पूज्य श्री राजेशमुनिजी म.सा. के सान्निध्य में 138वें संथारा के प्रत्याख्यानपानीपत, 19 सितंबर (सम्यक दृष्टि, अंकित जैन) धर्मनगरी पानीपत में शनिवार को जैन समाज के लिए आध्यात्मिक एवं भावपूर्ण अवसर रहा। पूज्य गुरुदेव तपकेसरी, उग्र विहारी, महाअभिग्रहधारी, गोल्डन बुक अवार्ड से सम्मानित, वर्तमान गुरु वेणी श्री एवं सर्वधर्म दिवाकर ‘शेरे पंजाब’ पूज्य राजेशमुनिजी म.सा. की पावन निश्रा में 138वें संथारा के प्रत्याख्यान हुए। यह पूज्य राजेशमुनिजी म.सा. द्वारा करवाए गए 138वें संथारा के प्रत्याख्यान हैं।
इस अवसर पर मलिक एन्कलेव, पानीपत (हरियाणा) निवासी संथारा साधिका श्रीमती प्रेमलता बाई ने संथारा के प्रत्याख्यान ग्रहण किए। साधिका के इस आध्यात्मिक संकल्प के अवसर पर उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं में धर्मभावना एवं आत्मसाधना के प्रति श्रद्धा का वातावरण बना। समाजजनों ने साधिका के आध्यात्मिक पुरुषार्थ की अनुमोदना करते हुए उनके लिए मंगलभाव व्यक्त किया।
संथारा का महत्व: जैन दर्शन में संथारा आत्मसंयम, वैराग्य और समता की साधना के रूप में वर्णित है। जीवन के अंतिम चरण में राग-द्वेष, मोह एवं सांसारिक आसक्तियों से दूर रहते हुए शांत एवं संयमित भाव से आत्मसाधना का संकल्प लिया जाता है। जैन परंपरा में इसे आत्मशुद्धि, समता और कर्मनिर्जरा की साधना से जोड़ा गया है।
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