हर परिस्थिति को स्वीकार कर समता रखना ही आत्मकल्याण का मार्ग : परम् पूज्य गुलाब मुनिजी म.सा.
नागपुर, 17 सितंबर। धर्मदास संप्रदाय सुमेरु परम पूज्य गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने प्रवचन में कहा कि भगवान महावीर ने अपने जीवन के अनुभवों से संसार के भव्य जीवों के कल्याण के लिए शांति, समाधि और मोक्ष का मार्ग बताया है। अनंत काल से जीव इस संसार रूपी रंगमंच पर भटक रहा है और इस दौरान न जाने कितने पात्र निभा चुका है। कभी पिता, कभी पुत्र, कभी सास, कभी बहू, कभी मित्र तो कभी किसी अन्य रिश्ते के रूप में अलग-अलग भूमिकाएं निभाते हुए जीव ने अनेक परिस्थितियों में जन्म लिया। समय ने बहुत कुछ सिखाया, अनुभव भी दिए, लेकिन इसके बावजूद हम अपनी भूलों को स्वीकार करना नहीं सीख पाए। यही आत्मदहन है—अर्थात अपनी भूल को स्वीकार करना और उससे सीख लेकर स्वयं में परिवर्तन लाना।
उन्होंने कहा कि भगवान महावीर ने नयसार से महावीर बनने तक अनेक भवों की यात्रा की और कर्मों का बंधन किया, लेकिन साढ़े बारह वर्ष की कठोर साधना में कर्मों का खाता समाप्त कर दिया। इसलिए जीवन में इस सत्य का चिंतन आवश्यक है कि “मेरा कोई नहीं है, मैं किसी का नहीं।” हमने अनंत काल से अनंत रिश्ते बनाए और आज भी उन्हीं रिश्तों में उलझे हुए हैं। जीवन में तीन चीजों को कभी टूटने नहीं देना चाहिए—हृदय, वचन और भरोसा। ये जब टूटते हैं तो आवाज नहीं होती, लेकिन इंसान भीतर से टूट जाता है।
भगवान महावीर संसार में रहते हुए अनेक परिस्थितियों और अनुभवों से गुजरे तथा धीर, वीर और गंभीर बने। आज स्थिति यह है कि किसी की गलती दिखाई नहीं देती कि हम तुरंत उसे चर्चा और खबर का विषय बना देते हैं। हमें समझना होगा कि हमने जो कषाय किए हैं, उसी का परिणाम हमें भुगतना पड़ रहा है। यदि किसी व्यक्ति से कोई गलती हो गई है तो उसे ठुकराने या अपमानित करने के बजाय उसके प्रति करुणा और अनुकम्पा रखनी चाहिए। संभव है कि किसी भव में हमसे भी वही गलती हुई हो। हम स्वयं भी अनेक कर्मों और पापों का बंधन करके आए हैं, इसलिए दूसरों की गलती देखकर नए कर्मों का बंधन करना उचित नहीं है।
भगवान महावीर ने अपने प्रत्येक भव में परिस्थितियों को सहन किया और शिकायत का सहारा नहीं लिया। इंद्र स्वयं सेवा के लिए आए, लेकिन तीर्थंकर किसी की सेवा स्वीकार नहीं करते। कर्म किसी को छोड़ते नहीं हैं। जो करके आए हैं, वही किसी न किसी रूप में हमारे सामने आता है। इसलिए यदि भगवान बनना है तो हर परिस्थिति को स्वीकार करना सीखना होगा और शिकायत से बचना होगा। लोग आते हैं, अपना पात्र निभाते हैं और चले जाते हैं। “जैसा सप्लाय, वैसा रिप्लाई”—जीवन में जो हमारे साथ हो रहा है, वह हमारे ही कर्मों का परिणाम है। कुछ भी नया नहीं हो रहा।
मन में हल्के और नकारात्मक विचार नहीं लाने चाहिए। वचन की शक्ति बढ़ानी है तो किसी की बुराई, चुगली और ताने देने से बचना होगा। मरुदेवी माता के जीवन का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि उनके मुख से किसी ने कटु वचन और अपशब्द नहीं सुने। उन्होंने बुरे विचार नहीं किए और किसी का मन दुखाने का प्रयास नहीं किया। जीवों को साता पहुंचाई, इसलिए पुण्य का उदय हुआ और दीर्घ आयुष्य प्राप्त हुआ। लेकिन जब किसी को लंबा आयुष्य मिलता है तो लोग उसके पीछे भी तरह-तरह की बातें बनाने लगते हैं। हमें ऐसी प्रवृत्ति से बचना चाहिए।
उन्होंने कहा कि हंसते-हंसते सुख भोगने से पुण्य गलता है और हंसते-हंसते दुख भोगने से पाप गलता है। जीवन में परिस्थितियां जैसी भी आएं, उन्हें सहन करने की कला विकसित करनी चाहिए। मरुदेवी माता के जीवन में पूर्व के अनुकम्पा और पुण्य के संस्कार इतने प्रबल थे कि अल्प समय में ही उनका जीवन बदल गया और हाथी पर बैठे-बैठे केवलज्ञान की प्राप्ति हुई। हमें विचार करना चाहिए कि हमारे जीवन में वह परिवर्तन क्यों नहीं आ रहा है।
हम भगवान महावीर के अनुयायी तो हैं, लेकिन सुविधा के उपभोग और ‘तेरा-मेरा’ के भाव में उलझे हुए हैं। भगवान महावीर ने धीरता और धैर्य के गुणों को जीवन में उतारा। किसी ने प्रतिकूल व्यवहार किया तो तत्काल प्रतिक्रिया देने के बजाय यह सोचकर अपनी आराधना में लीन रहे कि समय स्वयं उत्तर देगा। हमें भी समता का भाव रखना चाहिए।
गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि आज मनुष्य में उतावलापन बहुत बढ़ गया है। बिना आगे-पीछे सोचे निर्णय ले लेते हैं और बाद में पछताते हैं कि मुझसे गलती हो गई। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। यदि निर्णय लेने से पहले धैर्य रखा होता तो शायद पछतावे की स्थिति नहीं आती। भगवान महावीर के जीवन से हमें धैर्य, सहनशीलता और समता सीखनी चाहिए।
भगवान महावीर के अनुयायी होने के बावजूद छोटी-छोटी बातों से परेशान हो जाते हैं। एक मच्छर भी हमें विचलित कर देता है। हम शरीर के पोषण में लगे हैं, लेकिन आत्मा के पोषण को भूल गए हैं। आत्मा का पोषण जिनवाणी से होगा। जिनवाणी का लाभ केवल एक-दो दिन या कुछ समय तक नहीं, बल्कि पूरे जीवन लेना चाहिए। तभी जीवन में भगवान महावीर के गुणों को विकसित करने की दिशा मिलेगी।
वीर शब्द की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि वीर वही है जो कष्ट सहन करना जानता है। यदि चलते समय पैर फिसल जाए और फ्रैक्चर हो जाए तथा डॉक्टर छह महीने आराम करने की सलाह दे तो व्यक्ति स्वस्थ होने के उद्देश्य से दर्द और दवा दोनों सहन करता है। वह डॉक्टर से यह नहीं कहता कि मैं दर्द सहन नहीं कर पाऊंगा। जब शरीर को स्वस्थ करने के लिए इतना धैर्य रखा जा सकता है तो आत्मा को कर्मों से मुक्त करने के लिए भी धैर्य और पुरुषार्थ आवश्यक है।
गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि हम अक्सर निमित्त को दोष देते हैं और इस प्रक्रिया में नए कर्मों का बंधन कर लेते हैं। फिर उन्हीं कर्मों के उदय में स्वयं परेशान होते हैं। गंभीर बीमारी के उपचार में समय लगता है। दो दिन में परिणाम नहीं आता। चिकित्सक द्वारा बताई गई दवा को लंबे समय तक लेना पड़ता है। उसी प्रकार जिनवाणी का लाभ भी निरंतर लेना होगा। केवल कुछ दिनों या वर्षों तक नहीं, बल्कि जीवनभर जिनवाणी का श्रवण, मनन और आचरण करना आवश्यक है।
उन्होंने इंद्रियों के सदुपयोग पर भी विशेष प्रकाश डाला। कहा कि आंखें शास्त्रों का वाचन करने और सतगुरु के दर्शन के लिए मिली हैं, लेकिन हम उनका उपयोग फिल्में देखने, बाहरी सुंदरता और अनावश्यक चीजों को देखने में कर रहे हैं। विचार करना चाहिए कि इंद्रियों का दुरुपयोग करने का परिणाम क्या होगा। गुरु भगवंतों के मात्र एक शब्द से जीवन की दशा और दिशा बदल सकती है, लेकिन उस शब्द को जीवन में उतारने का निर्णय स्वयं व्यक्ति को करना होगा।
इसी प्रकार कान जिनवाणी सुनने के लिए मिले हैं, लेकिन हम उनका उपयोग बुराई और फालतू बातें सुनने में कर रहे हैं। भगवान महावीर के जीवन प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इंद्रियों का दुरुपयोग कर्मबंधन का कारण बनता है। कर्म अपनी पाई-पाई का हिसाब रखते हैं। कर्म सत्ता पर किसी की नहीं चलती। कर्मों के लिए कोई छोटा-बड़ा नहीं होता, सभी को अपने कर्मों का परिणाम भोगना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि हमें बाहर से जैसे दिखाई देते हैं, भीतर से भी वैसा ही बनना है। अनुकूलता हो या प्रतिकूलता, भीतर अनावश्यक हलचल नहीं होनी चाहिए। जो कुछ हो रहा है, उसे अपने कर्मों का परिणाम मानकर समता में रहना सीखना होगा। बाहरी चक्षु संसार को देखकर हलचल पैदा करते हैं, जबकि अंतर के चक्षु ज्ञान से खुलते हैं और ज्ञान से स्थिरता आती है।
मन में द्वेष होगा तो क्रोध और मान बढ़ेगा। राग होगा तो माया और लोभ उत्पन्न होंगे। हीन भावना आत्मभाव को कमजोर करती है। इसलिए प्रत्येक जीव के प्रति करुणा और अनुकम्पा का भाव रखना चाहिए। किसी व्यक्ति का स्वभाव पाप करने का नहीं होता, बल्कि पूर्व भव के कर्मों के कारण कई बार वह विवश होकर गलत कार्य कर बैठता है।
उन्होंने कहा कि हमें ज्ञान-दर्पण बनना है, दूरबीन नहीं। दर्पण व्यक्ति को स्वयं का चेहरा दिखाता है, जबकि दूरबीन से हम दूसरों को देखने में लगे रहते हैं। आज जीव स्वयं को ऊंचा और दूसरे को नीचा दिखाने में लगा हुआ है। इसके बजाय प्रत्येक जीव के प्रति अनुकम्पा का भाव रखना चाहिए। किसी की अच्छाई दिखाई दे तो अनुमोदना करें और किसी की गलती दिखाई दे तो अनुकम्पा रखें।
प्रवचन के माध्यम से उन्होंने संदेश दिया कि जीवन में परिस्थितियां चाहे अनुकूल हों या प्रतिकूल, उन्हें कर्मों का परिणाम मानकर समता के साथ स्वीकार करना चाहिए। दूसरों की कमियां तलाशने के बजाय अपने भीतर झांकना चाहिए। अपनी भूल स्वीकार करना, धैर्य रखना, इंद्रियों का सदुपयोग करना, जिनवाणी का निरंतर श्रवण-मनन करना और जीव मात्र के प्रति अनुकम्पा रखना ही आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग है।
Dr.Talera's Multi-speciality Dental Clinic, Thandla


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