गुरुदेव के संक्षिप्त अणु संदेश के भावों पर चिंतन

गुरु के प्रति समर्पण और श्रेष्ठ आचरण ही सच्ची गुरु भक्ति : धर्मेन्द्रमुनिजी म.सा.

गुरु पूर्णिमा पर उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब, विभिन्न स्थानों से पहुंचे दर्शनार्थी; अनेक श्रावकों ने ग्रहण किए प्रत्याख्यान

थांदला (सम्यक दृष्टि न्यूज़)  

थांदला नगर की विशाल धर्म परिषद की उपस्थिति में चातुर्मास कल्प हेतु पौषध भवन में विराजित तत्वज्ञ पूज्य श्री धर्मेन्द्रमुनिजी म.सा. ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए गुरु पूर्णिमा के अवसर पर गुरुदेव के संक्षिप्त अणु संदेश के भावों पर चिंतन कराते हुए कहा कि जिनके हृदय में गुरुदेव सदैव विराजमान रहते हैं, उनके लिए हर दिन गुरु पूर्णिमा है। यह दिवस विशेष रूप से उनके लिए है, जो कभी-कभी गुरुदेव को याद करते हैं। गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धा केवल दर्शन और वंदन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि गुरु द्वारा बताए गए मार्ग पर चलना ही वास्तविक गुरु भक्ति है।

व्यसन की शुरुआत उत्सुकता और संगति दोष से

पूज्य श्री ने कहा कि जीव के व्यसनों का अभ्यस्त होने के पीछे मुख्य रूप से व्यसन के प्रति उत्सुकता, संगति दोष और गौरव प्रदर्शन की भावना जिम्मेदार होती है। धीरे-धीरे व्यक्ति व्यसनों की गिरफ्त में इस कदर आ जाता है कि वह अपना आत्मभान तक भूल जाता है। इसलिए व्यक्ति को समय रहते अपने जीवन का आत्मावलोकन करते हुए गलत आदतों से स्वयं को दूर करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जैसे ब्राह्मण ज्ञान के कारण पूज्य बनते हैं, वैसे ही श्रावक अपने आचरण के कारण पूज्य बनते हैं। श्रावक को अपने आत्मगौरव और प्रतिष्ठा का बोध होना चाहिए। व्यक्ति का वास्तविक सम्मान उसके रहन-सहन, व्यवहार और चरित्र से निर्धारित होता है।

आगम एवं प्रासंगिक दृष्टांतों के माध्यम से पूज्य श्री ने उपस्थित धर्मावलंबियों को अपना आकलन स्वयं करने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि जैन बनने की शुरुआत ही सप्त कुव्यसनों को छोड़ने के प्रत्याख्यान से होती है। इसलिए प्रत्येक श्रावक को यह विचार करना चाहिए कि उसका रहन-सहन कैसा है और वह अपने जीवन में किन आदतों को स्थान दे रहा है।

यदि कोई व्यक्ति जैन होकर व्यसनों में पड़ने को अपना स्टैंडर्ड मानता है तो यह उसकी भूल है। प्राचीन काल में असभ्य मनुष्य मांसाहारी और अभक्ष्य भोजी होते थे, जिन्हें पिछड़ा माना जाता था, लेकिन आज समय के साथ इस परिभाषा में बदलाव चिंता का विषय है। आधुनिकता के नाम पर गलत आदतों को स्वीकार करना सभ्यता का प्रतीक नहीं हो सकता।

युवाओं को चरित्र निर्माण का संदेश

युवाओं को प्रेरित करते हुए पूज्य श्री धर्मेन्द्रमुनिजी ने कहा कि जिस प्रकार 12वीं कक्षा के बाद चार-पांच वर्ष कठिन परिश्रम करके व्यक्ति अपने सांसारिक भविष्य को सुखद और सुरक्षित बनाने का प्रयास करता है, उसी प्रकार चारित्रिक सद्गुणों को अपनाकर वह अपने जीवन के वास्तविक भविष्य को भी सुखद बना सकता है।

उन्होंने कहा कि जीवन में शिक्षा और रोजगार के साथ-साथ संस्कार, संयम, सदाचार और आत्मानुशासन का होना भी उतना ही आवश्यक है। युवा अवस्था में अपनाए गए अच्छे संस्कार जीवनभर व्यक्ति के साथ रहते हैं।

मन सुधर जाए तो परिस्थिति भी बदल सकती है : संदीपमुनिजी म.सा.

रोचक वक्ता पूज्य श्री संदीपमुनिजी ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए प्रत्याख्यान के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि व्यक्ति के लिए प्रत्याख्यान लेने में सबसे बड़ी बाधा परिस्थिति और उसका अपना मन होता है। यदि मन ही सुधार की ओर अग्रसर होने के लिए तैयार नहीं है तो कोई दूसरा व्यक्ति उसे बदल नहीं सकता। वहीं यदि मन संयमित जीवन जीने का संकल्प कर ले तो व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों को भी बदलने का प्रयास करता है।

रोचक अंदाज में उन्होंने कहा कि आज जीव नई-नई फैशन ईजाद कर रहा है। दिन को रात बनाकर कैंडल लाइट डिनर कर रहा है, घर में हजारों रुपये के कुत्ते पाल रहा है, लेकिन अपने जीवन सुधार की ओर उसका ध्यान नहीं है। उन्होंने कहा कि प्रत्याख्यान लेने से जीवन के आधे से अधिक पापों में कमी आती है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार प्रत्याख्यान अवश्य ग्रहण करना चाहिए।

पूज्य श्री की प्रेरणा से धर्मसभा में उपस्थित अनेक सभासदों ने विभिन्न प्रत्याख्यान ग्रहण किए। इससे धर्मसभा में संयम एवं आत्मशुद्धि का वातावरण निर्मित हुआ। सभा का संचालन संघ के मंत्री हितेश शाह ने किया।

वर्षीतप एवं नन्दचक्र आराधकों ने ग्रहण किए उपवास के प्रत्याख्यान

धर्मसभा के दौरान वर्षीतप एवं नन्दचक्र आराधकों सहित अनेक तपस्वियों ने उपवास के प्रत्याख्यान ग्रहण किए। संघ अध्यक्ष प्रदीप गादिया एवं प्रवक्ता पवन नाहर ने जानकारी देते हुए बताया कि धर्मोत्कर्ष चातुर्मास के दौरान अनेक आराधक गुप्त रूप से तपस्या कर रहे हैं।

उन्होंने बताया कि आयुष व्होरा एवं आयुषी प्रदीप व्होरा ने 6 उपवास, संगीता राजेन्द्र श्रीश्रीमाल ने 4 उपवास, जबकि भद्र महावीर घोड़ावत, रमेशचन्द्र श्रीश्रीमाल, महावीर चौरड़िया एवं श्रेयांश रवि लोढ़ा ने 3-3 उपवास के प्रत्याख्यान ग्रहण किए। इसके साथ ही सामूहिक वर्षीतप एवं नन्दचक्र के आराधकों ने भी उपवास के प्रत्याख्यान ग्रहण किए। मंगलेश श्रीश्रीमाल, शकुंतला कांकरिया, सपना रुनवाल एवं स्वीटी गादिया श्रेणीतप की दीर्घ आराधना कर रहे हैं।

संगीता दिलीप पीचा की वर्धमान निवि तप की उत्कृष्ट आराधना में 57वीं लड़ी चल रही है। इसके अलावा अनेक आराधक आयम्बिल, निवि, एकासन के माध्यम से श्रेणीतप, वर्षीतप एवं वर्धमान एकासन तप की आराधना कर रहे हैं। संघ में निरंतर तेले एवं आयम्बिल तप की लड़ी भी चल रही है।

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर धर्मसभा में गुरु भक्ति, संयम, तप, त्याग एवं आत्मशुद्धि का अद्भुत संगम देखने को मिला। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति और अनेक श्रावकों द्वारा लिए गए प्रत्याख्यान ने गुरु पूर्णिमा के आयोजन को विशेष आध्यात्मिक गरिमा प्रदान की।

Dr.Talera's Multi-speciality Dental Clinic, Thandla 



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