क्षमा को जीवन का ईंधन बनाएं, बैर की गांठ छोड़ें : परम् पूज्य गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा.
भविष्य उज्ज्वल बनाना है तो भूतकाल को भूलकर अच्छे व्यवहार को याद रखें — पर्यूषण के सातवें दिन बताए सात भय
नागपुर, 14 सितंबर (सम्यक दृष्टि) महापर्व पर्यूषण के सातवें दिन धर्मदास संप्रदाय सुमेरु परम पूज्य गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि भगवान महावीर ने अपने अनुभव से जीवों के तिरने का मार्ग बताया है। देव और गुरु मार्गदर्शन दे सकते हैं, लेकिन उस मार्ग पर चलने का पुरुषार्थ स्वयं को ही करना होगा। क्षमा धर्म की आराधना और जिनवाणी में लीनता ही आत्मिक शांति का श्रेष्ठ साधन है।
गुरुदेव ने कहा कि भविष्य को उज्ज्वल बनाना है तो भूतकाल को भूल जाएं, गलत व्यवहार को भूलें और अच्छे व्यवहार को याद रखें। जीवन को उज्ज्वल बनाने के लिए व्यक्ति को स्वयं में परिवर्तन लाना होगा। अनंत ऐश्वर्य के धनी भगवान महावीर के अनुयायी होने के बावजूद यदि व्यक्ति तंत्र-मंत्र और अंधविश्वास के चक्कर में इधर-उधर भटकता है तो यह उचित नहीं है। धर्म ही आत्म-समाधि का श्रेष्ठ साधन है।
क्षमा से रिश्तों में आती है शांति
पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि पर्यूषण पर्व जीवों के साथ बैर मिटाने का अनुपम अवसर है। किसी ने हमारे साथ गलत व्यवहार किया तो यह चिंतन करें कि मेरे पुण्य की कमी रही होगी, तभी सामने वाले से ऐसा व्यवहार मिला। उन्होंने परीक्षा का उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे विद्यार्थी को उसी के लिखे उत्तरों के आधार पर अंक मिलते हैं, वैसे ही पूर्व भव में किए गए कर्मों के अनुसार वर्तमान जीवन में परिणाम प्राप्त होते हैं।
उन्होंने कहा कि सामने वाले में पात्रता की कमी है, ऐसा सोचकर क्षमा भाव जागृत करें। भाई-बहन, सास-बहू, पति-पत्नी सहित प्रत्येक रिश्ते में कहीं न कहीं अपेक्षाओं और व्यवहार की कमी हो सकती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि रिश्ते सुधर नहीं सकते। अपने कर्मों का दोष मानकर सामने वाले को क्षमा कर दिया जाए तो रिश्तों में जीत निश्चित है।
उन्होंने कहा कि जैसे गाड़ी चलाने के लिए पेट्रोल आवश्यक है, वैसे ही परिवार को चलाने के लिए क्षमा रूपी पेट्रोल आवश्यक है। क्षमा ही जीवन की चालक है। हर समय इसने ऐसा किया, उसने वैसा किया, मैं क्यों बात करूं—इस तरह के भाव रखने से मन अशांत होता है। क्षमा करके देखें, निश्चित रूप से शांति मिलेगी।
उन्होंने कहा कि जो अपना है वह जाएगा नहीं और जो अपना नहीं है वह वापस आएगा नहीं। इसलिए वर्तमान में क्षमा धर्म को अपना लिया जाए तो भविष्य में अशांति की नींव नहीं पड़ेगी। परम शांति के लिए हृदय में सरलता रखना और प्रत्येक जीव को स्थान देना आवश्यक है।
बैर की गांठ अनेक भवों तक परेशान करती है
पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि शरीर में होने वाली बीमारी की गांठ एक भव तक परेशान कर सकती है, लेकिन बैर की गांठ अनेक भवों तक जीव को परेशान करती है। क्षमा को स्वीकार करने से नरक और तिर्यंच गति से बचने का मार्ग प्रशस्त होता है। जीवन कुछ ही दिनों का है, इसलिए बैर की गांठ बांधकर रखना व्यर्थ है।
उन्होंने पर्यूषण के सातवें दिन सात भय बताए, जो मनुष्य को निरंतर भयभीत करते हैं।
1. इहलोक भय : मनुष्य को दूसरे मनुष्य से भय रहता है। चोर, लुटेरे, डाकू, अधिकारी और आतंकवादी आदि का भय इसके उदाहरण हैं। उन्होंने एक प्रसंग सुनाते हुए बताया कि एक घर में जांच के दौरान धार्मिक पुस्तकों के बीच रखी गलत कामों की डायरी तक अधिकारी नहीं पहुंच पाया। सेठानी का आत्मविश्वास धर्म की शक्ति से बना था। संदेश यह है कि धर्म और सदाचार से जीवन में निर्भीकता आती है।
2. परलोक भय : देवी-देवताओं, पशु-पक्षियों और अन्य जीवों का भय भी मनुष्य को सताता है। नारियल नहीं चढ़ाया, दीपक नहीं किया, धोक नहीं दी या मानता पूरी नहीं हुई—ऐसे अनेक भय मन में बने रहते हैं। उन्होंने कहा कि धर्म को समझपूर्वक अपनाने की आवश्यकता है। प्रत्येक जीव के प्रति बैर नहीं, बल्कि मैत्री और अनुकंपा का भाव रखना चाहिए।
3. आदान भय : आवश्यकताओं को सीमित करने का संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि कमाई में कभी लाभ तो कभी नुकसान होता है, लेकिन आवश्यकता कम कर ली जाए तो समस्या स्वतः कम हो जाती है। उन्होंने विनोबा भावे से जुड़ा प्रसंग सुनाते हुए कहा कि मजदूरों की मजदूरी बढ़ाने की मांग के साथ उनसे अनावश्यक खर्च और नशे जैसी आदतें छोड़ने का आग्रह किया गया था। जीवन में संयम अपनाने से आर्थिक भय कम किया जा सकता है।
4. आकस्मिक भय : दुर्घटना या अचानक कोई अनहोनी होने का भय भी व्यक्ति को परेशान करता है। उन्होंने कहा कि भविष्य की अनिश्चित घटनाओं की चिंता में वर्तमान जीवन को अशांत नहीं करना चाहिए।
5. आजीविका भय : रोजी-रोटी को लेकर भयभीत रहने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि प्रकृति प्रत्येक जीव की आवश्यकताओं की पूर्ति का मार्ग बनाती है। समाज के संपन्न लोग अपने धन का सदुपयोग कर साधर्मी और जरूरतमंदों की सहायता करें तो इससे किसी का अहित नहीं होता, बल्कि अनेक परिवारों की आजीविका चल सकती है।
6. मरण भय : मृत्यु का भय मनुष्य के मन में बना रहता है। उन्होंने कहा कि जो आया है उसे एक दिन जाना ही है। मृत्यु निश्चित है, इसलिए उससे भयभीत रहने के बजाय जीवन को धर्ममय बनाने और उसके लिए मानसिक रूप से तैयार रहने की आवश्यकता है।
7. अपयश-कीर्ति भय : समाज में अपनी प्रतिष्ठा और इज्जत को लेकर मनुष्य कई बार भयभीत रहता है। उन्होंने कहा कि अनावश्यक प्रतिष्ठा के मोह से मुक्त होकर धर्म और आत्मकल्याण पर ध्यान देना चाहिए।
श्री गुलाब मुनिजी ने कहा कि भय में रहने से व्यक्ति की शक्ति और शांति दोनों प्रभावित होती हैं। इसलिए विचार करना होगा कि जीवन भय में बिताना है या धर्म आराधना के मार्ग पर चलना है। क्षमा धर्म की आराधना, मैत्री भाव और सरलता को जीवन में उतारने वाला व्यक्ति भीतर से निर्भीक बनता है।
प्रवचन का सार यह है कि पर्यूषण पर्व को केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित न रखते हुए क्षमा, आत्मचिंतन, मैत्री और संयम को जीवन का हिस्सा बनाएं। यही पर्व की सार्थक आराधना होगी।
Dr.Talera's Multi-speciality Dental Clinic, Thandla


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