जीव भविष्य की कल्पनाएं करके व्यर्थ में दुःखी होता रहता है।

भविष्य की चिंता और तुलना छोड़ कर्मों की निर्जरा का मार्ग अपनाएं – परम् पूज्य गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा.

आधि, व्याधि और उपाधि से मुक्ति मिलने पर ही प्राप्त होती है समाधि

संयोग और वियोग संसार का नियम, आसक्ति ही दुःख का मूल कारण

नागपुर, 08 अक्टूबर। धर्मदास संप्रदाय सुमेरु परम पूज्य गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने अपने प्रवचन में जीवन के दुःखों, कर्मों के बंधन, आसक्ति, तुलना, भविष्य की चिंता और आत्मकल्याण के मार्ग पर विस्तार से प्रकाश डाला। गुरुदेव ने कहा कि भगवान महावीर ने अपने अनुभव से जीवों के कल्याण के लिए मोक्ष का मार्ग बताया है। 

आधि, व्याधि और उपाधि से मुक्त होने पर ही समाधि की प्राप्ति होती है। आधि का अर्थ मानसिक परेशानी, व्याधि का अर्थ शारीरिक परेशानी और उपाधि का अर्थ अन्य सांसारिक परेशानियां हैं। जब तक जीव का जन्म-मरण का चक्र चलता रहेगा, तब तक ये परिस्थितियां आती-जाती रहेंगी। जीव अज्ञान के कारण दुःखी होता है, जबकि कर्म सिद्धांत को समझने वाला व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी समता बनाए रखने का प्रयास करता है।

भविष्य की चिंता में वर्तमान को खराब न करें

गुरुदेव ने कहा कि जीव भविष्य की कल्पनाएं करके व्यर्थ में दुःखी होता रहता है। कभी बीमारी की चिंता, कभी परिवार की परेशानी और कभी आने वाले समय में क्या होगा, इस आशंका में वह अपना वर्तमान खराब कर लेता है। 'अगर ऐसा हो गया तो, ऐसा नहीं हुआ तो' जैसे विचारों में उलझकर जीव अनावश्यक कर्मों का बंधन करता है। शेखचिल्ली की तरह काल्पनिक परिस्थितियों में उलझने से कोई समाधान नहीं मिलता, बल्कि मानसिक अशांति बढ़ती है।

उन्होंने कहा कि अनावश्यक चिंतन और कल्पनाओं से बचना चाहिए। रसोई बनाने वाली महिला यदि भोजन बनाते समय जीवों की विराधना को लेकर जागरूक रहे और अपने कार्य के प्रति विवेकपूर्ण भाव रखे, तो उसके भावों में अंतर आ सकता है। इसके विपरीत, भोजन करने वाला व्यक्ति भोजन को लेकर अपमानजनक टिप्पणी करता है, तो वह अपने भीतर क्रोध और नकारात्मक भावों को बढ़ाता है। कर्मों का बंधन केवल बाहरी कार्यों से नहीं, बल्कि उनके पीछे जुड़े भावों से भी संबंधित है। भगवान महावीर के पूर्वभव के प्रसंग का उल्लेख करते हुए गुरुदेव ने बताया कि कर्मों के परिणामों को समझना और अपने भावों को शुद्ध रखना अत्यंत आवश्यक है।

परिवार और संतान को लेकर अनावश्यक चिंता क्यों?

गुरुदेव ने कहा कि मनुष्य संतान और परिवार को लेकर जीवनभर चिंताओं में उलझा रहता है। पहले संतान नहीं होने का दुःख, फिर संतान की परिस्थितियों की चिंता, उसके संबंधों में परेशानी, अलग रहने और सेवा नहीं करने की शिकायत जैसे अनेक विचार मन को अशांत रखते हैं। उन्होंने समझाया कि पुण्य का उदय होने पर कहीं से भी सहयोग और सेवा प्राप्त हो सकती है। इसलिए भविष्य की आशंकाओं में डूबने के बजाय वर्तमान में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जीवन में जो परिस्थितियां सामने आती हैं, उन्हें समझदारी और धैर्य के साथ स्वीकार करना सीखें। हर बात को अपने मन के अनुसार चलाने की जिद दुःख बढ़ाती है। परिस्थितियों को शांत भाव से सहन करने और अपने व्यवहार को संयमित रखने से नए कर्मबंध से बचने में सहायता मिलती है।

तुलना से जन्म लेता है अभाव का दुःख

गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि जब मनुष्य दूसरों के पास उपलब्ध वस्तुओं और सुविधाओं से अपनी तुलना करने लगता है, तभी अभाव का दुःख प्रारंभ हो जाता है। वह सोचता है कि दूसरे के पास यह है, मेरे पास क्यों नहीं? इसी तुलना से तनाव और असंतोष पैदा होता है।

उन्होंने कहा कि प्रत्येक जीव को अपने पुण्य और कर्मों के क्षयोपशम के अनुसार परिस्थितियां प्राप्त होती हैं। यदि तुलना करनी ही है, तो संसार की वस्तुओं और सुविधाओं की नहीं, बल्कि ज्ञान, दर्शन और तप की तुलना करें। दूसरे की धार्मिक आराधना देखकर प्रेरणा लें कि मैं भी अपने ज्ञान में वृद्धि करूं, अधिक आराधना करूं और आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ूं। संसार की वस्तुओं के लिए होने वाली तुलना व्यक्ति को असंतोष देती है, जबकि धर्म और साधना के क्षेत्र में दूसरों से प्रेरणा लेना आत्मविकास का माध्यम बन सकता है।

जहां आसक्ति है, वहां दुःख की संभावना है

गुरुदेव ने कहा कि जीव संयोग और वियोग के कारण भी दुःखी होता है। संसार में जो भी संबंध बनते हैं, उनका बिछुड़ना निश्चित है। मनुष्य रिश्तों और वस्तुओं के प्रति इतनी आसक्ति बना लेता है कि उनके दूर होने पर मानसिक संताप में डूब जाता है। उन्होंने समझाया कि जब वियोग आए, तो यह भाव रखना चाहिए कि हमारा इतना ही संबंध था और अब वह पूरा हो गया।

यदि कोई प्रिय वस्तु किसी के हाथों से टूट जाए, तो क्रोध करने और अपशब्द बोलने के बजाय यह विचार करना चाहिए कि वस्तु दोबारा प्राप्त हो सकती है, लेकिन कटु वचन से किसी के मन को पहुंची चोट लंबे समय तक संबंधों को प्रभावित कर सकती है। वस्तु के नष्ट होने पर उससे अधिक नुकसान अपने क्रोध और कषाय के कारण हो सकता है। इसलिए छोटी-छोटी बातों में क्रोध करने के बजाय समता और क्षमा का भाव अपनाना चाहिए।

संयोग संबंध और तादात्म्य संबंध में अंतर समझें

गुरुदेव ने संबंधों की व्याख्या करते हुए कहा कि संबंध मुख्यतः दो प्रकार के समझे जा सकते हैं। पहला है संयोग संबंध, जो दूध में संगमरमर के टुकड़े की तरह है। संसार के अधिकांश संबंध परिस्थितियों के अनुसार बनते और बिगड़ते रहते हैं। दूसरा है तादात्म्य संबंध, जिसे दूध में शक्कर के उदाहरण से समझाया जा सकता है। आध्यात्मिक दृष्टि से सिद्ध भगवान के साथ संबंध को स्थायी आत्मकल्याणकारी संबंध के रूप में समझना चाहिए।

उन्होंने कहा कि मनुष्य अपने प्रियजनों के प्रति मोह और आसक्ति के कारण कई बार तीव्र क्रोध कर बैठता है। किसी अपने के साथ दुर्व्यवहार हो जाए, तो मन में बदला लेने के विचार उठते हैं। इसी प्रकार संतान के विवाह संबंध में कोई बाधा उत्पन्न कर दे, तो व्यक्ति विरोध और कटुता पर उतर आता है। गुरुदेव ने समझाया कि ऐसी परिस्थितियों में अपने क्रोध और कषाय को बढ़ाने के बजाय कर्म सिद्धांत को समझना चाहिए। जो भी संबंध जीवन में मिल रहे हैं, वे ऋणानुबंध के अनुसार हैं। हर व्यक्ति से समान व्यवहार या समान आत्मीयता संभव नहीं होती, इसलिए अपेक्षाओं को सीमित रखना आवश्यक है।

दूसरों से शिकायत करने के बजाय उपलब्धियों के प्रति कृतज्ञ रहें

गुरुदेव ने कहा कि कई बार मनुष्य के पास रहने के लिए घर, सिर पर छत और दो समय का भोजन जैसी आवश्यक सुविधाएं होती हैं, फिर भी वह इस बात से दुःखी रहता है कि कोई उसकी बात नहीं सुनता। जीवन में जो नहीं मिला, उसके लिए लगातार शिकायत करने के बजाय जो मिला है, उसके प्रति कृतज्ञता रखनी चाहिए। हर व्यक्ति हमारी भावनाओं को समझे, यह आवश्यक नहीं है। इसलिए दूसरों से अनावश्यक अपेक्षाएं रखने के बजाय स्वयं को शांत और संतुलित रखना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जीवन में कब, कौन-सा कर्म उदय में आ जाए और परिस्थितियां कब बदल जाएं, यह कोई नहीं जानता। इसलिए किसी व्यक्ति को उसकी वर्तमान स्थिति, शिक्षा, पद या प्रतिष्ठा के आधार पर कमजोर नहीं समझना चाहिए।

समय और भाग्य बदलते देर नहीं लगती

गुरुदेव ने राजा फतेह सिंह का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि किस प्रकार एक गरीब और अशिक्षित व्यक्ति को परिस्थितियों ने राजा बना दिया। प्रसंग के अनुसार, संतानहीन राजा ने मित्र के साथ बातचीत के दौरान सामने बैठे एक गरीब, अशिक्षित व्यक्ति को अपना राज्य देने की बात कह दी। उस समय वचन को निभाना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता था, इसलिए राजा ने अपने कथन के अनुसार उसे राज्य सौंप दिया।

राजा बनने के बाद उस व्यक्ति ने शिक्षा प्राप्त की और शासन की जिम्मेदारियां संभालीं। गुरुदेव ने इस प्रसंग के माध्यम से समझाया कि किसी की वर्तमान स्थिति देखकर उसके भविष्य का आकलन नहीं करना चाहिए। उन्होंने राबड़ी देवी के राजनीतिक जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि परिस्थितियां और अवसर मिलने पर व्यक्ति नई जिम्मेदारियां निभाना सीख सकता है। इसी प्रकार राजा फतेह सिंह से जुड़ा प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने बताया कि रेलवे निर्माण के कारण तालाब का बांध टूटने पर अंग्रेज अधिकारियों ने राजा से मुआवजा मांगा, तो राजा ने तर्क दिया कि तालाब पहले से मौजूद था और रेलवे निर्माण के कारण बांध टूटा, इसलिए जिम्मेदारी निर्माण करने वालों की बनती है।

गुरुदेव ने कहा कि इन प्रसंगों का संदेश यही है कि किसी को कमजोर या कम योग्य मानकर उसके प्रति पूर्वाग्रह नहीं रखना चाहिए। समय, परिस्थिति और कर्मों का उदय किसी का भी जीवन बदल सकता है।

किसी के प्रति पूर्वाग्रह न बनाएं, परिवर्तन कभी भी संभव

गुरुदेव ने वर्ष 2002 में इंदौर चातुर्मास के दौरान की एक घटना का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि उस समय एक साध्वी थीं, जो धर्म के विषय में अधिक नहीं जानती थीं, लेकिन साधु-साध्वी जैसा जीवन जी रही थीं। उनका स्वभाव अत्यंत क्रोधी था और वे दूसरों से कटु व्यवहार करती थीं। एक अवसर पर गुरुदेव उनके पास नियम ग्रहण करवाने पहुंचे। उन्होंने उपवास का नियम लिया, लेकिन अगले दिन दो उपवास होने के बाद उन्होंने संथारा ग्रहण करने की भावना व्यक्त की।

गुरुदेव ने उन्हें तीसरे दिन पुनः दीक्षा के नियम करवाए। इसके बाद उनके स्वभाव में आश्चर्यजनक परिवर्तन आया और वे शांत रहने लगीं। वे मिलने वालों से क्षमायाचना करने लगीं। चौथे दिन उनका संथारा सीज गया। गुरुदेव ने इस प्रसंग के माध्यम से समझाया कि किसी व्यक्ति के जीवन में कब और कैसा परिवर्तन आ जाए, यह पहले से नहीं कहा जा सकता। इसलिए किसी के वर्तमान स्वभाव या व्यवहार को देखकर उसके भविष्य के बारे में स्थायी धारणा नहीं बना लेनी चाहिए।

पद, प्रतिष्ठा और संपत्ति भी स्थायी नहीं

गुरुदेव ने कहा कि मन, वचन, काया, पद, प्रतिष्ठा, सत्ता और संपत्ति के प्रति आसक्ति व्यक्ति को बांधती है। संसार में संयोग है तो वियोग भी निश्चित है। पुण्य के उदय से प्राप्त पद और प्रतिष्ठा भी समय के साथ समाप्त हो सकते हैं। उन्होंने पारिवारिक संबंधों का उदाहरण देते हुए समझाया कि परिस्थितियां बदलने पर संबंधों की पहचान तक बदल जाती है। इसलिए किसी भी संबंध या उपलब्धि को स्थायी मानकर अत्यधिक मोह नहीं करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जड़ और चेतन के संयोग से बने संसार में वियोग स्वाभाविक है। जब मनुष्य इस सत्य को स्वीकार कर लेता है, तब वह परिस्थितियों के बदलने पर अत्यधिक दुःखी होने से बच सकता है।

कर्म सिद्धांत की समझ ही आत्मशांति का आधार

प्रवचन के समापन संदेश में गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि जीवन में सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान, संयोग-वियोग और पद-प्रतिष्ठा का आना-जाना लगा रहता है। इन परिस्थितियों के बीच अपने मन को स्थिर रखना, दूसरों के प्रति क्षमा का भाव रखना, भविष्य की अनावश्यक चिंता से बचना और संसार की वस्तुओं के प्रति मोह कम करना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि “मैं किसी का नहीं, कोई मेरा नहीं; पुण्य के उदय से सब मिला है” इस भाव को समझने वाला व्यक्ति संसार के संबंधों और परिस्थितियों को समता से स्वीकार करना सीखता है। जब जीव अपने कर्मों के सिद्धांत को समझकर अनावश्यक कल्पनाओं, तुलना, क्रोध और आसक्ति से बचता है, तभी वह आत्मशांति और मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर हो सकता है।


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