जगत को माफ करो, स्वयं को साफ करो और जगतपति को याद करो : परम् पूज्य गुलाब मुनि म.सा.
पर्युषण पर्व के पांचवें दिन क्षमा धर्म की आराधना पर दिया प्रेरक प्रवचन, कहा- क्षमा से टूटे दिल जुड़ते हैं और जीवन की दिशा बदलती है
नागपुर, 12 सितंबर। धर्मदास संप्रदाय सुमेरु परम पूज्य गुरुदेव श्री गुलाब मुनि जी म.सा. ने पर्युषण महापर्व के पांचवें दिन क्षमा धर्म की महत्ता बताते हुए कहा कि जब तक संसार के समस्त जीवों को हृदय से माफ नहीं करेंगे, तब तक आध्यात्मिक प्रगति संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि “जगत को माफ करो, स्वयं को साफ करो और जगतपति को याद करो, तो जगतपति जैसे बन जाओगे।”
प्रवचन में उन्होंने कहा कि पर्युषण पर्व जीवन की दशा और दिशा बदलने का अवसर लेकर आता है। अर्जुन माली, रोहिणी चोर तथा परदेशी राजा के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उचित निमित्त मिलने पर व्यक्ति के जीवन में बड़ा परिवर्तन संभव है। परदेशी राजा ने लंबे समय तक हिंसा की, लेकिन केशीकुमार का संयोग मिलने पर मात्र 40 दिनों में उसकी दशा और दिशा बदल गई। इसी प्रकार पर्युषण आत्मचिंतन और आत्मपरिवर्तन का पर्व है।
गुरुदेव ने दुख के दो स्वरूप बताते हुए कहा कि असाता और असमाधि व्यक्ति को भीतर से परेशान करते हैं। असाता से बचने के लिए अहिंसा और असमाधि से बचने के लिए क्षमा धर्म की आराधना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि अधिकांश मानसिक तनाव हमारे अपने आसपास के लोगों से जुड़े होते हैं। इसलिए जड़ वस्तुओं के लिए चेतन जीवों से संबंध खराब नहीं करना चाहिए। जो अपना है वह चला नहीं जाएगा और जो अपना नहीं है वह आएगा नहीं।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति जब अपनी धाक जमाने के लिए दूसरों का मालिक बनने का प्रयास करता है तो एक दिन उसे स्वयं भी पराधीनता का अनुभव करना पड़ता है। इसलिए जीवन में यह तय करना होगा कि हमें मालिक बनना है या चाहक। “मीठी जुबान, खुला हाथ और सारा जहान अपने साथ” का सूत्र अपनाने की प्रेरणा देते हुए उन्होंने कहा कि जीवन में मिली प्रत्येक वस्तु किराए पर मिली है, उसकी अवधि कब समाप्त होगी, किसी को पता नहीं। इसलिए जब तक जीवन और साधन मिले हैं, उनका सदुपयोग करना चाहिए।
सास नहीं, सासू मां बनें
पारिवारिक संबंधों पर बोलते हुए गुलाब मुनि जी ने कहा कि सास और सासू मां में बहुत अंतर है। यदि इस भव में सास बनते हैं तो अगले भव में बहू बनने की संभावना को भी याद रखना चाहिए। सास में यदि मां जैसा वात्सल्य और अपनापन होगा तो घर का वातावरण भी उसी अनुरूप बनेगा। उन्होंने कहा कि “सासू नहीं, सासू मां बनो और बहू नहीं, बेटी बनाओ।”
चाय की आदत का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जिस प्रकार कुछ लोग चाय के प्रति अत्यधिक आसक्त रहते हैं, उसी प्रकार यदि क्षमा के प्रति लगाव पैदा हो जाए तो जीवन धन्य हो सकता है। उन्होंने कहा कि हृदय को चाय की प्याली जितना विशाल बनाना चाहिए, जिसमें क्रोध और वैमनस्य का ताप भी क्षमा के भाव से शांत हो जाए।
गुरुदेव ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति गलत बोले, कलंक लगाए या व्यंग्य करे तो उसे अपने कर्मों का परिणाम मानकर क्षमा कर देना चाहिए। सत्य को बार-बार सफाई देने की आवश्यकता नहीं होती, वह समय आने पर स्वयं सामने आ जाता है। यदि गलती अपनी हो तो उसे स्वीकार कर सुधारने का प्रयास करना चाहिए।
क्षमा के पांच स्वरूप बताए
प्रवचन में क्षमा के पांच स्वरूप बताते हुए उन्होंने उपकार क्षमा, अपकार क्षमा, विपाक क्षमा, वचन क्षमा और स्वभाव क्षमा की व्याख्या की।
उपकार क्षमा के अंतर्गत माता-पिता, गुरुजनों, सेठ तथा जीवन में मार्गदर्शन देने वाले सभी व्यक्तियों और समस्त जीवों के प्रति कृतज्ञता एवं क्षमा का भाव रखने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि सभी जीव क्षमा के पात्र हैं और जिनका हम आदर करते हैं, उन्हें क्षमा करना भी सहज हो जाता है।
अपकार क्षमा में दूसरों के प्रतिकूल व्यवहार को सहन करते हुए मन में वैमनस्य न रखने की बात कही। विपाक क्षमा के माध्यम से उन्होंने समझाया कि क्षमा करते समय अपने वर्तमान को और क्षमा मांगते समय अपने भविष्य को देखना चाहिए।
वचन क्षमा के संबंध में उन्होंने कहा कि किसी के ऊंचा-नीचा बोलने पर भी मन को कठोर नहीं बनाना चाहिए। जीवन में तैरने के दो रास्ते हैं—नम जाओ या खम जाओ। क्षमा टूटे हुए दिलों को जोड़ने का काम करती है। धर्म दीवार नहीं, बल्कि पुल का काम करता है।
स्वभाव क्षमा समझाते हुए चंदन का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि चंदन को काटने वाले को भी वह अपनी सुगंध देता है और जलने पर भी वातावरण को सुगंधित करता है। उसी प्रकार व्यक्ति को हर परिस्थिति में क्षमा का भाव बनाए रखना चाहिए।
पुरुषार्थ से बदल सकती है जीवन की दिशा
गुरुदेव ने पुरुषार्थ का महत्व बताते हुए दादा और उनके दो पोतों की कथा सुनाई। उन्होंने कहा कि विपरीत परिस्थिति में व्यक्ति अपनी क्षमता से अधिक प्रयास कर सकता है। इसलिए “मैं यह नहीं कर सकता” जैसे बहाने छोड़कर थोड़ा पुरुषार्थ करना चाहिए। उन्होंने कहा कि गुरु भगवंत कल्याण के मित्र हैं और व्यक्ति को जगाने के लिए मार्गदर्शन देते हैं। उनके बताए मार्ग को स्वीकार कर जीवन में उतारने से कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।
उन्होंने कहा कि क्षमा मांगने और देने में अहंकार बाधा नहीं बनना चाहिए। माता-पिता, गुरुजन, परिजन और सभी जीवों के प्रति विनम्र होकर क्षमायाचना करनी चाहिए। मस्तिष्क के फ्रिज में वर्षों पुरानी बातों को ताजा रखकर दुखी होने के बजाय उन्हें क्षमा के माध्यम से बाहर निकालना होगा। सरलता, नम्रता और पुरुषार्थ से ही कर्मों का क्षय संभव है।
प्रवचन के अंत में उन्होंने सभी श्रावक-श्राविकाओं से पर्युषण पर्व को केवल परंपरा के रूप में नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, क्षमा, अहिंसा और व्यवहार परिवर्तन के पर्व के रूप में मनाने का आह्वान किया।
Dr.Talera's Multi-speciality Dental Clinic, Thandla


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