‘क्या होगा, कैसे होगा’ की चिंता छोड़ कर्मों के उदय को समभाव से स्वीकार करें

कल्पनाओं के जाल में उलझकर जीव अपना वर्तमान करता है खराब : परम् पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा.

राग-द्वेष ही बंधनों के मूल कारण, कारण खत्म होंगे तो घटेगा संसार का परिभ्रमण

नागपुर, 6 अक्टूबर (सम्यक दृष्टि) धर्मदास संप्रदाय सुमेरु परम पूज्य गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने प्रवचन में जीवन के सबसे बड़े दुखों में से एक को मनुष्य की अपनी कल्पनाओं को बताते हुए कहा कि व्यक्ति जितना वर्तमान में दुखी नहीं होता, उससे कहीं अधिक वह भविष्य की कल्पनाओं में उलझकर दुखी होता है। 

“क्या होगा, कैसे होगा, अगर ऐसा हो गया तो...” जैसे प्रश्न मनुष्य की शांति छीन लेते हैं। उन्होंने कहा कि भगवान महावीर ने भव्य जीवों के कल्याण के लिए मोक्ष का मार्ग बताया है। उस मार्ग पर चलने के लिए सबसे पहले सम्यक बोध और सही समझ आवश्यक है।

परम् पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि सही समझ के अभाव में जीव नादानी में स्वयं को बंधनों में बांधता है, फिर उन्हीं बंधनों में उलझकर फंस जाता है। हमें केवल बंधनों को तोड़ने की चिंता नहीं करनी है, बल्कि बंधनों के कारणों को समाप्त करना है। उन्होंने इसे पौधे के उदाहरण से समझाते हुए कहा कि पौधे को तोड़ने की आवश्यकता नहीं होती, उसे पानी देना बंद कर दिया जाए तो वह स्वयं सूख जाएगा। इसी प्रकार जन्म-मरण और बार-बार गर्भ धारण करने के संसार चक्र को रोकने के लिए उसके मूल कारणों को समाप्त करना होगा। इन बंधनों के दो प्रमुख कारण हैं—राग और द्वेष।

दुख केवल बीमारी या आर्थिक परेशानी से नहीं आता

मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक और आर्थिक दुखों से तो परेशान रहता ही है, लेकिन इसके अलावा चार ऐसे कारण हैं, जिनसे वह स्वयं अपने लिए दुख पैदा करता है। ये हैं—कल्पना जनित, अभाव जनित, संयोग जनित और परिस्थिति जनित दुख।

गुरुदेव ने कहा कि कल्पना जनित दुख अज्ञानता से पैदा होता है। मनुष्य भविष्य की कल्पना करके वर्तमान को खराब कर देता है। पुत्र की चिंता, पत्नी की चिंता, परिवार की चिंता, धन, पद और प्रतिष्ठा की चिंता—इन सबके बीच वह यह भूल जाता है कि जिस भविष्य के लिए वह परेशान है, वह अभी आया ही नहीं है। उन्होंने कहा कि “क्या होगा और कैसे होगा” की चिंता में मनुष्य अपना वर्तमान खराब कर देता है। भविष्य की चिंता करते-करते वर्तमान की शांति भंग हो जाती है।

पुत्र हो तो भी चिंता, नहीं हो तो भी चिंता

परम् पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि संसार का स्वभाव ही ऐसा है कि मनुष्य दोनों तरफ से दुखी है। पुत्र नहीं है तो चिंता कि वंश कैसे चलेगा और पुत्र हो गया तो उसकी चिंता शुरू हो जाती है।

उन्होंने कहा, “याद रखना, वंश किसी का रहा नहीं और रहेगा भी नहीं। आपको अपनी पूरी पिछली पीढ़ियां तक याद नहीं हैं, फिर आप कैसे सोच सकते हैं कि आने वाली पीढ़ियां आपको हमेशा याद रखेंगी?”

उन्होंने तीर्थंकरों के संदर्भ में भी समझाया कि संसार में अनेक महान आत्माएं हुईं, लेकिन सामान्य मनुष्य को उनके नाम तक याद नहीं रहते। फिर अपने वंश और प्रतिष्ठा को लेकर इतनी चिंता क्यों?

सगे रिश्तों से बड़ा हो सकता है पुण्य का रिश्ता

प्रवचन में उन्होंने एक मार्मिक प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि एक सेठ ने अपने पुत्र को बड़े प्यार से पढ़ाया-लिखाया, उसका विवाह कराया और जीवनभर उसकी हर इच्छा पूरी की। लेकिन वृद्धावस्था में उसी पुत्र ने उन्हें “बूढ़ा” कहकर वृद्धाश्रम भेज दिया।

वहीं सेठजी ने कभी एक अनाथ बालक को सहारा दिया था। उसे अपना बेटा मानकर पढ़ाया और दसवीं कक्षा तक उसकी शिक्षा का खर्च उठाया। वही बालक आगे चलकर सेठजी के काम आया। वृद्धाश्रम में बीमार पड़े सेठजी का इलाज कराया, उनकी सेवा की और उन्हें अपने घर ले आया।

मुनिश्री ने कहा कि वह व्यक्ति सगा बेटा नहीं था, लेकिन उसने सगे बेटे से बढ़कर फर्ज निभाया। सेठजी की दिनचर्या के अनुसार स्वयं की दिनचर्या बनाई, जैन नहीं होने के बावजूद सेठजी की भावनाओं का सम्मान करते हुए उसने रात्रि भोजन, जमीकंद और मांसाहार का त्याग किया। बाद में पति-पत्नी दोनों ने जैन धर्म के सिद्धांतों को अपने जीवन में उतार लिया।

उन्होंने कहा कि सेठजी के पुण्य का उदय था, इसलिए उन्हें सेवा करने वाला कहीं और से मिल गया। संसार में रिश्ते केवल खून से नहीं, पुण्य से भी मिलते हैं।

बीमारी से ज्यादा बीमारी की कल्पना करती है परेशान

परम् पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि जब तक व्यक्ति जीवित है, तब तक शरीर में कभी यह दर्द तो कभी वह दर्द बना रहता है। लेकिन शरीर समाप्त होने के बाद रोग भी समाप्त हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि बीमारी की वास्तविकता से अधिक उसका डर मनुष्य को परेशान करता है।

उन्होंने सवाल किया कि यदि भविष्य की बीमारी की चिंता इतनी जरूरी है तो मनुष्य कैंसर, बीपी या शुगर की दवा पहले से क्यों नहीं खा लेता? क्या भविष्य में आने वाली हर बीमारी की दवा पहले से लेकर उसे रोका जा सकता है? नहीं।

उन्होंने कहा कि इसलिए “अगर ऐसा हो गया तो...” जैसी कल्पनाएं छोड़कर वर्तमान में सही जीवन जीना चाहिए।

स्टेटस और पद भी स्थायी नहीं

मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य को अपने “नाक” की चिंता बहुत सताती है, जिसे आज की भाषा में स्टेटस कहा जाता है। जिस स्टेटस के पीछे मनुष्य भाग रहा है, वह किसी का स्थायी नहीं रहा और न रहेगा।

उन्होंने कहा कि पद चला गया तो क्या होगा, यह डर भी मनुष्य को सताता है। जब तक पुण्य का उदय है, तब तक कोई व्यक्ति का बाल भी बांका नहीं कर सकता और जब पाप कर्मों का उदय होता है तो कोई बचाने वाला भी नहीं होता।

उन्होंने कहा कि तनाव का बड़ा कारण खोटी कल्पना है। धन आया तो उसे संभालने की चिंता, व्यापार बढ़ा तो उसका डर, गलत तरीके से कमाया तो कार्रवाई का भय—मनुष्य स्वयं ही कल्पनाओं से दुख पैदा करता है।

“अपना है तो कहीं जाएगा नहीं और अपना नहीं है तो टिकेगा नहीं”— इस भाव को समझने की जरूरत है।

गुरुदेव के कपड़ों पर कीचड़ फेंकने वाला ही सहायता का मोहताज बना

प्रवचन के दौरान गुरुदेव ने एक अत्यंत प्रेरक प्रसंग सुनाया।

उन्होंने बताया कि एक बार वर्षावास के लिए गुरुदेव विहार करते हुए जा रहे थे। रास्ते में जगह-जगह गड्ढों में पानी और कीचड़ भरा था। तभी एक व्यक्ति तेज गति से वाहन लेकर वहां से गुजरा और पूरा कीचड़ गुरुदेव के कपड़ों पर उछल गया।

वह व्यक्ति थोड़ी दूर गया तो उसकी गाड़ी पंचर हो गई। आसपास सुनसान जंगल था और सहायता करने वाला कोई दिखाई नहीं दे रहा था। कुछ समय बाद विहार सेवा के लिए आए लोग वहां पहुंचे। थोड़ी देर में गुरुदेव भी वहां आ गए।

वाहन चालक ने लोगों को देखकर राहत की सांस ली। उसे लगा कि अब उसकी मदद हो जाएगी। सेवा के लिए आए लोगों ने गुरुदेव के कपड़ों पर कीचड़ देखा और पूछा कि यह कैसे हुआ?

गुरुदेव चाहते तो सच बता सकते थे कि इसी व्यक्ति ने वाहन तेज गति से निकालकर उनके कपड़ों पर कीचड़ उछाला था। लेकिन उन्होंने सहजता से कहा—“चलता रोड है, कभी-कभी ऐसा हो जाता है।”

मुनिश्री ने कहा कि गुरुदेव ने उस व्यक्ति को अपमानित नहीं किया। उस व्यक्ति को स्वयं अपनी गलती का एहसास हुआ और भीतर से शर्मिंदगी महसूस हुई कि मैंने क्या कर दिया।

उन्होंने कहा कि विपरीत परिस्थिति में व्यक्ति का वास्तविक साधकत्व सामने आता है। जो परिस्थिति में सही ढंग से निकल जाए, वही साधना के मार्ग पर है।

‘मेरे कर्मों का कर्ज कम हुआ’—यह भाव रखो

परम् पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि मतार्थी कभी आत्मार्थी नहीं बन सकता। जीवन में जो कुछ हो रहा है, उसे कर्मों का परिणाम मानना चाहिए। विपरीत परिस्थिति आने पर यह विचार करना चाहिए कि “मेरे कर्म बाकी थे, इसलिए यह परिस्थिति आई और मेरा कर्मों का कर्जा कम हुआ।”

उन्होंने कहा कि यदि आत्मा पर कर्मों की मिट्टी लगी है तो उसे साफ कौन करेगा? स्वयं को ही प्रयास करना होगा। जहां मतभेद है, वहां अहंकार है और अहंकार व्यक्ति को अंधकार में ले जाता है। अंधकार में रास्ता दिखाई नहीं देता।

उन्होंने चेताया कि सफलता मिलते ही अहंकार आ जाना भी पतन का कारण है। छोटी-सी सफलता और बड़ा-सा अहंकार व्यक्ति की पूरी साधना को कमजोर कर सकता है।

ज्ञान होने के बावजूद संस्कार बदलना आसान नहीं

मुनिश्री ने कहा कि व्यक्ति अपनी पात्रता और संस्कारों के अनुसार ही ज्ञान ग्रहण कर पाता है। उन्होंने एक स्वाध्यायी का उदाहरण दिया, जो बहुत ज्ञानी थे, लेकिन उनकी एक आदत थी कि वे दो पत्थरों को स्नान कराए बिना चैन महसूस नहीं करते थे ओर वे दूसरों को ऐसा करने से मना करते थे, लेकिन स्वयं उस संस्कार से मुक्त नहीं हो पा रहे थे। उस आदत को बदलने में उन्हें काफी समय लगा।

उन्होंने कहा कि केवल ज्ञान अर्जित कर लेना पर्याप्त नहीं है। ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह व्यवहार और संस्कारों में दिखाई दे।

कर्मों का उदय आएगा ही, उसे स्वीकार करना सीखें

परम् पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि कर्मों का जैसा उदय होगा, वे सामने आएंगे ही। उनसे बचना संभव नहीं है। व्यक्ति को कर्मों के परिणामों को स्वीकार करना सीखना चाहिए।

उन्होंने स्वभाव का उदाहरण देते हुए कहा कि सुअर को कितनी भी अच्छी जगह पर रख दिया जाए, वह अपने स्वभाव के कारण गंदगी की ओर जाएगा। इसी प्रकार जीव के संस्कार और स्वभाव भी उसके व्यवहार को प्रभावित करते हैं।

उन्होंने कहा कि कई बातें परिस्थितियों पर भी निर्भर करती हैं। जैसे आप को 102 बुखार है और आप की खिचड़ी खाने की परिस्थिति नहीं और आप को दाल बाफला खाने का बोल दिया जाए तो ऐसा आप नहीं कर पाएंगे। ठीक वैसे ही कुछ बातें परिस्थिति पर भी निर्भर करती है। इसी प्रकार जीवन में भी हर परिस्थिति के अनुसार मनुष्य की क्षमता और प्रतिक्रिया बदलती है।

प्रवचन के माध्यम से गुरुदेव ने कहा कि जीवन में शांति चाहिए तो भविष्य की अनावश्यक कल्पनाओं में उलझने के बजाय वर्तमान को सुधारना होगा। राग-द्वेष को कम करना होगा, अहंकार से बचना होगा और कर्मों के उदय को समभाव से स्वीकार करना होगा।

भविष्य की चिंता से वर्तमान न बिगाड़ें, परिस्थिति को कर्मों का परिणाम मानकर स्वीकार करें और सम्यक बोध के साथ आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ें—यही भगवान महावीर के बताए मार्ग की सार्थक दिशा है।


Dr.Talera's Multi-speciality Dental Clinic, Thandla 


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