कर्मों का उदय टाला नहीं जा सकता, समभाव से स्वीकार करना ही सच्ची आराधना :परम् पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा.
नागपुर, 30 सितंबर। धर्मदास संप्रदाय सुमेरु परम पूज्य गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि भगवान महावीर ने भव्य जीवों के कल्याण के लिए मोक्ष का मार्ग बताया है। जीव को अपने कर्मों का भुगतान स्वयं करना पड़ता है। कर्म जब तक उदय में नहीं आते, तब तक उनसे छुटकारा संभव नहीं है। इसलिए कर्मों के उदय के समय दुखी होकर रोने के बजाय उन्हें समभावपूर्वक स्वीकार करना चाहिए।
कर्मों के उदय पर केवल दुख और शिकायत करने वाला जीव विराधक बनता है, जबकि अपने दोषों को पहचानकर उन्हें स्वीकार करने वाला जीव आराधक कहलाता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं से पूछना चाहिए कि उसे आराधक बनना है या विराधक। उन्होंने कहा कि दुख को कोई रोक नहीं सकता, लेकिन दुख के समय धर्म को याद करने वाला व्यक्ति उससे निकलने का मार्ग अवश्य खोज लेता है। कर्मों का उदय भी उसी प्रकार है जैसे किसी कार्य का समय आने पर उसका परिणाम सामने आता है।
उन्होंने कहा कि जीवन में उपकार करने वालों के उपकार को कभी नहीं भूलना चाहिए। पूर्व में किए गए कर्मों के परिणाम वर्तमान में सामने आते हैं। यदि कोई गलती हुई है तो उसे स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि एक गलती छिपाने के प्रयास में जीव कई और गलतियां कर बैठता है।
प्रेम के अभाव में भय का जन्म
परम पूज्य गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि जीवन में अनेक प्रकार के तनाव और भय व्यक्ति को विचलित करते हैं। छोटी-छोटी परिस्थितियों से भी मनुष्य भयभीत हो जाता है। बीमारी हो या कोई विपरीत परिस्थिति, भय मनुष्य की सहनशक्ति को कमजोर कर देता है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक जीव को प्रेम चाहिए। जहां प्रेम का अभाव होता है, वहां भय उत्पन्न होता है। इसलिए सभी जीवों के प्रति मैत्रीभाव रखना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जीव अपनी परिणति ठीक नहीं रखता, इसलिए भयभीत रहता है। यदि पूर्व के कर्मों के कारण कोई विपरीत परिस्थिति सामने आई है तो उसे स्वीकार कर समभाव रखना चाहिए।
शरीर, वचन और मन की असहिष्णुता
प्रवचन में उन्होंने असहिष्णुता के तीन प्रकार बताए—शरीर, वचन और मन। उन्होंने कहा कि शारीरिक असहिष्णुता समाधि को भंग करती है। शरीर में पीड़ा होने पर ध्यान एकाग्र करना कठिन हो जाता है और मन बार-बार पीड़ा की ओर चला जाता है। उन्होंने समझाया कि असाता वेदनीय कर्म के उदय से शरीर को पीड़ा मिलती है, लेकिन बार-बार ‘हाय-हाय’ करना उस पीड़ा के साथ मानसिक अशांति भी बढ़ाता है।
परम पूज्य गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि यदि धन से किसी को साता नहीं पहुंचा सकते तो कम से कम दो मधुर और आश्वासन भरे शब्द बोलकर किसी को राहत दी जा सकती है। कभी-कभी किसी के कहे हुए छोटे से अच्छे शब्द भी किसी व्यक्ति के जीवन की दिशा बदल सकते हैं।
इसी संदर्भ में उन्होंने एक करोड़पति और उदार व्यक्ति की प्रेरक घटना सुनाते हुए कहा कि एक व्यक्ति ने संकट में पड़े करोड़पति को सहायता और प्रोत्साहन दिया। उस छोटी-सी मदद ने करोड़पति के जीवन में बड़ा परिवर्तन किया और उसने बाद में उदारता को अपने जीवन का हिस्सा बना लिया। समय आने पर वही व्यक्ति अपने उपकारी की सहायता के लिए आगे आया। उन्होंने कहा कि सत्कर्म कभी निष्फल नहीं जाते, इसलिए अवसर मिलने पर हर व्यक्ति को यथासंभव किसी की मदद करनी चाहिए।
आराधना में तल्लीनता ऐसी हो कि पीड़ा भी विचलित न कर सके
परम पूज्य गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने सती अंजना के जीवन में आए कष्टों का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके जीवन में जितना दुख आया, उसकी तुलना में हमारे जीवन की परेशानियां बहुत छोटी हैं। फिर भी हम छोटी-छोटी बातों को लेकर तनाव में आ जाते हैं।
उन्होंने महासती हीराकुंवरजी की आराधना का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि वे नियमित रूप से 4 लोगस्स का ध्यान करती थीं। शरीर में अत्यधिक पीड़ा होने के बावजूद उन्होंने अपनी आराधना को बीच में नहीं छोड़ा। उन्होंने कहा कि यह प्रसंग बताता है कि साधक की आराधना में तल्लीनता कितनी गहरी होनी चाहिए कि शारीरिक पीड़ा भी उसे विचलित न कर सके।
उन्होंनें ने कहा कि भेद विज्ञान का अर्थ शरीर और आत्मा को अलग-अलग समझना है। केवल बड़ी-बड़ी बातें करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में इस ज्ञान को जीवन में उतारना ही वास्तविक साधना है।
वाणी पर संयम से टूटने से बचते हैं रिश्ते
परम पूज्य गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा. कहा कि वाचिक असहिष्णुता मैत्री और संबंधों को तोड़ देती है। किसी ने कुछ कह दिया तो उसे तुरंत अपने मन में ग्रहण कर लेना उचित नहीं है। व्यक्ति को यह विवेक रखना चाहिए कि कौन-सी बात स्वीकार करनी है और कौन-सी छोड़ देनी है।
उन्होंने कहा कि बुराई, चुगली और भला-बुरा बोलने से वाणी की शक्ति और संबंध दोनों कमजोर होते हैं। यदि किसी प्रकार की शंका या गलतफहमी है तो उसका समाधान संवाद से करना चाहिए। घर, परिवार, संघ और समाज में मधुर वाणी एवं संयम रखा जाए तो अनेक विवाद स्वतः समाप्त हो सकते हैं।
‘मेरी बात नहीं सुनी’ और ‘मेरे मन का नहीं हुआ’ से पैदा होता है मानसिक तनाव
परम पूज्य गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि मानसिक असहिष्णुता समभाव को भंग कर देती है। मन का दुख सबसे बड़ा संघर्ष है। इसके प्रमुख कारण हैं—‘मेरी बात सुनी नहीं गई’ और ‘मेरे मन का नहीं हुआ।’ इन दोनों भावों में उलझकर व्यक्ति छोटी-छोटी बातों को भी तनाव का कारण बना लेता है।
उन्होंने कहा कि यदि व्यक्ति यह समझ ले कि जीवन में जो कुछ घटित हो रहा है, उसके पीछे उसके अपने कर्मों का उदय है, तो शिकायत और तनाव काफी कम हो सकते हैं। हर परिस्थिति में दूसरों को दोष देने के बजाय स्वयं की परिणति को देखना चाहिए।
‘लेट गो’ को बनाएं तनाव मुक्ति का मंत्र
प्रवचन के अंत में गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि यदि तनाव से दूर रहना है और जीवन में आनंद बनाए रखना है तो एक सरल मंत्र को जीवन में अपनाएं—‘Let go’ यानी ‘जाने दो’। छोटी-छोटी बातों को पकड़कर बैठने के बजाय उन्हें छोड़ने की कला सीखना चाहिए। इससे मन हल्का होता है और आत्मबल भी बढ़ता है।
उन्होंने कहा कि जीवन में समस्या आते ही जीव अक्सर भगवान से शिकायत करने लगता है कि ऐसा क्यों हुआ। लेकिन भगवान को दोष देना उचित नहीं है। जीव अपने साथ जो कर्म लेकर आया है, उन्हीं कर्मों का उदय विभिन्न परिस्थितियों के रूप में सामने आता है।
उन्होंने कहा कि कर्मों को समझना, अपनी भूल स्वीकार करना, विपरीत परिस्थितियों में समभाव रखना, सभी जीवों के प्रति मैत्रीभाव रखना और शरीर, वचन एवं मन की असहिष्णुता से बचना ही आत्मकल्याण का मार्ग है। परिस्थितियां हमारे हाथ में नहीं हो सकतीं, लेकिन उन परिस्थितियों में हमारी परिणति कैसी हो, यह साधना और विवेक से निर्धारित किया जा सकता है।




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