राम के क्षमा गुण और रावण की तीन शिक्षाओं से दिया विवेकपूर्ण जीवन का संदेश

पूज्य श्री चंद्रेशमुनिजी ने बताया मोक्षमार्ग, पूज्य श्री जिनांशमुनिजी ने दिए संस्कारों के सूत्र; वर्षीतप के पारणे सम्पन्न

संवेग की भावना ही आत्मा को कर्म बंधन से मुक्त करने का मार्ग है : पूज्य श्री चंद्रेशमुनिजी म.सा.

थांदला. कर्मों से मुक्त होने की इच्छा, भव परंपरा से मुक्त होने की आकांक्षा तथा कर्मबंध के कारणों से छुटकारा पाने की भावना ही वास्तविक संवेग का स्वरूप है। जीव चक्षु, अचक्षु दर्शन एवं मन के सहयोग से प्राप्त ज्ञान के माध्यम से धर्म के सही स्वरूप को समझ सकता है।
उक्त प्रेरक उद्बोधन परम पूज्य मुनि श्री चंद्रेशमुनिजी म.सा. ने पोषध भवन पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री ने कहा कि संसार में जीव अनादिकाल से बाह्यजगत के पदार्थों को पकड़कर आत्मतत्त्व से दूर होता चला गया है। इसे सरल उदाहरण से समझाते हुए उन्होंने धर्मसभा से प्रश्न किया कि यदि भोजन करते समय दाँत से जीभ कट जाए तो क्या जीभ को निकालेंगे या दाँत को? वास्तव में न तो दाँत निकालना बुद्धिमानी है और न ही जीभ, बल्कि विवेकपूर्वक व्यवहार ही ऐसी स्थिति से बचा सकता है। ठीक इसी प्रकार आत्मकल्याण के लिए बाह्य पदार्थों का मोह छोड़कर आत्मा की ओर लौटना आवश्यक है।

उन्होंने भगवान श्रीराम एवं रावण के दृष्टांत के माध्यम से सहनशीलता, क्षमा और विवेक का महत्व बताया। मुनि श्री ने कहा कि श्रीराम के क्षमा और सहनशीलता जैसे गुणों ने उन्हें जगत पूज्य बनाया, जबकि रावण का अहंकार उसके पतन का कारण बना। श्रीराम ने गुणदृष्टि रखते हुए लक्ष्मण को रावण से भी हितकारी शिक्षा ग्रहण करने की प्रेरणा दी।

मुनि श्री ने रावण की तीन महत्वपूर्ण शिक्षाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि मन में अशुभ विचार आए तो कल्याणमित्र रूपी गुरु से अवश्य सलाह लेनी चाहिए। यदि कोई हितकारी सलाह दे तो उस पर आवेश नहीं करना चाहिए तथा मन में शुभ विचार उत्पन्न होते ही उसे तुरंत व्यवहार में लाना चाहिए। उन्होंने बताया कि रावण ने सीता हरण के समय गुरु से सलाह नहीं ली, विभीषण की उचित सलाह पर क्रोधित हो गया तथा मंदोदरी के कहने पर भी सीता को लौटाने के शुभ विचार को अमल में नहीं लाया, जिसके कारण उसका विनाश हुआ। मुनि श्री ने कहा कि जब जीव में संवेग की तीव्र भावना जागृत हो जाती है तो वह संसार विस्तार को घटाने का पुरुषार्थ करता है और यही वास्तविक धर्मक्रिया है।

मोबाइल संस्कृति बच्चों के संस्कारों को कर रही है कमजोर, धर्म ही श्रेष्ठ संस्कारों का आधार : पूज्य श्री जिनांशमुनिजी म.सा.

जीवन को संस्कारित बनाने और संतानों को धर्म की शरण देने का  उपदेश देते हुए थांदला गौरव पूज्य मुनि श्री जिनांशमुनिजी म.सा. ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि भगवान ने जीव की स्वभाव और विभाव दोनों अवस्थाओं का वर्णन किया है, किन्तु संसारी जीव सांसारिक कार्यों को ही अपना स्वभाव मानकर उसी में पुरुषार्थ कर रहा है। उन्होंने आगम का आलंबन लेते हुए कहा कि अनादिकाल से यह जीवन असंस्कृत है और आयुष्य रूपी डोर एक बार टूटने के बाद दोबारा नहीं जुड़ती। संसार के कोई भी रिश्ते-नाते अथवा परिवारजन आयुष्य को बढ़ाने में समर्थ नहीं हैं, इसलिए जीवन को संस्कारित बनाना ही सबसे बड़ा पुरुषार्थ है।

मुनि श्री ने कहा कि वर्तमान समय में बच्चों में संस्कारों की कमी के लिए माता-पिता भी जिम्मेदार हैं। यदि माता-पिता अपने पूर्वजों से मिले धार्मिक एवं नैतिक संस्कार अपनी संतानों को नहीं देंगे तो जैन दर्शन के सिद्धांतों का ह्रास होने के साथ-साथ आने वाली पीढ़ी स्वयं और समाज दोनों के दुःख का कारण बन जाएगी।

मोबाइल के दुष्प्रभावों पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि आज छोटे-छोटे बच्चों को भी मोबाइल थमा दिया जाता है, जिससे वे प्रारंभ से ही इसके आदी बन जाते हैं। आगे चलकर बिना सही-गलत का विवेक विकसित हुए वे अनुचित वेब सीरीज और अन्य भ्रामक सामग्री देखने लगते हैं तथा गलत संगति और आदतों का शिकार हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे वातावरण का प्रभाव बच्चों के आचरण पर पड़ता है और वे अपने माता-पिता एवं बड़ों के प्रति भी सम्मान का भाव खोने लगते हैं।

मुनि श्री ने कहा कि संतों को मांसाहारी घरों से गोचरी ग्रहण करना कल्पनीय नहीं है। यदि समाज में ऐसी प्रवृत्तियाँ बढ़ेंगी तो संतचर्या भी प्रभावित होगी। इसलिए प्रत्येक माता-पिता का कर्तव्य है कि वे समय रहते अपनी संतानों को धर्म, संस्कार और सदाचार की शरण दें, जिससे उनका जीवन और समाज दोनों सुरक्षित एवं श्रेष्ठ बन सके।

धर्मसभा का संचालन संघ सचिव हितेश शाह ने किया। उन्होंने गुरु भगवंतों के विहार सहित विभिन्न धार्मिक गतिविधियों की जानकारी भी श्रद्धालुओं को दी।


जलगाँव निवासी भंडारी परिवार ने करवाये वर्षितप के पारणें


संघ अध्यक्ष प्रदीप गादिया ने बताया कि थांदला में चल रहे सामुहिक वर्षितप आराधकों के सामूहिक पारणें संघ व्यवस्था के अनुसार जलगाँव (महाराष्ट्र) निवासी आशीष प्रेमकुमारी सुजानमलजी भंडारी परिवार ने करवाये। इस अवसर पर थांदला जिनालय जीर्णोद्धार कर्ता मोहनखेड़ा तीर्थ प्रणेता श्रीमद्विजय पूज्य श्री ऋषभविजयजी के सुशिष्य वर्षितप आराधक पूज्य श्री पियुषविजयजी म.सा. ने वर्षितप आराधना स्थल पर पहुँच कर सभी को मांगलिक श्रवण करवाई वही नवकार महामंत्र के सामूहिक जाप के पश्चात तपस्वियों ने पारणा किया। इस अवसर पर लाभार्थी परिवार से थांदला संघ के पूर्व उपाध्यक्ष अशोक तलेरा, कमलेश तलेरा व पारस तलेरा विशेष रूप से उपस्थित रहे।

Dr.Talera's Multi-speciality Dental Clinic, Thandla 


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