दुःख और प्रतिकूलता में दूसरों को दोष देने की बजाय अपने कर्मों को देखें : परम् पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा.
नागपुर, 25 सितंबर। धर्मदास संप्रदाय सुमेरु परम पूज्य गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि भगवान महावीर ने अपने अनुभव से बताया है कि संसार के रंगमंच पर जीव स्वयं अपने कर्मों का कर्ता है और स्वयं ही उनको भोगता है। कोई दूसरा व्यक्ति उसके कर्मों को भोग नहीं सकता और न ही उन्हें बदल सकता है। जीवन में आने वाली प्रत्येक परिस्थिति पूर्व कर्मों के उदय का परिणाम है, इसलिए प्रतिकूलता आने पर दूसरों को दोष देने की बजाय स्वयं के कर्मों को देखना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जीव अनंत काल से अनेक भवों में कर्म करता आया है और उन्हीं कर्मों के अनुसार जन्म-मरण के चक्र में भटक रहा है। जीव जैसा कर्म करके आया है, वैसा ही उसका परिणाम सामने आता है। किंतु प्रतिकूल परिस्थिति आते ही जीव ‘दूरबीन’ बन जाता है और दूसरों की गलतियां देखने लगता है। इसके विपरीत उसे ‘दर्पण’ बनकर अपने दोषों को देखना चाहिए। जब भी कोई विपरीत परिस्थिति आए, तब विचार करना चाहिए कि आज मेरे कर्मों का ऐसा ही उदय है। किसी दूसरे की गलती मानकर तनाव बढ़ाने से नए कर्मों का बंध होता है।
परम् पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि व्यक्ति दूसरों को पराया मानकर उनके प्रति दुर्भाव रखता है तो दोषारोपण शुरू हो जाता है। अपेक्षाएं पूरी नहीं होने पर उपेक्षा प्रारंभ होती है और फिर दोष तथा द्वेष जन्म लेते हैं। व्यक्ति जिस रंग का चश्मा पहनता है, उसे पूरी दुनिया उसी रंग की दिखाई देती है। इसलिए जीवन में कैसी भी परिस्थिति हो, समता और सहनशीलता का भाव रखना चाहिए।
उन्होंने कहा कि यदि मुंबई जाना हो तो व्यक्ति सुपरफास्ट ट्रेन चुनता है, क्योंकि उसे जल्दी पहुंचना है। फिर मोक्ष के सफर में ‘बहाने वाली लोकल’ क्यों पकड़ते हैं? आत्मकल्याण के मार्ग में भी गति और दृढ़ता आवश्यक है। दुःख अथवा प्रतिकूलता आए तो उसका स्वागत करना सीखें। उसका तिरस्कार करने से वह समाप्त नहीं होगी, बल्कि मन में उसका प्रभाव और बढ़ेगा।
अपेक्षा तनाव का बड़ा कारण
गुरुदेव ने कहा कि परिवार और समाज में तनाव का एक बड़ा कारण अपेक्षा है। पति पत्नी से, पत्नी पति से और परिवार का प्रत्येक सदस्य एक-दूसरे से अपेक्षा रखता है कि वह मेरा काम अवश्य करे। जब अपेक्षा पूरी नहीं होती तो उपेक्षा शुरू हो जाती है। इसके बाद शिकायत, पूर्वाग्रह और द्वेष रिश्तों में प्रेम एवं वात्सल्य को कमजोर कर देते हैं।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि घर में कचरा दिखाई दे तो व्यक्ति नौकर के भरोसे क्यों रहे? यदि स्वयं उसे दिखाई दे रहा है तो वह भी उसे उठा सकता है। अपेक्षा कम होगी तो तनाव भी कम होगा। इसी प्रकार गलतफहमी होने पर रिश्ता खत्म करने की बजाय गलतफहमी को दूर करना चाहिए। कपड़ा मैला हो तो धोया जाता है और फट जाए तो रफू किया जाता है। उसी तरह रिश्तों को भी सुधारने का प्रयास करना चाहिए।
परम् पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि किसी को ताना देने की बजाय शांतिपूर्वक बात करनी चाहिए। ताने और कटु शब्द बैर की गांठ बांध देते हैं। मन से बंधे कर्मों का प्रभाव लंबे समय तक रहता है। इसलिए बोलने से पहले विचार करना जरूरी है। मात्र एक मिनट की गलत सोच भी कर्मबंधन का कारण बन सकती है।
उन्होंने कहा कि यदि कोई ग्राहक हमारी दुकान छोड़कर पड़ोसी की दुकान पर चला जाए तो बुरा मानने की बजाय यह विचार करें कि शायद उसका उस दुकानदार के साथ कोई पूर्व कर्म का लेन-देन बाकी है। जैसे ही उपेक्षा का भाव आता है, दूसरे के अवगुण दिखाई देने लगते हैं और द्वेष उत्पन्न हो जाता है। व्यक्ति फिर अपनी धर्म आराधना को दोष देने लगता है कि इतनी धर्म आराधना के बाद भी मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ। जबकि वास्तविकता यह है कि जो हो रहा है, वह अपने ही कर्मों का उदय है।
धर्म ही आत्मिक शांति का मार्ग
गुरुदेव ने कहा कि शरीर और मन की परेशानी का समाधान धर्म में है। अस्पताल में धन खर्च कर शरीर का उपचार कराया जाता है, लेकिन आत्मा और मन का उपचार धर्मस्थल में बिना किसी मूल्य के हो सकता है। इसके लिए धर्म के प्रति श्रद्धा और भावना जागृत करना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि पाप कर्म के उदय से दुख आया है तो सभी जीवों को साता पहुंचाने और अभयदान देने का प्रयास करें। पानी की बर्बादी, अनावश्यक बिजली व उनसे चलने वाले उपकरणों का उपयोग और जीवों के प्रति असावधानी से बचें। जब हम दूसरों को साता नहीं देंगे तो स्वयं को साता कैसे मिलेगी?
परम् पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि संसार में ऐसी कोई शक्ति नहीं जो कर्मों को बदल सके। दोष अपने कर्मों का है तो उसका भुगतान भी स्वयं को ही करना होगा। इसलिए किसी को दोषी मानकर बैर न बांधें। पाप कर्मों को दूर करने के लिए अधिक से अधिक धर्म आराधना करें।
उन्होंने प्रेरणा देते हुए कहा कि “धर्म कोई धंधा नहीं, लेकिन धंधे में धर्म जरूर होना चाहिए।” धर्म की शरण लेने से जीवन में शांति, समाधि और सरलता आती है। धर्म सहना सिखाता है और भव-भ्रमण को सुधारने का मार्ग दिखाता है। इसलिए जीवन की प्रत्येक परिस्थिति में दर्पण बनकर स्वयं को देखने और कर्मों को समझने का प्रयास करना चाहिए।




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