इच्छाओं और क्रोध पर विजय ही आत्मकल्याण का मार्ग

भोग में नहीं, त्याग में है सच्चा सुख; इच्छाओं और क्रोध पर विजय ही आत्मकल्याण का मार्ग : तत्त्वज्ञ पूज्य श्री धर्मेन्द्रमुनिजी म.सा.

प्रत्याख्यान आत्मशुद्धि का प्रभावी साधन, दृढ़ संकल्प से ही व्यसन और कषायों पर पाया जा सकता है विजय : पूज्य श्री संदीपमुनिजी म.सा.

थांदला (सम्यक दृष्टि न्यूज़)

नगर के धर्ममय वातावरण में आयोजित विशाल धर्मसभा में तत्त्वज्ञ पूज्य श्री धर्मेन्द्रमुनिजी म.सा. एवं रोचक वक्ता पूज्य श्री संदीपमुनिजी म.सा. ने श्रद्धालुओं को आत्मकल्याण, त्याग, संयम एवं प्रत्याख्यान के महत्व पर विस्तृत धर्मोपदेश प्रदान किया। दोनों मुनिराजों ने जीवन में सुख प्राप्ति के वास्तविक मार्ग, कषायों के कारण, इच्छाओं के दुष्परिणाम तथा व्रत-प्रत्याख्यान की दुर्लभता पर प्रकाश डालते हुए उपस्थित धर्मप्रेमियों को आत्मचिंतन और आत्मसाधना के लिए प्रेरित किया।

तत्त्वज्ञ पूज्य श्री धर्मेन्द्रमुनिजी ने ‘अणु संदेश’ का आलंबन लेते हुए कहा कि संसार का प्रत्येक जीव सुख चाहता है, किन्तु वास्तविक सुख किसी को प्राप्त नहीं हो पाता। इसका मूल कारण बाहरी भोग-विलास में सुख की खोज करना है। उन्होंने कहा कि इतिहास साक्षी है कि परम वैभव और भोगों के स्वामी चक्रवर्ती राजा भी अंततः सच्चे सुख की तलाश में समस्त भोग-सामग्रियों का त्याग कर संयम के मार्ग पर अग्रसर हुए। इससे स्पष्ट होता है कि सुख भोग में नहीं, बल्कि त्याग में निहित है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य के भीतर क्रोध उत्पन्न होने का एक प्रमुख कारण अपने आपको बड़ा समझना है। जब व्यक्ति को किसी की आवश्यकता नहीं होती, तब उसके भीतर अहंकार जन्म लेता है और यही अहंकार आगे चलकर क्रोध, मान, माया और लोभ जैसी कषायों को जन्म देता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे वर्षा से हरियाली आती है और हरियाली से पुनः वर्षा का वातावरण बनता है, उसी प्रकार इच्छाओं को महत्व देने से क्रोध उत्पन्न होता है और क्रोध जैसी कषायों से नई इच्छाएं जन्म लेती हैं। यह क्रम निरंतर चलता रहता है और जीव संसार के बंधनों में उलझता चला जाता है।

पूज्यश्री ने साधुत्व की परिभाषा बताते हुए कहा कि समस्त पापों का त्याग ही वास्तविक साधुत्व है। संसारी अवस्था में जीव अनगिनत पापों से जुड़ा रहता है, लेकिन यदि वह अपने परिग्रह की मर्यादा निर्धारित कर ले तो पापों में निश्चित रूप से कमी लाई जा सकती है। उन्होंने कहा कि आत्मा पर संचित कर्मों के उदय से कषायों का प्रभाव स्वाभाविक रूप से बना रहता है, किन्तु सम्यक ज्ञान और सही दृष्टि उपशम भाव के माध्यम से मनुष्य को शांत रहना सिखाती है।

अनेक बार परिस्थितियां मनुष्य के नियंत्रण में नहीं होतीं, फिर भी वह क्रोध और चिड़चिड़ेपन का शिकार हो जाता है। यदि वह गंभीरता से विचार करे तो उसे अनुभव होगा कि इस प्रकार का व्यवहार सबसे अधिक नुकसान स्वयं उसका ही करता है। इसलिए आत्मदृष्टि से विचार करते हुए अपने आपको बड़ा समझने की भावना का त्याग करना, इच्छाओं को महत्व न देना तथा चिड़चिड़ापन दूर करने का सतत प्रयास करना ही आत्मकल्याण का मार्ग है।

अपने प्रवचन के समापन में पूज्य श्री धर्मेन्द्रमुनिजी ने कहा कि जिस प्रकार चिकित्सक शरीर में वात, पित्त और कफ के असंतुलन को दूर कर रोग का उपचार करता है, उसी प्रकार आत्मा में उत्पन्न होने वाले क्रोध, मान, माया और लोभ रूपी कषायों का संतुलन भी अत्यंत घातक है। इनका केवल नियंत्रण नहीं, बल्कि पूर्णतः समाप्त होना आवश्यक है, तभी जीव संसार बंधन से मुक्त होकर मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर हो सकता है।

धर्मसभा में रोचक वक्ता पूज्य श्री संदीपमुनिजी म.सा. ने प्रत्याख्यान ग्रहण करने के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जब कोई जीव पच्चख्खाण (प्रत्याख्यान) ग्रहण करता है, तब वह अपने आश्रव के द्वारों और अनावश्यक इच्छाओं का निरोध करता है। इससे उसकी तृष्णा समाप्त होने लगती है और वह अधिक शांति एवं संतोष के साथ जीवन व्यतीत करता है।

उन्होंने अत्यंत सरल उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार लोकतांत्रिक व्यवस्था में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री अथवा कोई भी जनप्रतिनिधि चुनाव जीतने के बाद शपथ ग्रहण करता है, तभी उसे वैधानिक मान्यता प्राप्त होती है। उसी प्रकार आध्यात्मिक जीवन में केवल भोगों का त्याग पर्याप्त नहीं है, बल्कि संकल्पपूर्वक प्रत्याख्यान ग्रहण करना ही उस त्याग को महान और फलदायी बनाता है।

पूज्यश्री ने कहा कि शपथ के प्रत्येक शब्द का अपना महत्व होता है। उसी प्रकार पच्चख्खाण के संकल्प, उसकी विधि तथा उसके प्रत्येक शब्द का सही ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है। यह नियमित अभ्यास और स्वाध्याय से ही संभव होता है। उन्होंने विशेष रूप से पर्युषण पर्व की तैयारी कर रहे स्वाध्यायियों को हित शिक्षा देते हुए कहा कि पच्चख्खाण केवल औपचारिकता या स्पर्श मात्र नहीं होना चाहिए, बल्कि पूर्ण जागरूकता, उपयोग और सही क्रम के साथ ग्रहण करना चाहिए, तभी उसका वास्तविक आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है।

पूज्य श्री संदीपमुनिजी ने व्रत एवं प्रत्याख्यान की दुर्लभता का उल्लेख करते हुए कहा कि भरत और ऐरावत क्षेत्र में अत्यंत विशाल कालखंडों में भी व्रत-पच्चख्खाण का अवसर अत्यंत दुर्लभ होता है। देवगति के जीव भी अनेक विशेषताओं के बावजूद संकल्पपूर्वक लघुतम तप करने में समर्थ नहीं होते। मनुष्य जन्म में भी अधिकांश क्षेत्रों में व्रत और प्रत्याख्यान का अभाव दिखाई देता है।

आज मोबाइल की लत, चाय, तंबाकू जैसे व्यसन तथा अनावश्यक घूमने-फिरने की प्रवृत्तियां जीव को व्रत और प्रत्याख्यान ग्रहण करने से रोकती हैं। यदि व्यक्ति दृढ़ संकल्प कर ले तो इन सभी बाहरी व्यसनों का त्याग सहज रूप से संभव है। जब तक मनुष्य बाहरी विषय-विकारों और व्यसनों का त्याग नहीं करेगा, तब तक वह अपने भीतर के राग-द्वेष और कषायों से भी मुक्त नहीं हो सकेगा।

अंत में पूज्यश्री ने कहा कि जिन सौभाग्यशाली जीवों को व्रत, प्रत्याख्यान और तप की आराधना का अवसर सहज रूप से प्राप्त हुआ है, उन्हें इसकी दुर्लभता को समझते हुए अधिकाधिक तप, संयम और आत्मसाधना में प्रवृत्त होना चाहिए। यही जीवन को सफल बनाने और मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर होने का श्रेष्ठ उपाय है। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और मुनिराजों के प्रेरणादायी प्रवचनों का लाभ प्राप्त किया।

Dr.Talera's Multi-speciality Dental Clinic, Thandla 


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