उदार बनो, ‘ये मेरी भूल है’ समझो, तनाव अपने आप दूर हो जाएगा : परम् पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा.
गुरुदेव ने कहा कि जीव छोटी-छोटी बातों में तनाव पाल लेता है। खाने, पीने, बैठने, सोने से लेकर किसी के व्यवहार तक हर बात में उसे अपनी अपेक्षा के अनुसार चीजें चाहिए। उन्होंने तनाव दूर करने के लिए दो सूत्र बताए—“उदार बनो” और “ये मेरी भूल है।” उन्होंने कहा कि यदि जीव इन दोनों सूत्रों को जीवन में उतार ले तो तनाव बहुत हद तक समाप्त हो सकता है। तनाव दूर करने के लिए किसी शॉर्टकट मंत्र की तलाश करने के बजाय स्वयं को बदलना होगा। उदारता रखनी होगी, क्योंकि तनाव में जीव नए कर्मों का बंध करता है।
समस्या भी हम खड़ी करते हैं और परेशान भी हम होते हैं
परम् पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि जीव स्वयं समस्याएं खड़ी करता है और जब वही परिस्थितियां कर्मों के उदय से सामने आती हैं तो परेशान भी होता है। जीवन में उदारता आने पर व्यक्ति हर परिस्थिति में स्वयं को संभालना सीख जाता है। अनुकूल परिस्थिति में तो कोई भी सेवा कर सकता है, लेकिन प्रतिकूल परिस्थिति में भी सेवा करना वास्तविक सेवा भावना का परिचायक है।
उन्होंने सेवा की व्याख्या करते हुए कहा कि “स्नेह और समझ के संयोग से जन्मी क्रिया सेवा कहलाती है।” जहां स्नेह होता है वहां सेवा में व्यापार नहीं होता, जबकि स्वार्थ या प्रतिफल की अपेक्षा आ जाए तो सेवा भी सौदा बन जाती है। उन्होंने कहा कि जगत को सही साबित करने में अपना समय नष्ट करने के बजाय स्वयं के आचरण पर विचार करना चाहिए। जगत हमेशा हमें सही माने, यह आवश्यक नहीं, लेकिन हमें यह अवश्य देखना चाहिए कि हम क्या कर रहे हैं और वह सही है या गलत।
नौकरी, चाकरी और सेवा में बताया अंतर
गुरुदेव ने नौकरी, चाकरी और सेवा के बीच अंतर बताते हुए कहा कि काम समझकर किया गया कार्य नौकरी, कर्तव्य समझकर किया गया कार्य चाकरी और कल्याण की भावना से किया गया कार्य सेवा कहलाता है। नौकरी करने वाला समय पूरा होने पर अपना कार्य समाप्त मान सकता है, लेकिन कर्तव्य की भावना रखने वाला व्यक्ति जिम्मेदारी को प्राथमिकता देता है। वहीं सेवा में कल्याण का भाव जुड़ जाता है।
उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति अपने कर्तव्य को समझकर कार्य करता है तो उसे अशांति नहीं होती। यदि सेवा कल्याण की भावना से की जाए तो उसका महत्व और भी बढ़ जाता है। हमें यह विचार करना चाहिए कि ऐसे अवसर जीवन में कितनी बार मिलेंगे।
स्नेह हो तो कठिनाई भी छोटी लगती है
गुरुदेव ने एक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि एक महिला शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद प्रतिदिन धर्म आराधना के लिए आती थीं। एक दिन वे नहीं आईं तो कारण पूछा गया। उन्होंने बताया कि उनका बेटा आया था और उसके लिए भोजन व नाश्ता तैयार कर रही थीं। शारीरिक तकलीफ के बावजूद पुत्र के प्रति स्नेह के कारण उन्होंने अपनी परेशानी को भूलकर उसके लिए भोजन बनाया। गुरुदेव ने कहा कि जब भावना स्नेह की होती है तो कठिनाई का अनुभव भी कम हो जाता है।
तनावग्रस्त व्यक्ति के साथ प्रेम से पेश आएं
उन्होंने कहा कि तनाव व्यक्ति की स्मरणशक्ति को भी प्रभावित कर सकता है। सामान कहां रखा, अभी क्या किया, जैसी सामान्य बातें भी भूलने की स्थिति बन सकती है। ऐसे व्यक्ति पर नाराज होने के बजाय उसके साथ प्रेम से व्यवहार करना चाहिए और यह समझने का प्रयास करना चाहिए कि उसके भीतर कौन-सी परेशानी चल रही है।
गुरुदेव ने कहा कि हर व्यक्ति को प्रेम चाहिए। यदि किसी से अच्छा बोलने से उसे मानसिक शांति मिलती है तो अच्छा बोलने में हर्ज ही क्या है। गलतफहमी होने पर रिश्ता तोड़ने के बजाय उसे दूर करने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने समझाया कि नाखून बढ़ जाने पर हम उंगली नहीं काटते, उसी प्रकार छोटी-सी गलतफहमी के कारण संबंधों को समाप्त नहीं करना चाहिए।
दूसरों की गाड़ी देखने के बजाय अपनी गाड़ी संभालें
परम् पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि वाहन चलाते समय यदि व्यक्ति सामने वाले की गाड़ी को देखते हुए अपनी गाड़ी चलाएगा तो दुर्घटना की संभावना बढ़ जाएगी। उसी प्रकार जीवन में भी लगातार यह देखते रहना कि सामने वाले ने क्या किया, क्यों किया और कैसे किया, तनाव को जन्म देता है। इसलिए व्यक्ति को अपनी जीवन-यात्रा पर ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने कहा—
जीवन में परिस्थितियां स्थायी नहीं हैं। इसलिए हर परिस्थिति में समता और उदारता बनाए रखना आवश्यक है।
दूरबीन नहीं, दर्पण बनिए
गुरुदेव ने कहा कि दूसरों की गलतियां देखने के लिए हम दूरबीन बन जाते हैं, जबकि स्वयं को देखने के लिए दर्पण बनना चाहिए। दूरबीन दूसरों की छोटी-सी गलती को भी बड़ा करके दिखाती है, जबकि दर्पण हमारी अपनी छवि दिखाता है। उन्होंने कहा कि यदि कोई परेशानी सामने आती है तो केवल सामने वाले को उसका कारण मानने के बजाय अपने उपादान और कर्मों पर भी विचार करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि किसी के प्रति हीन भावना नहीं रखनी चाहिए। दोष दृष्टि के स्थान पर गुण दृष्टि विकसित करने से जीवन में सकारात्मकता आती है और आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है। उन्होंने अर्जुन माली के प्रसंग का उल्लेख करते हुए सहनशीलता और आत्मपरिवर्तन की महत्ता बताई।
अपराधी और विरोधी को भी उपकारी मानें
गुरुदेव ने कहा कि जीवन में अपराधी, विरोधी अथवा शत्रु दिखाई देने वाले व्यक्ति को भी उपकारी मानने की दृष्टि विकसित करनी चाहिए। प्रतिकूल परिस्थितियां व्यक्ति को भीतर से मजबूत और आत्मचिंतनशील बनने का अवसर देती हैं।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि विद्यार्थी यदि परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करता है तो उसे मनचाही जगह प्रवेश के लिए अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ता, लेकिन कम अंक आने पर अतिरिक्त प्रयास और संसाधनों की आवश्यकता पड़ सकती है। इसी प्रकार जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियां हमें अपनी कमियों को देखने और सुधारने का अवसर देती हैं।
अपेक्षाएं तनाव का बड़ा कारण
गुरुदेव ने कहा कि तनाव का एक बड़ा कारण अत्यधिक अपेक्षाएं हैं। घर में काम करने वाली महिला से लेकर परिवार के प्रत्येक सदस्य से हम अपनी अपेक्षा के अनुसार व्यवहार चाहते हैं। अपेक्षा पूरी नहीं हुई तो तनाव पैदा हो जाता है। उन्होंने कहा कि हमें यह भी विचार करना चाहिए कि कर्मों के सिद्धांत के अनुसार आज जो परिस्थिति सामने है, उसके पीछे हमारे पूर्व कर्मों की भी भूमिका हो सकती है।
उन्होंने कहा कि समय से पहले और भाग्य से अधिक किसी को कुछ मिला नहीं है और मिलेगा भी नहीं। इसलिए जीवन में अनावश्यक तनाव, अपेक्षा और दूसरों के प्रति दुर्भावना रखने के बजाय उदारता, प्रेम, सेवा और आत्मचिंतन को अपनाना चाहिए।
गुरुदेव ने अंत में प्रेरणा देते हुए कहा कि भविष्य का निर्माण व्यक्ति के अलावा कोई दूसरा नहीं कर सकता। यदि भविष्य को उज्ज्वल बनाना है तो दूसरों की गलतियां देखने के लिए दूरबीन नहीं, बल्कि अपनी भूलों को पहचानने के लिए दर्पण बनना होगा। यही दृष्टि तनाव को कम करेगी और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ाएगी।




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