कर्म का उदय आए तो उसे भोगे बिना छुटकारा नहीं : परम् पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा.
नागपुर, 27 सितंबर। धर्मदास संप्रदाय सुमेरु परम पूज्य गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि भगवान महावीर ने अपने अनुभव के आधार पर भव्य जीवों के कल्याण के लिए मोक्ष का मार्ग बताया है। जीव के कर्म जब उदय में आते हैं, तब उन्हें भोगे बिना उनसे छुटकारा नहीं हो सकता। अज्ञानता के कारण जीव कर्मों के उदय के समय दुखी होकर विलाप करता है और उसी भावदशा में नए कर्मों का बंध कर लेता है।
उन्होंने कहा कि जीव की कमजोरी यह है कि जब पापकर्म उदय में आते हैं, तभी उसे देव, गुरु और धर्म याद आते हैं। लेकिन कर्म का उदय हो जाने के बाद उसका भुगतान करना ही पड़ता है। इसलिए कर्मों के उदय में आने से पहले ही धर्माराधना और आत्मकल्याण के मार्ग पर चलना चाहिए। प्रति पल कर्मबंधन की प्रक्रिया चल रही है और जीव अपने भावों के अनुसार नए कर्म बांधता रहता है।
कर्म के अनुसार मिलता है परिणाम
परम् पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने गेहूं का उदाहरण देते हुए कहा कि गेहूं से आटा, रोटी, पराठा, लड्डू और बाटी आदि बनाए जा सकते हैं। गेहूं एक ही है, लेकिन उससे क्या बनाया जाए, यह बनाने वाले पर निर्भर करता है। उसी प्रकार जीव कर्म को जिस प्रकार के भाव से ग्रहण करता है, उसी के अनुरूप कर्मबंध होता है।
उन्होंने कहा कि सभी पक्षियों को एक जैसा दाना खिलाने से भी सभी पक्षी एक जैसे नहीं हो जाते। इसी प्रकार एक ही माता के गर्भ में साथ पले जुड़वां बच्चों को समान आहार और पोषण मिलने के बाद भी उनकी शारीरिक क्षमता अलग हो सकती है। इसका कारण उनके पूर्व भव के अलग-अलग कर्म हैं। सुंदरता, बुद्धि, शारीरिक क्षमता और जीवन में मिलने वाली अनेक परिस्थितियां पूर्वकृत कर्मों के परिणामस्वरूप प्राप्त होती हैं। इसलिए कर्मों के उदय में आने से पहले धर्माराधना कर लेना चाहिए।
प्रवचन में भगवान महावीर और गजसुकमाल के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि तीर्थंकर भगवान और महान साधकों को भी पूर्व भव के कर्मों को उदय में आने पर भोगना पड़ा। ऐसे में सामान्य जीव को विपरीत परिस्थितियों में घबराने के बजाय शांति और समभाव रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि “जब अच्छा समय नहीं रुकता तो बुरा समय भी नहीं रुकेगा, वह भी निकल जाएगा।”
परिस्थितियां बदलती हैं, समभाव बनाए रखना जरूरी
राजा हरिश्चंद्र के प्रसंग का उल्लेख करते हुए परम् पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि एक समय ऐसा आया जब उन्हें पत्नी तारामती के साथ महल छोड़ना पड़ा। उन्हें विपरीत परिस्थितियों में जीवन बिताना पड़ा, यहां तक कि राजा को चांडाल के यहां नौकरी करनी पड़ी और तारामती को लोगों के घरों में काम करना पड़ा। उन्होंने परिस्थितियों को समभाव से स्वीकार किया और समय बदला तो पुनः राजपद प्राप्त हुआ।
उन्होंने कहा कि जीवन में थोड़ा-सा दुख आते ही जीव तनाव में आ जाता है। इससे उसकी शांति, संतुलन और संतोष समाप्त होने लगता है। वस्तु हो या व्यक्ति, जो कुछ घटित हो रहा है, उसे अपने कर्मों का उदय मानना चाहिए। किसी दूसरे को दोषी मानने से समस्या समाप्त नहीं होती, बल्कि नए कर्मों का बंध होता है।
जीव बार-बार सोचता है—“मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है?”, “मैंने क्या किया?”, “मेरा क्या होगा?” ऐसी मानसिक स्थिति नए कर्मों के बंध का कारण बनती है। उन्होंने कहा कि “दुःख का स्वीकार ही भावी दुःख का अंत है और प्रतिकार नए कर्म का उदय है।”
निमित्त को दोषी नहीं, उपकारी मानें
उन्होंने कहा कि शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक और आर्थिक परेशानियों में कोई जड़ या चेतन वस्तु अथवा व्यक्ति निमित्त बन सकता है। निमित्त को हमेशा उपकारी मानना चाहिए। उसे दोषी मानने से कर्मबंधन होता है। जिस जीव ने जिस प्रकार के कर्म बांधे हैं, उसे उसी प्रकार उनका भुगतान करना पड़ेगा।
अपेक्षा, स्वार्थ, इच्छा, भय और प्रलोभन तनाव के प्रमुख कारण हैं। कई बार निर्णय लेने की क्षमता का अभाव भी बच्चों और बड़ों दोनों को तनाव में डाल देता है। उन्होंने कहा कि जीव स्वयं अपने कर्मबंधन और तनाव का कारण बन जाता है।
आदर और कद्र की भूख भी तनाव का कारण
परम् पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि आदर और कद्र की भूख भी जीव को तनाव देती है। जब किसी व्यक्ति को सम्मान नहीं मिलता तो वह अच्छी संगत छोड़ देता है और जब उसके काम की कद्र नहीं होती तो वह अच्छा काम करना भी छोड़ देता है। “मुझे पूछा ही नहीं”, “मुझसे बात नहीं की”, “मेरी कद्र नहीं हुई”—ऐसी अपेक्षाएं मन को अशांत करती हैं।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति दूसरों की मदद करने के बाद उसकी कद्र की अपेक्षा करता है। ऐसी अपेक्षा के बजाय जगत से नहीं, जगतपति से कद्र करवाने का भाव रखना चाहिए। संसार में लोग अपने स्वार्थ के अनुसार व्यवहार करते हैं। इसलिए किसी की प्रशंसा या सम्मान को अपने अच्छे कार्य का आधार नहीं बनाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि यदि पूरे तन-मन से सेवा करने के बाद भी कद्र नहीं मिले तो सेवा छोड़नी नहीं चाहिए। विचार करना चाहिए कि यह मेरे कर्मों का परिणाम है, फिर मैं अच्छा काम क्यों छोड़ूं? सेवा में निरंतर लगे रहना चाहिए।
ज्ञानी से ज्ञान की अपेक्षा रखें, सम्मान की नहीं
प्रवचन में उन्होंने कहा कि तेली के कपड़ों को नहीं, उसकी घानी के तेल को महत्व दिया जाता है और हलवाई के कपड़ों को नहीं, उसकी दुकान की मिठाई और नमकीन को महत्व दिया जाता है। उसी प्रकार ज्ञानी के पास बैठें तो उससे ज्ञान की अपेक्षा करनी चाहिए, आदर-सम्मान की नहीं।
उन्होंने कहा कि कद्र नहीं हुई तो समझ लेना चाहिए कि पापकर्म का उदय है। जगतपति जीव के प्रत्येक कर्म का हिसाब रखते हैं। इसलिए सम्मान पाने की चिंता करने के बजाय अपने कर्मों को सुधारने पर ध्यान देना चाहिए।
दोष व्यक्ति का नहीं, कर्मों के उदय को समझें
घर में किसी नए सदस्य के आने के बाद परिस्थितियां बदलने पर अक्सर दोष उसी व्यक्ति पर डाल दिया जाता है। उन्होंने कहा कि यदि किसी बहू के आने के बाद घर में अशांति हुई तो सारा दोष बहू का नहीं माना जा सकता। उसे भी कर्मों के उदय का निमित्त समझना चाहिए। जीव का कोई स्थायी शत्रु या मित्र नहीं है। जीव स्वयं अपने कर्मों का कर्ता और भोगता है।
उन्होंने कहा कि भूल को देखने के बजाय गुणों को देखना चाहिए और अपनी वाणी में मिठास रखनी चाहिए। सभी जीवों के सद्गुणों को देखने का प्रयास करें, क्योंकि प्रत्येक जीव किसी न किसी रूप में आदर का पात्र है।
प्रकृति से सीखें सहनशीलता और उपयोगिता
परम् पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने प्रकृति के गुणों का वर्णन करते हुए कहा कि पृथ्वी में सहनशीलता और आधार देने का गुण है। पानी प्यास बुझाता है और शीतलता प्रदान करता है। अग्नि भोजन पकाने और उष्णता देने का कार्य करती है। वायु जीवन और प्रकृति के संचालन में सहायक है तथा वनस्पति शरीर के पोषण और जीवन-निर्वाह में सहायक है।
उन्होंने कहा कि प्रकृति के प्रत्येक तत्व में कोई न कोई गुण है, लेकिन मनुष्य अधिक पाने के लालच में कई बार अपनी सीमाएं भूल जाता है और अपना संसार बिगाड़ लेता है। आदर, कद्र, अपेक्षा और अधिक पाने की लालसा में जीव भटक जाता है। इसलिए कर्मों को समझकर समभाव, संतोष, सेवा और सद्भावना के साथ जीवन जीना ही आत्मकल्याण का मार्ग है।




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