जीवन को धर्ममय बनाने की प्रेरणा

श्रद्धा और श्रुतज्ञान की आराधना से ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है : पूज्य श्री चंद्रेशमुनिजी म.सा.

पोषध भवन में धर्मसभा आयोजित, पूज्य श्री पावनमुनिजी म.सा. ने धर्म के सही स्वरूप को समझने का दिया संदेश

थांदला. नगर के पोषध भवन में आयोजित धर्मसभा में परम पूज्य श्री चंद्रेशमुनिजी म.सा. एवं परम पूज्य श्री पावनमुनिजी म.सा. के प्रेरणादायी प्रवचनों का लाभ बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने प्राप्त किया। धर्मसभा में दोनों संतों ने श्रद्धा, श्रुतज्ञान, तप, संयम तथा आत्मकल्याण के मार्ग पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए उपस्थित धर्मप्रेमियों को अपने जीवन को धर्ममय बनाने की प्रेरणा दी।

धर्मसभा को संबोधित करते हुए परम पूज्य श्री चंद्रेशमुनिजी म.सा. ने अनुत्तर धर्म श्रद्धा विषय पर विस्तार से व्याख्यान दिया। आपने कहा कि यदि साधक अनुत्तर धर्मरूपी श्रद्धा के साथ श्रुतज्ञानरूपी साधन की आराधना नहीं करेगा तो वह मोक्षरूपी साध्य को प्राप्त नहीं कर सकेगा और दुर्लभ मनुष्य जन्म को व्यर्थ गंवा देगा। मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ है और इसका सर्वोच्च उद्देश्य आत्मकल्याण एवं मोक्ष की प्राप्ति है। इसलिए प्रत्येक साधक को धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझते हुए श्रद्धा एवं ज्ञान की आराधना करनी चाहिए।

पूज्यश्री ने जयसुन्दर एवं सौम्यसुन्दर के प्रेरक दृष्टांत के माध्यम से समझाया कि जब किसी साधक के भीतर अनुत्तर धर्म श्रद्धा जागृत हो जाती है तो वह अपने व्रतों और संयम की रक्षा के लिए अपने प्राणों का भी त्याग करने में पीछे नहीं हटता। विशेष रूप से ब्रह्मचर्य जैसे महाव्रतों की रक्षा के लिए दिया गया बलिदान संथारा संलेखना सहित भव-परंपरा को समाप्त करता है।

उन्होंने कहा कि क्रोध, मान, माया और लोभ—ये चारों कषाय हमारे अनंत भवों के बंधन का प्रमुख कारण रहे हैं। इसके बावजूद हम इन कषायों का मूल उपचार करने के बजाय विषय-विकारों की मीठी गोली लेकर स्वयं को संतुष्ट कर लेते हैं। जब तक कषायों की जड़ पर प्रहार नहीं होगा, तब तक आत्मा का रोग समाप्त नहीं हो सकता। धर्म की आराधना आत्मा की सर्जरी के समान है, जो भव-भ्रमण से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है।

पूज्यश्री ने आगे कहा कि अनादिकाल से जीव ने अनेक भव ऐसे भी किए हैं, जहाँ न नेत्र थे और न ही मन की पूर्ण क्षमता। वहाँ श्रुतज्ञान का भी अभाव रहा। यदि इस दुर्लभ मनुष्य जन्म में भी श्रुतज्ञान की साधना नहीं की जाएगी तो वह ज्ञान भविष्य के भवों की स्मृति में भी नहीं आएगा। इसलिए वर्तमान जीवन को धर्म, अध्ययन और साधना से सार्थक बनाना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि वर्तमान में हमें उत्तम क्षेत्र, उत्तम भवन, स्वस्थ शरीर, अनुकूल परिवार तथा जीवन की अनेक सुविधाएँ प्राप्त हुई हैं, फिर भी मनुष्य धन और विषय-कषायों की लालसा में उलझकर अपने वास्तविक लक्ष्य से भटक जाता है। यदि यही जीवन धर्म आराधना में लगाया जाए तो आत्मकल्याण का मार्ग सहज बन सकता है।

धर्मसभा में पूज्य श्री पावनमुनिजी म.सा. ने भी प्रेरणादायी उद्बोधन देते हुए कहा कि संसार में मिथ्यात्व का प्रभाव अधिक दिखाई देता है, जबकि जैन धर्म का प्रतिशत अत्यंत अल्प है। उसमें भी सच्ची धर्म श्रद्धा का अभाव देखने को मिलता है। इसका प्रमुख कारण धर्म के स्वरूप को लेकर फैली विविध धारणाएँ हैं। यदि जीव धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझ ले तो वह सम्यक्त्व को धारण कर जैनत्व की श्रेष्ठता को आत्मसात कर सकता है।

उन्होंने कहा कि सर्वज्ञता ही धर्म का वास्तविक आधार है। जब तीर्थंकर भगवान राग-द्वेष का पूर्ण क्षय कर केवलज्ञान प्राप्त करते हैं, तब वे समस्त लोक और अलोक का यथार्थ स्वरूप जान लेते हैं। वे यह भी जान लेते हैं कि जीव दुःख क्यों भोग रहा है और उससे मुक्ति का उपाय क्या है। उसी करुणा से वे भव्य जीवों को धर्म का मार्ग बताते हैं, जिस पर चलकर जीव अनुत्तर सुख और अंततः मोक्ष को प्राप्त करता है।

धर्मसभा का संचालन समाज के सचिव हितेश शाह ने किया। इस अवसर पर उन्होंने गुरुमुख से तपस्वियों के प्रत्याख्यान ग्रहण करवाए तथा तप की अनुमोदना करते हुए धर्मसभा में जयघोष भी करवाया। कार्यक्रम के अंत में श्री संघ अध्यक्ष प्रदीप गादिया एवं कोषाध्यक्ष रजनीकांत शाहजी सहित समाजजनों ने दोनों पूज्य गुरुभगवंतों से थांदला में अधिक समय तक स्थिरता रखने की विनम्र प्रार्थना की, ताकि नगरवासियों को उनके सान्निध्य एवं सत्संग का अधिकाधिक लाभ मिलता रहे। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएँ उपस्थित रहे।

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