संयोग-वियोग में सहज रहें, प्रतिकूलता को कर्मों की निर्जरा मानें, तनाव स्वतः कम होगा : परम् पूज्य श्री गुलाबमुनिजी म.सा.
नागपुर, 1 अक्टूबर।जीवन में सब कुछ अनुकूल चल रहा हो और अचानक प्रतिकूल परिस्थिति आ जाए तो व्यक्ति तनाव में आ जाता है। लेकिन यह समझना चाहिए कि दुख आया है तो जाने के लिए ही आया है। प्रतिकूलता के समय रोने या परेशान होने के बजाय उसे कर्मों के उदय के रूप में स्वीकार करना चाहिए।
समय सभी को समान मिलता है
परम् पुज्य श्री गुलाबमुनिजी म.सा. ने समय के महत्व को समझाते हुए कहा कि सभी जीवों को प्रतिदिन 24 घंटे का समान समय मिलता है। किसी के पास संपत्ति कम या अधिक हो सकती है, लेकिन समय सबके पास समान है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कर्म सत्ता मानो प्रतिदिन हमारे खाते में 86,400 रुपये जमा करती है और साथ ही उसे खर्च करने के लिए 24 घंटे की मोहलत देती है। ज्ञानी व्यक्ति इस समय को खर्च नहीं, बल्कि अच्छे कर्मों में निवेश करने की प्रेरणा देता है। एक दिन के 24 घंटे में 86,400 सेकंड होते हैं। प्रत्येक सेकंड का सदुपयोग जीवन को सार्थक बना सकता है।
उन्होंने कहा कि कई बार गरीब व्यक्ति भी समय का सदुपयोग करके अमीर व्यक्ति से आगे निकल जाता है। इसलिए समय की कीमत धन से अधिक समझनी चाहिए। व्यक्ति के पास पर्याप्त समय होने के बावजूद यदि वह उसे प्रमाद में गंवा देता है तो बाद में तनाव और पछतावे का सामना करना पड़ता है।
जुबान को समेटना भी साधना है
प्रवचन में उन्होंने कहा कि तनाव आते ही व्यक्ति की जुबान चलने लगती है। कोई कहता है—उसने ऐसा किया, उसने वैसा किया। जिस प्रकार लंबा धागा उलझ जाता है, उसी प्रकार लंबी जुबान भी व्यक्ति को उलझनों में डाल देती है। धागे को उलझने से बचाने के लिए उसे लपेटकर रखा जाता है और जुबान को उलझनों से बचाने के लिए उसे संयमित रखना चाहिए। कई बार रिश्ते भी इसी वजह से टूट जाते हैं।
उन्होंने कहा कि रिश्ते टूटने की दो प्रमुख वजह हैं—व्यक्ति सही बोल नहीं पाता और सही समझ नहीं पाता। इसलिए शंका होने पर धैर्यपूर्वक उसका समाधान करना चाहिए। तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय परिस्थिति को समझना चाहिए। जब एक व्यक्ति बोल रहा हो तो दूसरे को शांत रहकर सुनना चाहिए।
संयोग और वियोग दोनों जीवन का हिस्सा
परम् पुज्य श्री गुलाबमुनिजी म.सा. ने कहा कि संयोग और वियोग एक-दूसरे के पूरक हैं। अनुकूल संयोग का वियोग हो जाए या प्रतिकूल व्यक्ति का संयोग हो जाए, दोनों परिस्थितियों में व्यक्ति तनाव में आ सकता है। ऐसे समय में विचार करना चाहिए कि आज मेरे कर्मों का इतना ही क्षयोपशम और लाभांतराय है। इस भाव से प्रतिकूलता को स्वीकार करने पर नए कर्मों का बंधन कम किया जा सकता है।
उन्होंने भोजन का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि मनपसंद भोजन न मिले तो व्यक्ति तनाव में आ जाता है। ऐसे समय में यह विचार करना चाहिए कि आज मेरे कर्मों का इतना ही उदय है। यदि इसके विपरीत व्यक्ति जुबान चलाकर प्रतिक्रिया करता है तो वह नई कर्म-निर्जरा के बजाय नए कर्मों का बंधन कर सकता है।
सहन करने में मजा है, वरना सजा है
परम् पुज्य श्री गुलाबमुनिजी म.सा. ने आयंबिल का उदाहरण देते हुए कहा कि गाय, भैंस और बकरी जैसे पशु सूखा चारा खाने के बाद जुगाली करते हैं और उनके शरीर में होने वाली प्राकृतिक प्रक्रिया से दूध में पोषक तत्वों का निर्माण होता है। उन्होंने कहा कि कुछ जीवों की पूरी जिंदगी आयंबिल जैसी स्थिति में गुजर जाती है, जबकि मनुष्य एक दिन आयंबिल करने पर कमजोरी महसूस करने लगता है। इससे हमें सहनशीलता और प्रकृति के प्रति चिंतन की प्रेरणा लेनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि प्रतिकूल व्यक्ति के साथ रहना पड़े तो भी तनाव लेने के बजाय यह विचार करना चाहिए कि आज मुझे इसी कर्म का भुगतान करना है। प्रतिकूलता को सहजता से स्वीकार करने से कर्मों की निर्जरा का भाव बनता है।
प्रतिबंध नहीं, प्रतिक्रिया तनाव बढ़ाती है
प्रवचन में नरक गति का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वहां जीवों को अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में रहना पड़ता है। शरीर और वातावरण की अनेक वेदनाओं के बावजूद वहां कर्मानुसार परिस्थितियों को भोगना पड़ता है। इसके माध्यम से उन्होंने समझाया कि मनुष्य को अपने जीवन में आने वाली छोटी-छोटी प्रतिकूलताओं को लेकर अत्यधिक तनाव नहीं पालना चाहिए।
उन्होंने कहा कि तेज धूप में यात्रा करना हो, गर्म हवा के थपेड़े सहने पड़ें या कड़ाके की ठंड का सामना करना पड़े, थोड़ी-सी प्रतिकूलता भी मनुष्य को परेशान कर देती है। इसलिए जीवन में सहनशीलता विकसित करना आवश्यक है। “सहन करने में मजा है, वरना सजा है”—इस भाव के साथ प्रतिकूल परिस्थितियों को स्वीकार करना चाहिए।
वियोग में भी सहजता जरूरी
परम् पुज्य श्री गुलाबमुनिजी म.सा. ने कहा कि पांच रुपये की वस्तु खो जाने पर भी व्यक्ति परेशान हो जाता है। लेकिन वही वस्तु यदि मुफ्त में मिली हो तो उसके खोने का उतना अफसोस नहीं होता। उन्होंने समझाया कि जो वस्तु या सुविधा सहजता से उपलब्ध है, उसकी भी कद्र करना चाहिए। आज जिस वस्तु का सम्मान नहीं करेंगे, भविष्य में उसकी उपलब्धता दुर्लभ हो सकती है।
इसी प्रकार यदि कोई सेवाभावी और ईमानदार व्यक्ति नौकरी छोड़कर चला जाए तो तनाव लेने के बजाय यह विचार करना चाहिए कि हमारा उसके साथ इतना ही संयोग था। जहां संयोग है, वहां वियोग निश्चित है। इस सत्य को स्वीकार करने वाला व्यक्ति परिस्थितियों में अधिक सहज रह सकता है।
भूतकाल को भूलें, नए कर्मों के बंधन से बचें
परम् पुज्य श्री गुलाबमुनिजी म.सा. ने कहा कि यदि प्रतिकूल व्यक्ति जीवन में आ जाए तो उसके प्रति सद्भावना रखें। वह व्यक्ति स्वयं न बदले, तब भी अपने मन में उसके प्रति द्वेष रखकर नए कर्मों का बंधन क्यों करें? गजसुकुमाल ने अपने 99 लाख भवों के कर्मों को कुछ ही समय में क्षय किया। इससे हमें कर्मों की गंभीरता और साधना की शक्ति को समझना चाहिए।
उन्होंने ने कहा कि “उसने ऐसा किया, उसने वैसा किया”—ऐसा सोचते रहने से व्यक्ति स्वयं ही तनाव और कर्मबंधन में फंसता है। संयोग हो या वियोग, अनुकूलता हो या प्रतिकूलता, दोनों परिस्थितियों में सहज रहने का अभ्यास करना चाहिए।
अंत में उन्होंने कहा कि समय को बदलने के लिए कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। कोई तांत्रिक, बाबा या पंडित व्यक्ति का समय नहीं बदल सकता। अपने समय और जीवन की दिशा बदलने की शक्ति व्यक्ति के अपने सद्कर्म, संयम, सद्भावना, धैर्य और पुरुषार्थ में है। इसलिए वर्तमान समय का सदुपयोग करें, प्रतिकूलता को कर्मों का उदय मानकर स्वीकार करें और अपनी वाणी तथा व्यवहार पर संयम रखते हुए जीवन को तनावमुक्त एवं सार्थक बनाने का प्रयास करें।




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