प्रवर्तकश्री ने कहा कि आचार्यश्री के हम सभी पर बहुत उपकार हैं।

सरलता, सादगी और वात्सल्य के प्रतीक हैं आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनिजी म.सा. : प्रवर्तक श्री प्रकाशमुनिजी म.सा.

85वीं जयंती पर असंख्य श्रावक-श्राविकाओं ने की दो-दो सामायिक, धर्मसभा में हुआ गुणानुवाद

रतलाम, 18 सितंबर (सम्यक दृष्टि न्यूज़, प्रकाश मुन्नत)

मोहन टाकीज स्थित श्री सौभाग्य प्रकाश दरबार में शुक्रवार को आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनिजी म.सा. की 85वीं जयंती श्रद्धा, भक्ति और साधनामय वातावरण में सामायिक दिवस के रूप में मनाई गई। इस अवसर पर असंख्य श्रावक-श्राविकाओं ने दो-दो सामायिक कर आत्मसाधना का संकल्प लिया। विशाल धर्मसभा में श्रमण संघीय प्रवर्तक श्री प्रकाशमुनिजी म.सा. ने आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनिजी म.सा. के जीवन, साधना, सरलता और वात्सल्य का गुणानुवाद किया।

प्रवर्तक श्री प्रकाशमुनिजी म.सा. ने कहा कि आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनिजी म.सा. को वर्षीतप करते हुए 42 वर्ष हो चुके हैं। उनका जीवन सरलता, सादगी और वात्सल्य का प्रतीक है। उनका साधक जीवन अत्यंत ऊर्जावान है। दुनियादारी से दूर रहकर वे निरंतर अपने कर्मों की निर्जरा और आत्मकल्याण की साधना में संलग्न हैं। उन्होंने साधकों को प्रतिक्रिया में उलझने के बजाय आत्मचिंतन और साधना के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी है।

उन्होंने कहा कि आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनिजी म.सा. के मन में प्रत्येक साधक के प्रति वात्सल्य का भाव है। वे छोटे से छोटे साधक का भी सम्मान करते हैं। उनकी साधना में ध्यान का विशेष महत्व है, इसलिए उन्हें ध्यानयोगी कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी। उनकी सजल आत्मा में कठोरता का कोई भाव नहीं है। वे लंबे समय तक साधना करते हुए संघ के संचालन का दायित्व भी अत्यंत कोमल भाव से निभाते हैं। प्रवर्तकश्री ने कहा कि आचार्यश्री के हम सभी पर बहुत उपकार हैं। उन्होंने उनकी आत्मा के कल्याण की मंगलकामना करते हुए कहा कि उनके मार्गदर्शन और संचालन में श्रमण संघ निरंतर जयवंत बना रहे।

सामायिक साधना से पापों से दूर रहने का संदेश

धर्मसभा में प्रवर्तकश्री ने सामायिक साधना के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं से पापों से मुक्त रहने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि पाप से संताप, संताप से ताप और फिर पश्चाताप उत्पन्न होता है। जब पश्चाताप की धारा बहती है तो पापों के संस्कार धुलने लगते हैं। उन्होंने कहा कि जब तक व्यक्ति अपने किए हुए पापों के प्रति वास्तविक पश्चाताप नहीं करता, तब तक उनके प्रति आसक्ति बनी रहती है। आसक्ति समाप्त होने पर ही विरक्ति का भाव उत्पन्न होता है।

उन्होंने कहा कि विरक्ति और आत्मशुद्धि के लिए साधनामय जीवन आवश्यक है। सामायिक करते समय हमारा उद्देश्य केवल बाहरी रूप से सामायिक पूरी करना नहीं, बल्कि मन-वचन-काया को साधना में लगाना होना चाहिए। उन्होंने कहा कि संसार की अनावश्यक उलझनों से स्वयं को दूर रखना और आत्मा की ओर लौटना ही सच्ची साधना का मार्ग है।

धर्मसभा को प्रवचन प्रभाविका श्री सुमनप्रभाजी म.सा. ने भी संबोधित किया। कार्यक्रम का शुभारंभ सेवाभावी श्री दर्शनमुनिजी म.सा. द्वारा प्रस्तुत स्तवन से हुआ। इस अवसर पर प्रवर्तकश्री के सानिध्य में अनेक तपस्वियों ने विभिन्न तपस्याओं के प्रत्याख्यान ग्रहण किए।

धर्मसभा में प्रवचन प्रभाविका श्री सुमनप्रभाजी म.सा. ठाणा-8, महासती श्री चंदनबालाजी म.सा. एवं महासती श्री कल्पनाजी म.सा. मंचासीन रहीं। कार्यक्रम का संचालन आयुष गंग ने किया।

इस अवसर पर श्री धर्मदास जैन श्री संघ के सदस्यगण, श्री धर्मदास जैन मित्र मंडल ट्रस्ट, श्री सौभाग्य तीर्थ ट्रस्ट, श्री सौभाग्य जैन नवयुवक मंडल, श्री सौभाग्य प्रकाश युवक मंडल, श्री सौभाग्य जैन महिला मंडल, श्री सौभाग्य अणु बहु मंडल तथा श्री सौभाग्य प्रकाश बालक-बालिका मंडल के सदस्यगण सहित बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।

Dr.Talera's Multi-speciality Dental Clinic, Thandla 



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