क्रोध करने से दूसरों का नहीं, स्वयं का नुकसान होता है : तत्वज्ञ धर्मेन्द्रमुनिजी म.सा.
पयुर्षण महापर्व के दौरान 45 से अधिक तपस्वियों ने की 8, 9 व 11 उपवास की तपस्या, तप आराधकों का हुआ बहुमान
थांदला (सम्यक दृष्टि न्यूज़, मिलिंद कोठारी) संत एवं साध्वी मंडल के सानिध्य में आठ दिवसीय पयुर्षण महापर्व का समापन संवत्सरी महापर्व के साथ विविध धार्मिक आराधनाओं एवं श्रद्धापूर्वक वातावरण में हुआ। महापर्व के अंतिम दिन बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने सामूहिक पौषध, उपवास सहित विभिन्न धार्मिक आराधनाएं कीं। स्थानीय महावीर भवन में आयोजित विशाल धर्मसभा में तत्वज्ञ पूज्य श्री धर्मेन्द्रमुनिजी म.सा. ने संवत्सरी महापर्व के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए श्रद्धालुओं को क्षमा, मैत्री और कषायों के त्याग का संदेश दिया।
धर्मसभा स्थल को संबोधित करते हुए श्री धर्मेन्द्रमुनिजी म.सा. ने कहा कि क्रोध का समय आने पर क्रोध नहीं करना ही क्षमा है। क्रोध करने से दूसरों का नहीं, बल्कि स्वयं का नुकसान होता है। क्षमा करना सामने वाले के लिए ही नहीं, बल्कि स्वयं की आवश्यकता है। इसलिए जीवन में क्रोध पर नियंत्रण रखना जरूरी है। उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति अपनी गलती को देखता है, तब उसके भीतर क्षमापना का भाव उत्पन्न होता है और जब हम स्वयं क्षमाशील बनते हैं तो सामने वाला भी क्षमा की भावना ग्रहण कर सकता है। क्षमा धारण करने से मन में शांति और प्रसन्नता का अनुभव होता है।
उन्होंने कहा कि संवत्सरी महापर्व केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि अपने भीतर झांकने और कषायों को समाप्त करने का अवसर है। इस पर्व पर सभी को अपने मन में किसी के प्रति रहे वैर का विसर्जन करना चाहिए। वैर को पकड़कर रखना नहीं चाहिए। मान कषाय के कारण छोटी-छोटी बातों पर विवाद और झगड़े हो जाते हैं। तुच्छ वस्तुओं एवं छोटी बातों के लिए वैरभाव बढ़ाना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि जीवन में वैर चलाना नहीं, बल्कि कषायों को समाप्त करना है।
श्री धर्मेन्द्रमुनिजी म.सा. ने कहा कि किसी को अपना दुश्मन नहीं बनाना चाहिए। संकट के समय सामने वाले की सहायता करने से वैर का भाव मैत्री में बदल सकता है। उन्होंने तपस्या के संदर्भ में कहा कि यदि व्यक्ति तपस्या तो करे, लेकिन मन में वैरभाव बनाए रखे तो तपस्या का वास्तविक लाभ नहीं मिल पाता। तप के साथ मन की शुद्धि और कषायों का क्षय भी आवश्यक है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आत्मचिंतन करते हुए पूछा कि आत्मा का लाभ गुस्से में है या क्षमा में? इसका उत्तर क्षमा में ही है।
धर्मसभा को श्री संदीपमुनिजी म.सा. ने भी संबोधित किया। पयुर्षण महापर्व के दौरान लगातार आठों दिन अंतगड़दसा सूत्र का वाचन युवा संत श्री श्रेयांशमुनिजी ने किया। पर्व के अंतिम दिवस युवा संत श्री प्रसन्नमुनिजी ने आलोचना करवाई। संत एवं साध्वी मंडल ने महापर्व के दौरान तपस्या करने वाले सभी तपस्वियों को शुभकामनाएं देते हुए उनका उत्साहवर्धन किया।
श्रीसंघ अध्यक्ष प्रदीप गादिया ने संत-साध्वी मंडल तथा समस्त श्रावक-श्राविकाओं से क्षमायाचना की और संघ की समस्त संस्थाओं के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने सभी तपस्वियों को भी खूब-खूब धन्यवाद दिया। वीर रूनवाल परिवार की ओर से वरिष्ठ स्वाध्यायी राजेंद्र रूनवाल ने अपने विचार व्यक्त किए। मासक्षमण तपस्वी अंकित भरत भंसाली एवं पिंकी निलेश पावेचा ने मालवी भाषा में पाती का वाचन किया। प्रभावना का लाभ प्रकाशचंद्र मेघसिंहजी रूनवाल परिवार एवं संपतबाई कांतिलालजी पीचा परिवार ने लिया।
45 से अधिक तपस्वियों ने की कठिन तप आराधना
पयुर्षण महापर्व के दौरान संत एवं साध्वी मंडल के सानिध्य में 45 से अधिक तपस्वियों ने 8, 9 एवं 11 उपवास की तपस्या की। इनमें कई बाल तपस्वी भी शामिल रहे। सभी तप आराधकों का श्रीसंघ की ओर से शॉल ओढ़ाकर एवं माला पहनाकर बहुमान किया गया। कार्यक्रम का संचालन श्रीसंघ सचिव हितेश शाहजी ने किया।
संवत्सरी महापर्व के अंतिम दिन शाम को श्रद्धालुओं ने संवत्सरी प्रतिक्रमण किया और 84 लाख जीवयोनियों से क्षमायाचना की। बुधवार को श्रावक-श्राविकाओं ने स्थानीय स्थानक में विराजित संयमी आत्माओं से क्षमायाचना करने के बाद एक-दूसरे से भी मिच्छामी दुक्कड़म कहते हुए क्षमा मांगी। दौलत भवन स्थानक से बाल तपस्वियों की जयकार यात्रा निकाली गई। इसमें श्रद्धालु एवं समाजजन तपस्वियों की जयकार करते हुए चल रहे थे।
सामूहिक पारणे व स्वामी वात्सल्य का आयोजन
श्रीसंघ के सहसचिव कपिल पीचा एवं श्री ललित जैन नवयुवक मंडल अध्यक्ष प्रांजल लोढ़ा ने बताया कि बुधवार को स्थानीय महावीर भवन में वर्षीतप आराधकों, संवत्सरी महापर्व पर उपवास एवं इससे अधिक तपस्या करने वाले तपस्वियों तथा बड़ी तप आराधना करने वाले सभी तपस्वियों के सामूहिक पारणे आयोजित किए गए। पारणे के पश्चात सकल श्वेतांबर जैन समाज का स्वामी वात्सल्य हुआ।
सामूहिक पारणे एवं स्वामी वात्सल्य सहित समस्त कार्यक्रम के लाभार्थी संजय-अलका वोरा, आदित्य-आशिका वोरा, गौतम एवं आराध्या वोरा परिवार रहे। पूरे आयोजन के दौरान धर्म, तप, त्याग, क्षमा और मैत्री का वातावरण बना रहा तथा संवत्सरी महापर्व ने समाजजनों को आत्मावलोकन के साथ आपसी वैर-विरोध समाप्त कर प्रेम, सौहार्द एवं क्षमाभाव अपनाने का संदेश दिया।
Dr.Talera's Multi-speciality Dental Clinic, Thandla


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