पराई वस्तु को भी अपना बनाने की इच्छा लोभ है

सारे पापों का मूल लोभ, पराई वस्तु को अपना बनाने की इच्छा ही लोभ : तत्वज्ञ धर्मेन्द्रमुनिजी म.सा.

पर्युषण महापर्व के प्रथम दिन विशाल धर्मसभा में आध्यात्मिक आराधना का संदेश, कहा—अधिक और जल्दी पाने की इच्छा भी लोभ

थांदला(सम्यक दृष्टि न्यूज़, मिलिंद कोठारी) पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व के प्रथम दिन मंगलवार को श्रीसंघ के तत्वावधान में विशाल धर्मसभा का आयोजन हुआ। धर्मसभा को संबोधित करते हुए तत्वज्ञ श्री धर्मेन्द्रमुनिजी म.सा. ने कहा कि पर्युषण महापर्व विशुद्ध रूप से आध्यात्मिक पर्व है। इन दिनों में की जाने वाली आराधना का उद्देश्य आत्मा की शुद्धि और भीतर जमी कषायों को दूर करना है। महापर्व को लेकर श्रावक-श्राविकाओं में विशेष उत्साह दिखाई दे रहा है।

पाप का बाप कौन? लोभ

तत्वज्ञ धर्मेन्द्रमुनिजी ने कहा कि यदि पूछा जाए कि “पाप का बाप कौन है?” तो उसका उत्तर है—लोभ। सारे पाप लोभ से ही पैदा होते हैं। लोभ ऐसी कषाय है, जो मनुष्य को लगातार अधिक पाने की इच्छा में उलझाए रखती है और सबसे अंत में नष्ट होती है। लोभ व्यक्ति को स्वयं के लिए भी दुखदाई बनाता है और दूसरों के लिए भी।

उन्होंने कहा कि पराई वस्तु को भी अपना बनाने की इच्छा लोभ है। जो वस्तु अपनी नहीं है, उसे प्राप्त करने की लालसा से बचना चाहिए। अधिक पाने की इच्छा और जल्दी पाने की इच्छा भी लोभ का ही स्वरूप है। लोभ मनुष्य से अन्याय तक करवा देता है और कई बार बात गंभीर संघर्ष एवं खून-खराबे तक पहुंच जाती है। इसलिए जितना संभव हो, लोभ से बचने का प्रयास करना चाहिए।

मुनिश्री ने कहा कि जब यह शरीर तक हमारा स्थायी नहीं है तो संसार के अन्य पदार्थों को अपना मानकर उनके पीछे भागना उचित नहीं है। धर्म हमें सिखाता है कि जो अपना नहीं है, उसे धीरे-धीरे छोड़ते जाना है और लोभ की प्रवृत्ति में बहने से बचना है।

आत्मा का लक्ष्य भगवान बनना : संदीपमुनिजी म.सा.

धर्मसभा को संबोधित करते हुए श्री संदीपमुनिजी म.सा. ने कहा कि पर्युषण महापर्व जैन समाज का गौरव और अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। इन दिनों में कषायों और मोह की प्रवृत्तियों का त्याग करते हुए आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।

उन्होंने कहा कि धर्म आराधना तब तक करते रहना चाहिए, जब तक अपना लक्ष्य प्राप्त न हो जाए। हमारी आत्मा का अंतिम लक्ष्य भगवान बनना है। आत्मा से परमात्मा बनने के मार्ग में आने वाले राग, द्वेष, विषय-वासनाओं और अन्य बाधक तत्वों को दूर करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि केवल पर्व मनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि भीतर के कषायों को छोड़ना ही पर्युषण की सार्थकता है।

धर्म उत्कृष्ट मंगल है : प्रशस्तमुनिजी म.सा.

श्री प्रशस्तमुनिजी ने कहा कि धर्म उत्कृष्ट मंगल है। धर्म अहिंसा, संयम और तप का स्वरूप है। जिसका मन निरंतर धर्म में लगा रहता है, उसे देवता भी नमस्कार करते हैं। उन्होंने कहा कि धर्म करने की इच्छा सबसे पहले मन में उत्पन्न होनी चाहिए। इच्छा से प्रवृत्ति बढ़ती है, इसलिए धर्म की इच्छा को निरंतर बढ़ाते रहना चाहिए।

उन्होंने श्रद्धालुओं से कुसंगति छोड़कर सत्संगति अपनाने का आह्वान किया और कहा कि धर्म आराधना के लिए पात्रता विकसित करना भी आवश्यक है।

अंतगढ़सूत्र का हुआ वाचन

पर्युषण महापर्व के प्रथम दिन अंतगढ़सूत्र का वाचन श्री श्रेयांशमुनिजी द्वारा किया गया। वाचन के दौरान उन्होंने कहा कि पर्युषण के इन दिनों में सांसारिक प्रवृत्तियों को पीछे छोड़कर विशेष रूप से धर्म आराधना में समय लगाना चाहिए। इन दिनों का सदुपयोग आत्मचिंतन और आत्मशुद्धि के लिए करना चाहिए।

सामूहिक तेले तप की आराधना प्रारंभ

पर्युषण महापर्व के प्रथम दिन बड़ी संख्या में आराधकों ने सामूहिक उपवास की आराधना की। वहीं 8 सितंबर से सामूहिक तेले तप (तीन उपवास) की आराधना भी प्रारंभ हुई, जिसका समापन 10 सितंबर को होगा। इसी दिन पक्खी पर्व भी मनाया जाएगा।

पुण्य स्मृति में प्रभावना एवं नवकार महामंत्र जाप

आठ दिवसीय पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व की व्याख्यान प्रभावना के प्रथम दिन श्रीसंघ के पूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय श्री कनकमल जी गादिया की पुण्य स्मृति में श्रीमती राजलबाई कनकमल जी गादिया परिवार द्वारा प्रभावना का लाभ लिया गया। पुण्य स्मृति में दोपहर को पौषध भवन में नवकार महामंत्र के सामूहिक जाप भी हुए। जाप में शामिल सभी आराधकों को प्रभावना प्रदान की गई।

प्रतिदिन हो रहे धार्मिक आयोजन

पर्युषण महापर्व के दौरान प्रतिदिन दोपहर में कल्पसूत्र का वाचन एवं धार्मिक प्रतियोगिता का आयोजन किया जा रहा है। शाम को श्रावक वर्ग का प्रतिक्रमण पौषध भवन तथा श्राविका वर्ग का प्रतिक्रमण दौलत भवन में हो रहा है। धर्मसभा का संचालन श्रीसंघ सचिव हितेश शाहजी ने किया।

महापर्व के प्रथम दिन संतों के प्रवचनों में लोभ, कषाय, मोह, राग-द्वेष और सांसारिक आसक्ति से मुक्त होकर आत्मशुद्धि की ओर बढ़ने का संदेश दिया गया। श्रीसंघ अध्यक्ष प्रदीप गादिया ने कहा कि पर्युषण महापर्व आत्मशुद्धि और आत्मचिंतन का विशेष अवसर है। श्रद्धालुओं ने तप, त्याग, संयम और धर्म आराधना के माध्यम से पर्युषण महापर्व को सार्थक बनाने का संकल्प लिया।

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