परमात्मा का सानिध्य पाने वाली आत्माएं उत्कृष्ट गुणों से संपन्न होती हैं : श्रमण संघीय प्रवर्तक श्री प्रकाश मुनिजी म.सा.
गुणों को जानने वाला गुणज्ञ और गुणों को धारण करने वाला गुणवान होता है, भक्ति में मन, वचन और काया के साथ भावों का जुड़ना जरूरी : प्रवर्तकश्री
उक्त विचार मालव केसरी पूज्य गुरुदेव सौभाग्यमलजी म.सा. के सुशिष्य, रत्नपुरी के रत्न, श्रमण संघीय प्रवर्तक पूज्य श्री प्रकाश मुनिजी म.सा. निर्भय ने बुधवार को मोहन टॉकीज स्थित श्री सौभाग्य प्रकाश दरबार में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
प्रवर्तकश्री ने कहा कि संसार में ऐसी कोई आत्मा नहीं है, जिसमें कोई न कोई गुण विद्यमान न हो। प्रत्येक आत्मा के भीतर अनंत गुणों की संभावना है, लेकिन उन गुणों को जागृत करने और जीवन में उतारने वाले लोग कम दिखाई देते हैं। व्यक्ति कर्मों के बंधन और सांसारिक आकर्षणों में उलझकर अपने भीतर विद्यमान गुणों को पहचान नहीं पाता। जो आत्मा परमात्मा के सानिध्य में रहकर उनके गुणों का स्मरण और अनुकरण करती है, वह धीरे-धीरे अपने आत्मिक गुणों को जागृत करने की दिशा में आगे बढ़ती है।
उन्होंने कहा कि परमात्मा के सानिध्य का अर्थ केवल उनके समीप बैठना नहीं है, बल्कि उनके गुणों को अपने जीवन में उतारना है। जब व्यक्ति परमात्मा के गुणों का चिंतन करता है और उन्हीं श्रेष्ठ भावों को अपने भीतर विकसित करता है, तब उसकी आत्मा भी उत्कृष्टता की ओर अग्रसर होती है। परमात्मा ने कर्मों को जीतकर गुणाधीश का पद प्राप्त किया है। इसलिए उनके गुणों का स्मरण आत्मा को भी कर्म निर्जरा और आत्मशुद्धि की दिशा में प्रेरित करता है।
भावों के बिना अधूरी है भक्ति
प्रवर्तकश्री ने भक्ति के वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भक्ति केवल बाहरी क्रियाओं का नाम नहीं है। भक्ति के लिए मन, वचन और काया के साथ भावों का जुड़ना आवश्यक है। यदि व्यक्ति भक्ति तो करता है, लेकिन उसके भीतर सच्चे भाव नहीं हैं, तो उसकी भक्ति पूर्ण नहीं मानी जा सकती। भक्ति आत्मा की अनुभूति है और यह धन-दौलत से नहीं खरीदी जा सकती।
उन्होंने कहा कि यदि भक्ति में केवल बाहरी प्रदर्शन रह जाए और आत्मा में श्रद्धा एवं समर्पण का भाव न हो तो वह वास्तविक भक्ति नहीं है। भक्ति जब आत्मा में प्रवेश करती है तो व्यक्ति संसार के किसी व्यक्ति के गुणों का गुणगान करने के बजाय गुणों के स्वामी परमात्मा का स्मरण करता है। सच्ची भक्ति व्यक्ति के भीतर विनय, श्रद्धा, समता और आत्मकल्याण की भावना उत्पन्न करती है।
प्रवर्तकश्री ने धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को प्रेरणा देते हुए कहा कि परमात्मा के गुणों का स्मरण केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उनके आदर्शों को जीवन में अपनाने का प्रयास होना चाहिए। यही भक्ति का वास्तविक उद्देश्य है।
आरंभ में प्रवचन प्रभाविका श्री सुमनप्रभाजी म.सा. ने धर्मसभा को संबोधित किया। कार्यक्रम का संचालन आयुष गंग ने किया। इस अवसर पर सेवाभावी श्री दर्शनमुनिजी म.सा., प्रवचन प्रभाविका श्री सुमनप्रभाजी म.सा. ठाणा-8, महासती श्री चंदनबालाजी म.सा. एवं महासती श्री कल्पनाजी म.सा. मंचासीन रहे।
धर्मसभा में श्री धर्मदास जैन श्रीसंघ के सदस्यगण, श्री धर्मदास जैन मित्र मंडल ट्रस्ट, श्री सौभाग्य तीर्थ ट्रस्ट, श्री सौभाग्य जैन नवयुवक मंडल, श्री सौभाग्य प्रकाश युवक मंडल, श्री सौभाग्य जैन महिला मंडल, श्री सौभाग्य अणु बहु मंडल तथा श्री सौभाग्य प्रकाश बालक-बालिका मंडल सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।




0 टिप्पणियाँ