बाहरी बाधाओं में नहीं, तनाव का कारण अपने भीतर तलाशें : परम् पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा.
नागपुर, 22 सितंबर। धर्मदास संप्रदाय सुमेरु परम पूज्य गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने प्रवचन में कहा कि भगवान महावीर ने भव्य जीवों के कल्याण के लिए मोक्ष का मार्ग बताया है। उन्होंने अपने अनुभव से स्पष्ट किया कि जीव अपने सुख-दुःख का कारण स्वयं है। व्यक्ति स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु भी। इसके बावजूद जीव ने पर और जड़ पदार्थों में सुख मान लिया है। यही आसक्ति उसे बार-बार संसार के मोह में बांधती है।
गुरुदेव ने कहा कि व्यक्ति घूमने-फिरने, विदेश यात्राओं और भौतिक साधनों में सुख तलाशता है, जबकि अनेक भवों से वह इन्हीं पदार्थों के पीछे भटकता आया है। इससे पता चलता है कि अभी धर्म का वास्तविक अवतरण हृदय में नहीं हुआ है। संसार में वास्तव में देखने लायक कुछ स्थायी नहीं है। पुद्गलों के प्रति आसक्ति के कारण ही व्यक्ति बाहरी सुखों को आनंद समझता है। उन्होंने कहा कि ईर्ष्या, जलन और चिंता व्यक्ति को भीतर से परेशान कर रहे हैं, फिर भी जीव बाहरी सुखों में आनंद खोज रहा है।
कर्तव्य बुद्धि बनाएं, ममत्व में न उलझें
पूज्य गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि हर जीव साधु नहीं बन सकता, लेकिन अपनी बुद्धि को कर्तव्य बुद्धि तो बना सकता है। समस्या यह है कि हम कर्तव्य बुद्धि के स्थान पर ममत्व बुद्धि को प्रधानता दे देते हैं। आत्मा का वास्तविक सुख शांति है, इसलिए प्रश्न यह होना चाहिए कि जब शांति आत्मा का स्वभाव है तो फिर अनावश्यक आसक्ति क्यों?
उन्होंने कहा कि जीवन रूपी रंगमंच पर प्रतिकूल परिस्थितियां आती रहती हैं। असफलता, आपत्ति और विपत्ति से बड़ा कोई विद्यालय नहीं है। ठोकर लगने से ही इंसान संभलकर चलना सीखता है। लेकिन व्यक्ति विपरीत परिस्थिति आते ही घबरा जाता है और तरह-तरह की आशंकाओं में उलझकर तनाव को आमंत्रित कर लेता है।
तनाव को बाहरी बाधा मानने के बजाय कारण समझें
गुरुदेव ने कहा कि कई बार व्यक्ति तनाव और मानसिक परेशानी को बाहरी बाधा मान लेता है और तंत्र-मंत्र, टोने-टोटके तथा धागे-डोरे की उलझनों में फंस जाता है। पैर और कलाई में धागे बांधने से समस्या का समाधान नहीं होता। जरूरत इस बात की है कि व्यक्ति अपने भीतर चल रही चिंता, भय, तनाव और भावनात्मक दबाव को समझे।
उन्होंने एक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि एक व्यक्ति अपनी पत्नी और बहन को लेकर उनके पास आया और उसने इसे बाहरी बाधा बताया। बातचीत करने पर पता चला कि वास्तविक समस्या घर के व्यवहार में थी। पति का बार-बार गुस्सा करना, चिल्लाना, अपशब्द कहना और कठोर व्यवहार करना ही पत्नी के तनाव का बड़ा कारण था। गुरुदेव ने समझाया कि उसे किसी बाहरी बाधा की नहीं, बल्कि प्रेम और सहारे की आवश्यकता है।
उदास व्यक्ति को डांट नहीं, सहारा चाहिए
पूज्य गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि कोई व्यक्ति तनाव में दिखाई दे तो उससे प्रेमपूर्वक व्यवहार करें। छोटी-छोटी बातों को भूलना, काम में बार-बार गलतियां होना, गुमसुम रहना या उत्साह कम होना जैसे बदलावों को गंभीरता से समझने की जरूरत है। ऐसे समय व्यक्ति को अकेला छोड़ने के बजाय उसकी बात सुननी चाहिए और आवश्यकता होने पर परिवार तथा विशेषज्ञ की सहायता लेनी चाहिए।
उन्होंने पिता-पुत्र का उदाहरण देते हुए कहा कि दुकान पर काम करते समय बेटे से थोड़ी गलती हो गई और आर्थिक नुकसान हो गया। पिता ने गलती पर उसे खूब डांटा और अपशब्द कहे। इससे बेटा तनाव में आ गया। तनाव बढ़ने के साथ उसका आत्मविश्वास कम होता गया और काम में गलतियां भी बढ़ती गईं। गुरुदेव ने कहा कि गलती को सुधारने के लिए डांट से अधिक प्रेम और समझाइश प्रभावी होती है।
अपेक्षाओं का दबाव भी बन सकता है तनाव का कारण
उन्होंने कहा कि विशेषकर नई जिम्मेदारियों में व्यक्ति कई तरह की चिंताओं से घिर सकता है। नई शादी, नई जिम्मेदारियां और सभी को खुश रखने की अपेक्षा मन पर दबाव बना सकती है। ऐसे में परिवार को व्यक्ति की स्थिति समझकर उसे सहयोग और विश्वास देना चाहिए।
गुरुदेव ने एक प्रसंग के माध्यम से बाहरी बाधा की धारणा पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कई बार लोग किसी व्यक्ति के असामान्य व्यवहार को तुरंत किसी देवी-देवता या बाहरी शक्ति का प्रभाव मान लेते हैं। लेकिन परिस्थिति बदलते ही वही व्यक्ति सामान्य व्यवहार करने लगता है। इससे स्पष्ट होता है कि समस्या को अंधविश्वास से जोड़ने के बजाय उसके वास्तविक कारण को समझना जरूरी है।
बच्चों पर अपेक्षाओं का अनावश्यक बोझ न डालें
गुरुदेव ने अभिभावकों को सावधान करते हुए कहा कि बच्चों पर अपनी अपेक्षाओं का अनावश्यक दबाव नहीं डालना चाहिए। हर बच्चे की क्षमता अलग होती है। बच्चे की परेशानी को समझना, उसकी बात सुनना और उसे यह विश्वास दिलाना कि परिवार उसके साथ है, अत्यंत आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि कई बार हमारे शब्द भी किसी के मन पर गहरा प्रभाव डाल देते हैं। इसलिए बोलते समय सावधानी रखें। गुस्से में कहे गए शब्द लंबे समय तक किसी के मन में रह सकते हैं। परिवार में संवाद और प्रेम का वातावरण तनाव को बढ़ने से रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
पूज्य गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि जीवन में गलतियां सभी से होती हैं। गलती को बार-बार याद करके दुखी होने के बजाय उससे सीख लेकर आगे बढ़ना चाहिए। हम अक्सर पुरानी घटनाओं को मन में लेकर चलते रहते हैं—उसने ऐसा किया, उसने वैसा किया—और उसी बोझ को जीवनभर ढोते रहते हैं। उन्होंने कहा कि भूतकाल को बदला नहीं जा सकता, लेकिन वर्तमान में अपने व्यवहार को जरूर बदला जा सकता है।
उन्होंने वचन व्यवहार और चेहरे के भावों के प्रति भी सावधानी रखने की सीख दी। हमारे शब्द और व्यवहार बैर की श्रृंखला को जन्म दे सकते हैं। इसलिए किसी भी जीव को हीन दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। प्रत्येक जीव तिरस्कार का नहीं, अनुकम्पा का पात्र है। “पापी से नहीं, पाप से घृणा करो” का संदेश देते हुए उन्होंने करुणा और मैत्री का भाव रखने की प्रेरणा दी।
किसी की चिंता सुन लेना भी बड़ी सेवा
गुरुदेव ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति उदास, चिंतित या परेशान दिखाई दे तो उससे प्रेमपूर्वक बात करें और उसकी चिंता का कारण जानने का प्रयास करें। कई बार व्यक्ति को तत्काल समाधान से पहले किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत होती है जो उसकी बात ध्यान से सुने और उसे भरोसा दिलाए कि वह अकेला नहीं है।
उन्होंने कहा कि “कुछ नहीं होगा, हम सब तुम्हारे साथ हैं, सब ठीक होगा” जैसे शब्द किसी निराश व्यक्ति में भी विश्वास और हिम्मत जगा सकते हैं। गलतियों पर नाराज होने के बजाय प्रेम से समझाकर सुधार का अवसर देना चाहिए। वचन व्यवहार के समय विशेष सावधानी बरतना जरूरी है, क्योंकि हमारे बोले हुए शब्द किसी के मन में तनाव भी पैदा कर सकते हैं और प्रेमपूर्ण शब्द उसके मनोबल को बढ़ा सकते हैं।
प्रवचन के अंत में पूज्य गुलाब मुनिजी म.सा. ने श्रावक के वचन व्यवहार से जुड़े सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारे व्यवहार, वाणी, विचार और दूसरों के प्रति संवेदना में भी दिखाई देना चाहिए। आत्मबल, संयम, प्रेम, करुणा और समता को जीवन में उतारना ही वास्तविक धर्म साधना है।
Dr.Talera's Multi-speciality Dental Clinic, Thandla


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