दूसरों से तुलना और अनावश्यक चिंता छोड़ें, अनुकंपा भाव अपनाएं : परम् पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा.
धर्म के लिए समय निकालें, धन के पीछे भागकर आराधना को न भूलें
नागपुर, 7 अक्टूबर 2026। धर्मदास संप्रदाय के सुमेरु परम पूज्य गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने अपने प्रवचन में जीवन की शांति, सम्यक बोध, कर्मों के उदय, अभावजनित दुःख, अनावश्यक चिंता और दूसरों से तुलना करने की प्रवृत्ति पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भगवान महावीर ने अपने अनुभव के आधार पर जीव को मोक्ष का मार्ग बताया है। जीवन में वास्तविक शांति और समाधि सम्यक बोध से ही प्राप्त होती है। मनुष्य अपने जीवन से दुःख दूर करने के लिए अनेक प्रयास करता है, लेकिन वह यह समझना भूल जाता है कि जीवन में सुख-दुःख की परिस्थितियां कर्मों के उदय के अनुसार आती हैं। जब तक दुःख की अवधि रहती है, तब तक जीव को उसका सामना करना पड़ता है। कई बार व्यक्ति का पूरा जीवन अभावों और कठिनाइयों के बीच गुजर जाता है। ऐसे में परिस्थितियों को लेकर व्यर्थ चिंतन करने के बजाय विवेक और समता के साथ जीवन जीना चाहिए।
दूसरों के सुख-साधनों को देखकर परेशान न हों
गुरुदेवश्री ने कहा कि मनुष्य अक्सर सोचता है कि मेरे पास कुछ नहीं है, जबकि दूसरे के पास कितना कुछ है। मेरे पास कम और उसके पास अधिक क्यों है? इस प्रकार की सोच जीव को मानसिक अशांति की ओर ले जाती है। दूसरे के पास क्या है और क्या नहीं, इस चिंता में उलझने के बजाय व्यक्ति को अपने जीवन का आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। उसने अब तक क्या किया, आगे क्या करना है, कौन-से कार्य बाकी हैं और जो कुछ वह सोच रहा है या कर रहा है, क्या वह उचित है? इन प्रश्नों पर चिंतन करना अधिक आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि याद रखें, पूरी दुनिया को सुधारने का ठेका आपने नहीं लिया है। आप अपने विचारों, व्यवहार और आचरण को सुधार सकते हैं। दूसरों के जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप करने और उनकी परिस्थितियों पर टिप्पणी करने से अपने ही कर्मों का बंध होता है। इसलिए प्रत्येक जीव के प्रति सद्भावना रखें और उसके मंगल की कामना करें।
कर्मों के उदय को समझें, किसी के लिए ऊंच-नीच न सोचें
गुरुदेवश्री ने कर्म सिद्धांत की व्याख्या करते हुए कहा कि प्रत्येक जीव के कर्म अलग-अलग होते हैं। किसी के जीवन में सुख-सुविधाएं हैं तो किसी के जीवन में अभाव हैं। किसी को धर्माराधना के अच्छे अवसर मिलते हैं तो किसी को अनुकूल वातावरण नहीं मिल पाता। यह सब जीव के कर्मों के उदय और उनकी परिस्थितियों से जुड़ा है। इसलिए किसी भी जीव के प्रति ऊंच-नीच का विचार नहीं करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि लौकिक हो या लोकोत्तर क्षेत्र, दूसरे जीव को जो करना है, उसे करने दें। हर बात में हस्तक्षेप करना, किसी के कार्यों की आलोचना करना और उसके बारे में दूसरों को बताना उचित नहीं है। किसी की त्रुटि दिखाई दे तो उसे लेकर चार लोगों के बीच चर्चा करने के बजाय उसके प्रति अनुकंपा का भाव रखें। यह विचार करें कि संभव है, वह अपनी परिस्थितियों और कर्मों की विवशता के कारण ऐसा कर रहा हो। किसी के प्रति गलत विचार रखकर हम अपने लिए नए कर्मबंध क्यों बढ़ाएं?
एक ही दृश्य, लेकिन विचार अलग-अलग
गुरुदेवश्री ने एक उदाहरण देते हुए समझाया कि एक ही घटना को देखकर अलग-अलग व्यक्तियों के विचार भिन्न हो सकते हैं। एक नवविवाहित युवती घर से बाहर निकली। कुछ दूर जाने के बाद उसका आयुष्य पूर्ण हो गया। वहां से गुजर रहे एक संत ने उसे देखा तो उनके मन में विचार आया कि यदि यह युवती पहले मिली होती तो उसे धर्म का उपदेश देकर धर्ममार्ग की प्रेरणा देता। वहीं, एक युवक ने उसी युवती को देखकर विचार किया कि वह कितनी सुंदर है, यदि पहले मिली होती तो उसे अपनी पत्नी बना लेता।
गुरुदेवश्री ने कहा कि एक ही दृश्य को देखकर दो व्यक्तियों के मन में अलग-अलग विचार उत्पन्न हुए। इससे स्पष्ट होता है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी दृष्टि और विचारों के अनुसार प्रतिक्रिया करता है। इसलिए दूसरों के प्रति भले-बुरे विचार करने के बजाय अपने मन को शांत रखना चाहिए। हमें यह भी नहीं मालूम कि किस जीव का आयुष्य कब पूर्ण हो जाए। जीवन की अनिश्चितता को समझकर वैर, द्वेष और अनावश्यक आलोचना से बचना चाहिए।
उन्होंने एकेंद्रिय जीवों का उल्लेख करते हुए कहा कि पृथ्वी, पानी, अग्नि, वायु और वनस्पति में भी जैन दर्शन के अनुसार जीव माने गए हैं। उनकी अभिव्यक्ति की क्षमता अलग होती है। वे अपनी स्थिति को हमारी तरह व्यक्त नहीं कर पाते। इसलिए प्रत्येक जीव के प्रति संवेदनशीलता और करुणा का भाव रखना चाहिए।
नियम टूटने पर भी कर्मों के उदय को समझें
गुरुदेवश्री ने श्रेणिक महाराज के प्रसंग के माध्यम से कर्मों के उदय को समझाया। उन्होंने बताया कि श्रेणिक महाराज ने नवकारसी का नियम लिया था। इसी दौरान बोर बेचने वाला आया। महाराज को अपने नियम का ध्यान नहीं रहा और उन्होंने चखने के बहाने बोर खा लिया। इस प्रकार उनका नियम टूट गया।
इस प्रसंग से समझना चाहिए कि कई बार व्यक्ति नियम का पालन करना चाहता है, फिर भी परिस्थितियों या असावधानी के कारण त्रुटि हो जाती है। ऐसे अवसर पर घटना को समझते हुए आत्मचिंतन करना चाहिए। कर्मों के उदय को समझने का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति अपने दायित्वों से विमुख हो जाए, बल्कि उसे अपनी त्रुटियों के प्रति सजग होकर आगे विवेकपूर्वक आचरण करना चाहिए।
अनावश्यक चिंता और नकारात्मक सोच से बचें
गुरुदेवश्री ने कहा कि कोई भी व्यक्ति बीमार नहीं होना चाहता, फिर भी उसे बीमारी का सामना करना पड़ सकता है। जैन दर्शन में इसे असाता वेदनीय कर्म के उदय से जोड़कर समझाया जाता है। इसी प्रकार जीवन में आने वाली प्रतिकूल परिस्थितियों को समझने के लिए भी कर्म सिद्धांत दृष्टि प्रदान करता है।
उन्होंने अनावश्यक चिंता करने की प्रवृत्ति पर कहा कि कई लोग ऐसी बीमारी की चिंता में डूबे रहते हैं, जो अभी उन्हें हुई भी नहीं है। इस दौरान उन्हें ऐसे सलाहकार भी मिल जाते हैं, जो तरह-तरह की आशंकाएं बताकर उनकी चिंता और बढ़ा देते हैं। परिणामस्वरूप व्यक्ति वास्तविक समस्या से अधिक काल्पनिक समस्याओं से परेशान होने लगता है।
उन्होंने समझाया कि किसी के बेटे-बेटी बड़े हो रहे हों तो उनकी शादी की चिंता दूसरे लोग करने लगते हैं। बिना पूछे सलाह देना, भविष्य की आशंकाएं खड़ी करना और हर परिस्थिति में अनहोनी की कल्पना करना उचित नहीं है। इससे मन की शांति भंग होती है। जैसे पौधे को पोषण मिलने से वह बढ़ता है, वैसे ही निरंतर नकारात्मक विचारों को महत्व देने से चिंता बढ़ सकती है। इसलिए बिना आवश्यकता किसी को सलाह देने या उसके जीवन को लेकर आशंकाएं व्यक्त करने से बचना चाहिए।
किसी की गलती पर न्यायाधीश नहीं, अनुकंपा करने वाले बनें
गुरुदेवश्री ने कहा कि जब कर्मों का प्रतिकूल उदय होता है, तब कई बार धर्म का लाभ भी नहीं मिल पाता। व्यक्ति को ऐसे स्थान पर रहना पड़ सकता है, जहां गुरु भगवंतों का विचरण नहीं होता या जैन परिवारों की संख्या बहुत कम होती है। प्रत्येक जीव की परिस्थितियां अलग-अलग होती हैं, लेकिन हम उन्हें समझने के बजाय एक-दूसरे पर उंगली उठाने लगते हैं।
उन्होंने कहा कि यदि शांतिपूर्ण जीवन जीना है तो नए कर्मबंध से बचना होगा। किसी ने ऐसा किया, किसी ने वैसा किया—इन बातों को लेकर स्वयं न्यायाधीश बनने की जरूरत नहीं है। जैसा हम दूसरों के साथ व्यवहार करते हैं, वैसी ही प्रतिक्रिया मिलने की संभावना रहती है। इसलिए अपने वचन, व्यवहार और आचरण को संयमित रखें। किसी की गलती पर उसकी निंदा करने के बजाय उसके प्रति अनुकंपा का भाव जगाएं। यही दृष्टिकोण मनुष्य को मानसिक शांति की ओर ले जाता है।
अभावजनित दुःख का बड़ा कारण है तुलना
गुरुदेवश्री ने अभावजनित दुःख की व्याख्या करते हुए कहा कि कई बार व्यक्ति के पास आवश्यक सुख-सुविधाएं होने के बावजूद वह दूसरों को देखकर दुखी होने लगता है। वह सोचता है कि मैंने किसी को काम सिखाया, आगे बढ़ने में उसकी मदद की, लेकिन आज वह मुझसे आगे कैसे निकल गया? मेरे बाद आया व्यक्ति इतना सफल कैसे हो गया? उसके पास इतना धन कैसे आ गया?
उन्होंने कहा कि दूसरे की उन्नति देखकर स्वयं को परेशान करने के बजाय यह समझना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति की परिस्थितियां और कर्मों का उदय अलग-अलग होता है। जैन दर्शन में लाभांतराय कर्म के क्षयोपशम की अवधारणा के माध्यम से लाभ प्राप्ति की परिस्थितियों को समझाया जाता है। दूसरे को मिले लाभ के कारण अपने मन में ईर्ष्या और असंतोष पैदा करना स्वयं को दुःखी करना है।
उन्होंने कहा कि तुलना केवल धन और संपत्ति में ही नहीं होती, बल्कि शरीर, स्वास्थ्य, परिवार और जीवन की सुविधाओं में भी होती है। कोई दूसरे के स्वस्थ शरीर को देखकर अपने शरीर को लेकर असंतुष्ट हो जाता है। इस प्रकार वह अपने पास उपलब्ध सुखों का आनंद भी नहीं ले पाता। इसलिए अपने जीवन को दूसरों के जीवन से तौलने के बजाय अपनी परिस्थितियों को स्वीकार कर विवेकपूर्ण ढंग से जीवन जीना चाहिए।
झोपड़ी और महल, दोनों की अपनी-अपनी परेशानियां
गुरुदेवश्री ने कहा कि संसार अपूर्ण वस्तुओं और अपूर्ण व्यक्तियों से भरा हुआ है। किसी के पास धन अधिक है तो कोई सीमित साधनों में जीवन जीता है। किसी के पास बड़ा घर है तो उसके रखरखाव, सफाई और व्यवस्था की भी अधिक जिम्मेदारियां हैं। झोपड़ी में रहने वाले की अपनी समस्याएं हैं और महल में रहने वाले की अपनी परेशानियां हैं।
उन्होंने कहा कि सुख-सुविधाओं की अधिकता हमेशा मन की शांति की गारंटी नहीं होती। जितनी अधिक सामग्री और संपत्ति होगी, उतनी ही अधिक उसकी देखभाल और सुरक्षा की चिंता भी हो सकती है। इसलिए व्यक्ति को विवेकपूर्वक तय करना चाहिए कि उसे जीवन में कितनी सामग्री की आवश्यकता है। अनावश्यक संग्रह और अधिक पाने की लालसा से बचना चाहिए।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि व्यक्ति करोड़पति हो जाए, तब भी भोजन में उसे दाल-रोटी ही खानी है। जब जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं सीमित हैं, तो धन के लिए दिन-रात हाय-हाय क्यों करना? धन अर्जित करने की दौड़ में धर्म और आत्मकल्याण को पीछे नहीं छोड़ना चाहिए।
सिकंदर को महिलाओं ने समझाया भोजन का वास्तविक महत्व
गुरुदेवश्री ने सिकंदर से जुड़ा एक प्रसंग सुनाकर धन और वास्तविक आवश्यकताओं के अंतर को समझाया। उन्होंने बताया कि सिकंदर अपनी लूट और शक्ति के कारण लोगों में भय पैदा करता था। एक बार वह ऐसे गांव में पहुंचा, जहां युवा पुरुष गांव छोड़कर जा चुके थे और वहां बुजुर्ग तथा महिलाएं ही रह गई थीं।
भूख लगने पर सिकंदर ने गांव की महिलाओं से भोजन मांगा। महिलाओं ने उसके सामने हीरे-मोतियों से भरे थाल रख दिए। सिकंदर ने कहा कि इनसे उसकी भूख नहीं मिट सकती। इस पर महिलाओं ने प्रश्न किया कि यदि भूख मिटाने के लिए भोजन चाहिए तो फिर हीरे-मोतियों का क्या उपयोग?
इसके बाद महिलाओं ने उसे पारंपरिक तरीके से भोजन परोसा। गुरुदेवश्री ने इस प्रसंग के माध्यम से समझाया कि धन और आभूषण जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं का स्थान नहीं ले सकते। मनुष्य को अपनी जरूरत और लालसा के बीच अंतर समझना चाहिए। जब भोजन से पेट भरना है, तो धन के लिए धर्म और आत्मकल्याण को क्यों पीछे छोड़ना?
हाथी और चिड़िया का उदाहरण देकर बताया संतुलन का महत्व
गुरुदेवश्री ने कहा कि जब हाथी भोजन करता है तो भोजन का कुछ अंश नीचे गिर जाता है, जिससे चिड़िया को भी भोजन मिल जाता है। इससे हाथी का भोजन कम नहीं होता और चिड़िया का पेट भी भर जाता है। इस उदाहरण से सीख मिलती है कि जीवन में उदारता, सहयोग और संतुलन का महत्व समझना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने भाग्य और कर्मों के अनुसार जो कुछ प्राप्त हुआ है, उसका सदुपयोग करना चाहिए। धर्माराधना के लिए थोड़ा समय निकाल लेने से जीवन की जिम्मेदारियां समाप्त नहीं हो जातीं और न ही आवश्यक कार्य रुक जाते हैं। इसलिए अवसर मिलने पर धर्म, स्वाध्याय और आत्मचिंतन के लिए समय अवश्य निकालना चाहिए।
गुरुदेवश्री ने समझाया कि अभाव की चिंता में व्यक्ति कई बार अपने पास मौजूद सुख-सुविधाओं का भी सही उपयोग नहीं कर पाता। जो मिला है, उसका सम्मान करें और जो नहीं मिला, उसके लिए निरंतर परेशान न रहें। भाग्य में जितना प्राप्त होना है, उतना मिलेगा—इस भाव के साथ विवेकपूर्ण पुरुषार्थ भी आवश्यक है।
सामाजिक विषयों पर अनावश्यक चिंता करने से बचें
गुरुदेवश्री ने सामाजिक विषयों में अनावश्यक हस्तक्षेप की प्रवृत्ति पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने एक प्रसंग बताया कि प्रवचन के बाद एक व्यक्ति उनके पास आया और कहने लगा कि जैन परिवारों की लड़कियां दूसरी जाति में विवाह कर रही हैं, इस विषय में कुछ करना चाहिए। जबकि उस व्यक्ति की अपनी बेटी ने भी दूसरी जाति में विवाह किया था।
गुरुदेवश्री ने उससे पूछा कि वह इस विषय में क्या कर सकता है। प्रसंग के माध्यम से उन्होंने समझाया कि प्रत्येक परिस्थिति को केवल चिंता और आलोचना से नहीं बदला जा सकता। समाज के विषयों पर विचार करते समय विवेक, संवाद और अपने आचरण की समीक्षा आवश्यक है। दूसरों को दोष देने से पहले स्वयं के व्यवहार पर भी ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि हर घटना को लेकर अनावश्यक चिंता करने के बजाय अपनी जिम्मेदारियों को समझना चाहिए। जो विषय हमारे नियंत्रण में नहीं हैं, उनके बारे में निरंतर सोचते रहने से मानसिक अशांति बढ़ती है। इसलिए विवेक के साथ अपनी भूमिका तय करना और अपने आचरण को सुधारना अधिक उपयोगी है।
अभाव को कर्मों का उदय मानकर संतोषपूर्वक जीवन जिएं
प्रवचन के समापन में गुरुदेवश्री ने कहा कि जीवन में अभाव दिखाई दे तो उसे लेकर ईर्ष्या, द्वेष और चिंता में डूबने के बजाय यह विचार करें कि वर्तमान में मेरे कर्मों का ऐसा उदय है। यह भाव व्यक्ति को परिस्थितियों को समझने और मानसिक संतुलन बनाए रखने में सहायता करता है।
उन्होंने कहा कि जीवन में संतोष का अर्थ पुरुषार्थ छोड़ देना नहीं है। इसका अर्थ है कि व्यक्ति अपनी उपलब्धियों का सम्मान करे, आवश्यक प्रयास करता रहे और दूसरों की उन्नति से ईर्ष्या न करे। धन, परिवार, स्वास्थ्य और सुख-सुविधाओं को लेकर लगातार तुलना करने से मन अशांत होता है। इसके विपरीत आत्मचिंतन, सद्भावना, अनुकंपा और धर्माराधना जीवन को सार्थक बनाते हैं।
गुरुदेवश्री का संदेश था कि दूसरों के जीवन का न्याय करने के बजाय स्वयं को सुधारें, अनावश्यक चिंता और तुलना छोड़ें तथा प्रत्येक जीव के प्रति अनुकंपा का भाव रखें। कर्मों के सिद्धांत को समझकर, विवेकपूर्वक आचरण करते हुए और नए कर्मबंध से बचने का प्रयास करते हुए ही जीवन में शांति और समाधि की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।




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