क्षमा के लिए हृदय को मक्खन सा कोमल बनाएं : परम् पूज्य गुलाब मुनि म.सा.
नागपुर, 13 सितंबर। महापर्व पर्युषण के छठे दिन धर्मदास संप्रदाय सुमेरु परम पूज्य गुरुदेव श्री गुलाब मुनि जी म.सा. ने क्षमा धर्म की महत्ता बताते हुए कहा कि क्षमा केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसे जीवन का सहज स्वभाव बनाना होगा। भव्य जीवों के कल्याण के लिए भगवान ने मोक्ष का मार्ग बताया है। क्षमा धर्म का पर्व है और इसकी सफलता तभी है, जब मनुष्य अपने हृदय को मक्खन की तरह कोमल बनाकर सभी जीवों के प्रति आत्मीय भाव रखे।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति का अंदर और बाहर एक जैसा होना चाहिए। केवल ऊपर से क्षमा मांगना और भीतर मन में द्वेष रखना सच्ची क्षमा नहीं है। अहंकार क्षमा करने नहीं देता और तिरस्कार की भावना क्षमा देने में बाधा बनती है। अहंकार और तिरस्कार को मापने का कोई पैमाना नहीं है, इसलिए इन भावनाओं का त्याग स्वयं के पुरुषार्थ से ही करना होगा।
कर्म सिद्धांत के ज्ञाता पूज्य् गुलाब मुनिजी म.सा. ने नियतिवाद पर भी प्रकाश डालते हुए कहा कि केवल किस्मत के भरोसे बैठने से जीवन में कोई उपलब्धि नहीं मिलती। भूख लगने पर भोजन सामने होने के बावजूद उसे ग्रहण करने के लिए पुरुषार्थ करना पड़ता है। इसी प्रकार मोक्ष मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए भी पुरुषार्थ आवश्यक है। उन्होंने कहा कि कुछ बातें स्वभाव और प्रकृति के अनुसार होती हैं, लेकिन जीवन के उत्थान के लिए पुरुषार्थ की भूमिका महत्वपूर्ण है।
छह प्रकार से समझाई क्षमा की भावना
गुरुदेव ने द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव, गुण और शब्द के माध्यम से क्षमा को समझाया। द्रव्य से सभी जीवों से क्षमायाचना, क्षेत्र से संपूर्ण लोक के जीवों से क्षमा, काल से भूतकाल की भूलों के लिए क्षमा मांगना और दूसरों के अपराधों को क्षमा करना तथा भाव से प्रत्येक जीव के प्रति आत्मीयता रखने का संदेश दिया।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार विदेश में रहने वाला बेटा वर्षों बाद माता-पिता से मिलने आता है तो उसके प्रति हृदय में आत्मीय भाव उमड़ता है, उसी प्रकार सभी जीवों के प्रति आत्मीय भाव रखना चाहिए। मोक्ष की साधना करने वाले व्यक्ति को अपने हृदय में सभी जीवों को स्थान देना चाहिए।
क्षमा के छह स्वरूप बताए
पूज्य् गुलाब मुनिजी म.सा. ने क्षमा के छह स्वरूप बताते हुए कहा कि हार्दिक क्षमा बिना किसी शर्त के हृदय से होनी चाहिए। आसपास रहने वाले लोगों के बीच किसी न किसी बात को लेकर तकरार हो सकती है, ऐसे में तू-तू, मैं-मैं को आगे बढ़ाने के बजाय हार्दिक क्षमा मांगकर शांति और समभाव से रहना चाहिए। इससे अनंत कर्मों की निर्जरा होती है।
सर्व की क्षमा, सर्व से क्षमा और सर्व की साक्षी से क्षमा के माध्यम से मन, वचन और काया से हुई भूलों के लिए क्षमा मांगने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि जिनवाणी मनुष्य को भीतर से हल्का बनाती है। ज्ञानियों ने आत्मशांति का मार्ग बताया है और अब उस मार्ग पर चलने के लिए पुरुषार्थ करना हमारा दायित्व है।
बिन शर्ती क्षमा के माध्यम से उन्होंने समझाया कि क्षमा किसी सौदेबाजी या शर्त पर आधारित नहीं होनी चाहिए। पुण्य और बुद्धि जैसी आंतरिक संपदा कोई व्यक्ति हमसे छीन नहीं सकता, इसलिए क्षमा के लिए शर्त रखना उचित नहीं है।
चिरंजीवी क्षमा का अर्थ बताते हुए उन्होंने कहा कि जब तक मोक्ष प्राप्त नहीं हो जाता, तब तक क्षमा की भावना जीवन में बनी रहनी चाहिए। जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति ही अंतिम लक्ष्य है।
ज्ञानगर्भित क्षमा के अंतर्गत उन्होंने कहा कि व्यक्ति को यह समझना चाहिए कि अपनी आराधना और आत्मिक उत्थान में स्वयं का ही कल्याण है। किसी ने पूछा नहीं, कदर नहीं की या बिना पूछे कोई निर्णय ले लिया—ऐसी बातों को मन में रखने के बजाय सकारात्मक दृष्टि अपनानी चाहिए। सकारात्मक सोच व्यक्ति को जीवन की कठिनाइयों से पार ले जाती है।
वहीं सहज क्षमा को जीवन की स्वाभाविक क्रिया बनाने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार जन्म से लेकर अब तक सांस लेना सहज रूप से चलता आ रहा है और इसके लिए कभी थकान महसूस नहीं होती, उसी प्रकार क्षमा भी जीवन में सहज बननी चाहिए। भगवान महावीर स्वामी द्वारा ग्वाले को तथा गजसुकुमार द्वारा सोमिल को क्षमा किए जाने के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि क्षमा की शक्ति हममें भी विद्यमान है।
गुरुदेव ने कहा कि सामने वाले व्यक्ति को केवल निमित्त मानकर उसे निर्दोष भाव से देखने लगें तो क्षमा करने का प्रयास भी नहीं करना पड़ेगा, बल्कि क्षमा सहज रूप से हृदय में उत्पन्न हो जाएगी।
उन्होंने प्रेरक संदेश देते हुए कहा, “खमता हूं और खमाता हूं। पहले स्वयं को झुकना है। झुकने में मजा है, झुकाया तो सजा है।” क्षमा का यह भाव ही पर्युषण महापर्व की वास्तविक साधना है। जीवों को क्षमा नहीं किया तो मनुष्य गति भी दुर्लभ हो सकती है। इसलिए सभी जीवों के प्रति मैत्री, करुणा, आत्मीयता और क्षमा का भाव रखकर पर्युषण पर्व को सार्थक बनाना चाहिए।
Dr.Talera's Multi-speciality Dental Clinic, Thandla


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