विकासखंड स्तरीय चित्रकला प्रतियोगिता
तप की बोली तप से लगाकर किया बहुमान
भक्ति के लिए मन, वचन और काया के साथ भावों का जुड़ना आवश्यक है
आत्मबल, संयम, प्रेम, करुणा और समता को जीवन में उतारना ही वास्तविक धर्म साधना है
मन शांत हो, वाणी संयमित हो और शरीर अनुशासित हो, तभी साधना अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करती है
पूज्य रुपेंद्रमुनिजी म.सा. की 28वीं पुण्यतिथि पर जप-तप-त्याग और धर्माराधना
स्मरण, साधना और शुभकामनाओं का बना संगम
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