म.सा. ने भी संबोधित किया। संचालन आयुष गंग ने किया। मंच पर सेवाभावी श्री दर्शनमुनिजी म.सा., प्रवचन प्रभाविका श्री सुमनप्रभाजी म.सा. ठाणा-8, महासती श्री चंदनबालाजी म.सा. एवं महासती श्री कल्पनाजी म.सा. विराजमान रहे।
इस अवसर पर श्री धर्मदास जैन श्री संघ, श्री धर्मदास जैन मित्र मंडल ट्रस्ट, श्री सौभाग्य तीर्थ ट्रस्ट, श्री सौभाग्य जैन नवयुवक मंडल, श्री सौभाग्य प्रकाश युवक मंडल, श्री सौभाग्य जैन महिला मंडल, श्री सौभाग्य अणु बहु मंडल एवं श्री सौभाग्य प्रकाश बालक-बालिका मंडल के सदस्यगण सहित बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे। 48वें उपवास के प्रत्याख्यान के अवसर पर तपस्विनी महासती चंद्रयशाजी म.सा. की तप आराधना की अनुमोदना की गई।
Dr.Talera's Multi-speciality Dental Clinic, Thandla


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