आसक्ति संसार में अनेक मतभेदों और संघर्षों का कारण बनती है

आसक्ति से ममत्व, ममत्व से भय और भय से क्रूरता जन्म लेती है : परम् पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा.
समत्व से आती है निर्भयता, निर्भयता से प्रेम और प्रेम से आत्मीयता का भाव जागता है

नागपुर, 18 सितंबर। धर्मदास संप्रदाय सुमेरु परम पूज्य गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि भगवान महावीर ने अपने अनुभव से जीवों के कल्याण के लिए मोक्ष का मार्ग बताया है। संसार में मुख्य रूप से दो मार्ग हैं—एक कल्याण का और दूसरा पाप का। हमें दोनों मार्गों को सुनकर, समझकर और विचार करके उस मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए, जो हमारी आत्मा के लिए हितकारी हो। मनुष्य संसार में भटक रहा है तो उसका सबसे बड़ा कारण आसक्ति है। आसक्ति ऐसी होती है जो आ तो जाती है, लेकिन सहजता से जाती नहीं है।

गुरुदेव ने कहा कि आसक्ति इतनी शक्तिशाली होती है कि वह त्यागी, वैरागी और तपस्वी तक को भी मार्ग से विचलित कर सकती है। 

आसक्ति का अर्थ ही है—जो आ सकती है, लेकिन जल्दी जाती नहीं। शरीर में विषयों की आसक्ति होती है और विचारों में कषायों की आसक्ति। यही विचारों की आसक्ति संसार में अनेक मतभेदों और संघर्षों का कारण बनती है। कई बार व्यक्ति धर्म के लिए लड़ने तक को तैयार हो जाता है, लेकिन धर्म के मूल सिद्धांतों के अनुरूप जीवन जीने को तैयार नहीं होता। पाप का विचार भी कर्मबंध का कारण बनता है और प्रत्येक क्षण जीव नए कर्मों का बंध करता रहता है।

पद-प्रतिष्ठा का ममत्व भय को जन्म देता है

पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि लाभ कर्म के उदय से जीव को पद और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। लेकिन जब पद, प्रतिष्ठा और सम्मान के प्रति ममत्व पैदा हो जाता है तो उसके साथ भय भी जन्म लेता है। व्यक्ति सोचने लगता है—मेरा पद चला गया तो क्या होगा? मेरी प्रतिष्ठा कम हो गई तो क्या होगा? किसी ने मेरे ऊपर कलंक लगा दिया तो क्या होगा? यही भय धीरे-धीरे क्रूरता को जन्म देता है।

उन्होंने कहा कि यश और कीर्ति की आसक्ति भी जीव को बांध लेती है। मेरा नाम क्यों नहीं आया, मेरा नाम क्यों हटा दिया गया, मेरा नाम क्यों नहीं लिया गया—ऐसे विचार मनुष्य को भीतर से अशांत करते हैं। यदि कोई सत्कर्म भी केवल नाम, यश अथवा प्रतिष्ठा की आसक्ति से किया जा रहा है तो उसकी भावना निर्मल नहीं रह जाती।

ममत्व पहले भय पैदा करता है, भय क्रूरता को जन्म देता है और क्रूरता जीव को दुर्गति की ओर ले जाती है। इसलिए जीवन में पद से अधिक कर्तव्य, प्रतिष्ठा से अधिक विनय और अधिकार से अधिक आत्मसंयम को महत्व देना चाहिए।

पुण्य और बुद्धि जीवन की रक्षा करते हैं

प्रवचन में गुरुदेव ने एक शिष्य का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि एक शिष्य पुण्य के उदय से निरंतर सम्मान प्राप्त कर रहा था। गुरु के सामने भी सभी लोग उसी शिष्य की प्रशंसा करते थे। स्थिति यहां तक पहुंच गई कि गुरु की पहचान भी शिष्य के नाम से होने लगी। लेकिन यह याद रखना चाहिए कि व्यक्ति का पुण्य और उसकी बुद्धि उसके साथ चलते हैं।

एक बार वह शिष्य गोचरी के लिए एक घर में गया। वहां की नववधू उस पर मोहित हो गई और जब वह गोचरी लेकर लौटने लगा तो उसने उसकी चादर पकड़ ली। शिष्य किसी प्रकार वहां से स्वयं को बचाकर बाहर निकला और स्थानक पहुंच गया। उसने सोचा कि गुरु भगवंत को सारी बात बता दे, लेकिन परिवार की बदनामी के विचार से उसने किसी को कुछ नहीं बताया।

बाद में उस नववधू को अपने किए पर गहरा पश्चाताप हुआ। उसने सोचा कि जैसे शरीर की बीमारी के लिए डॉक्टर की आवश्यकता होती है, वैसे ही आत्मा की बीमारी के लिए गुरु भगवंत का मार्गदर्शन आवश्यक है। वह बड़े गुरु भगवंत के पास पहुंची और पूरी बात बताई।

गुरु भगवंत के मन में पहले से ही शिष्य को बदनाम करने की भावना थी। उन्होंने अगले दिन नववधू को आलोचना के लिए बुलाया और अपने कुछ खास लोगों को चारों ओर बैठा दिया। जब नववधू वहां पहुंची तो वातावरण देखकर उसे संदेह हुआ कि उसकी बात का गलत अर्थ निकाला जा सकता है। उसने अपनी बुद्धि का प्रयोग किया और घटना को सपने के रूप में प्रस्तुत कर दिया। उसने कहा कि उसने शिष्य की चादर पकड़ी थी और तभी सपना अधूरा रह गया।

गुरुदेव ने कहा कि किसी व्यक्ति पर कलंक लगाने के लिए लोग अनेक प्रकार के प्रयास कर सकते हैं, लेकिन सत्य, पुण्य और विवेक अंततः रक्षा का मार्ग बनते हैं।

‘मैं’ और ‘मेरा’ ही अनेक विवादों की जड़

गुरुदेव ने एक अन्य प्रसंग के माध्यम से ममत्व की सूक्ष्मता समझाई। एक बड़े घर में प्रतिदिन दूध से छाछ बनाई जाती थी। एक दिन किसी कारण से छाछ नहीं बनी। छाछ लेने आई महिला को बहू ने बताया कि आज छाछ नहीं बनी है। रास्ते में उसकी सास मिली तो उसने भी यही बात कही।

सास को यह बात खटक गई कि बहू उसे बताने वाली कौन होती है। वह उस महिला को अपने साथ घर ले आई और स्वयं भी वही बात दोहराई कि आज छाछ नहीं बनी है। गुरुदेव ने कहा कि यहां वास्तविक समस्या छाछ की नहीं, बल्कि ‘मैं’ और ‘मेरा’ के ममत्व की थी। जब व्यक्ति अपने अधिकार, अपने सम्मान और अपनी बात को सर्वोपरि मानने लगता है, वहीं से विवाद की शुरुआत हो जाती है।

जंबूकुमार ने आसक्ति के बिना वैभव का त्याग किया

गुरुदेव ने जंबूकुमार का उदाहरण देते हुए कहा कि उनके सामने वैभव की कोई कमी नहीं थी। आठ-आठ सुंदर रानियां, मूल्यवान उपहार और अपार संपदा उनके जीवन में थी। इसके बावजूद उनमें आसक्ति नहीं थी। उनके जीवन में ऐसी परिस्थितियां बनीं कि अनेक लोगों के भीतर एक साथ वैराग्य का भाव जागा और उन्होंने संसार का त्याग कर दिया।

उन्होंने कहा कि वैभव होना बंधन नहीं है, वैभव के प्रति आसक्ति होना बंधन है। वस्तुएं हमारे पास रहें, लेकिन मन उन वस्तुओं का दास न बने—यही साधना है।

ममत्व छोड़कर समत्व को अपनाना होगा

पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि हमें ममत्व नहीं, समत्व रखना है। संसार में जो कुछ घट रहा है, वह अपने कर्मों के उदय से घट रहा है। इसलिए प्रत्येक परिस्थिति में यह विचार करना चाहिए कि यह मेरे कर्मों का परिणाम है। किसी दूसरे को दोष देने से समस्या समाप्त नहीं होती, बल्कि नए कर्मों का बंध शुरू हो जाता है।

उन्होंने कहा कि जब भी किसी दूसरे व्यक्ति में दोष दिखाई दे तो सावधान हो जाना चाहिए, क्योंकि संभव है कि हमारे भीतर क्रूरता का भाव जन्म ले रहा हो। जिन लोगों ने हमारे जीवन में उपकार किए हैं, उनके प्रति थोड़ी सहनशीलता और सावधानी रखना हमारा कर्तव्य है।

‘वह कौन होता है मुझे बोलने वाला?’—यह भाव अहंकार और ममत्व को जन्म देता है। इसके बाद मनुष्य प्रतिक्रिया करता है और कर्मबंध की नई श्रृंखला शुरू हो जाती है।

लड्डू की आसक्ति ने मुनिराज को भी भ्रमित कर दिया

गुरुदेव ने आसक्ति की सूक्ष्मता समझाने के लिए एक मुनिराज का प्रसंग भी सुनाया। एक बार गोचरी के दौरान उन्हें लड्डू मिले। लड्डू उन्हें बहुत प्रिय थे। गोचरी के बाद भी उनका मन उन्हीं लड्डुओं में अटका रहा। शाम हुई, रात हुई, लेकिन विचारों में लड्डू ही चलते रहे।

चांदनी रात में मुनिराज को भ्रम हुआ कि सुबह हो गई है। वे गोचरी की झोली लेकर निकलने लगे। पास बैठे एक श्रावक ने उनकी स्थिति समझ ली, लेकिन उन्हें कुछ नहीं कहा। बाहर अंधेरा देखकर मुनिराज को अपनी भूल का अहसास हुआ।

गुरुदेव ने कहा कि यह प्रसंग बताता है कि आसक्ति कितनी सूक्ष्म होती है। वह केवल धन, पद या प्रतिष्ठा की ही नहीं होती, छोटी से छोटी वस्तु के प्रति भी हो सकती है और वही आसक्ति साधक को भी उसके मार्ग से भटका सकती है।

समत्व से निर्भयता और प्रेम का जन्म

पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि उच्च गोत्र कर्म के उदय से पद और प्रतिष्ठा मिलती है तथा शुभ नाम कर्म के उदय से यश-कीर्ति प्राप्त होती है। लेकिन हमारा कर्तव्य यह देखना है कि इन परिस्थितियों के बीच हमारा आचरण कैसा है।

उन्होंने कहा कि जीवन में यह देखना चाहिए कि हमारा कर्तव्य क्या है। हम कहां से कहां पहुंच गए हैं, इसका आत्मचिंतन जरूरी है। समत्व से निर्भयता आती है। निर्भयता से प्रेम पैदा होता है। प्रेम से आत्मीयता का भाव जागता है और आत्मीयता जीव को मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ाती है।

गुरुदेव कहा कि संसार में कोई भी जीव पराया नहीं है। सभी जीव अपने हैं। इसलिए प्रत्येक जीव का सम्मान करना चाहिए। प्रेम के लिए हृदय में कोमलता आवश्यक है।

हृदय मक्खन के समान कोमल होना चाहिए, जिसमें प्रत्येक जीव के लिए स्थान हो।

त्याग नहीं कर सकते तो सहन करना सीखें

गुरुदेव ने कहा कि हर व्यक्ति त्याग और तप कर सके, यह आवश्यक नहीं है। लेकिन हर व्यक्ति सहन करना तो सीख सकता है। कोई कुछ कहे तो तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय यह विचार करें कि उसके भीतर जो था, उसने वही बाहर निकाला है। हमें शांति रखनी है, सहन करना है और सावधान रहना है।

उन्होंने कहा कि जीव स्वयं अपनी ही गलतियों और विचारों के कारण दुखी होता है। विचारों की आसक्ति उसे पता नहीं कहां से कहां पहुंचा देती है। इससे बचने के लिए मन को शांत रखना, परिस्थितियों को सहन करना, हर कदम पर सजग रहना और हृदय को कोमल बनाए रखना आवश्यक है।

प्रवचन के अंत में श्री गुलाब मुनिजी ने कहा कि ममत्व जीव को बांधता है, जबकि समत्व उसे मुक्त करता है। इसलिए जीवन में ‘मेरा’ और ‘मैं’ के भाव को कम करते हुए प्रत्येक परिस्थिति को कर्मों का उदय मानकर स्वीकार करना चाहिए। शांति, सहनशीलता, सावधानी, कोमलता और समत्व के साथ जीवन जीने से आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।

Dr.Talera's Multi-speciality Dental Clinic, Thandla 



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