जो आपका है, वह किसी न किसी रूप में आपके पास आएगा

नि:स्वार्थ प्रेम से ही जीवन बनता है सरल और सार्थक
मोहनीय कर्म के नशे में जीव करता है राग-द्वेष, ईमानदारी और धर्म साथ हों तो किसी से डरने की जरूरत नहीं : परम् पूज्य गुरुदेव गुलाब मुनिजी म.सा.

नागपुर, 20 सितंबर। धर्मदास संप्रदाय सुमेरु परम पूज्य गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने प्रवचन में कहा कि भगवान महावीर ने भव्य जीवों के कल्याण के लिए मोक्ष का मार्ग बताया है। जीवन रूपी रंगमंच पर जीव अनादिकाल से अलग-अलग योनियों में अनेक पात्र निभाता आया है, लेकिन किसी के साथ स्थायी बंधुपना नहीं रहा। जीव स्वयं ही कर्ता है और स्वयं ही अपने कर्मों का भोक्ता है। इसलिए जीवन को सुंदर, सरल और सार्थक बनाने के लिए प्रत्येक संबंध में नि:स्वार्थ प्रेम का भाव होना आवश्यक है।

गुरुदेव ने कहा कि कोई भी जीव पराया नहीं होता और जड़ पदार्थ कभी अपना नहीं होता। जब जीव के भीतर नि:स्वार्थ प्रेम का अभाव होता है, तब अपने और पराए का भेद खड़ा हो जाता है। धर्म के प्रति भावना तो बहुत होती है, लेकिन जब धर्म के नाम पर भी भेदभाव आने लगे तो धर्म का वास्तविक स्वरूप पीछे छूट जाता है। जब तक दूसरे जीव के प्रति पराएपन का भाव रहेगा, तब तक जन्म-मरण का चक्र चलता रहेगा।

प्रेम और त्याग से ही संबंधों में आती है मजबूती

उन्होंने कहा कि संबंधों में नि:स्वार्थ प्रेम होना चाहिए। प्रेम के आधार पर ही मित्रता कायम रहती है। यदि मित्रता और रिश्तों को बनाए रखना है तो आपसी आर्थिक व्यवहार से बचना चाहिए। परिस्थितिवश किसी मित्र या संबंधी के साथ अर्थ का व्यवहार करना पड़े तो दिए हुए धन को मन में नहीं रखना चाहिए। उसे भूल जाने की शक्ति ही संबंधों को टूटने से बचाती है।

गुरुदेव ने कहा कि जब रिश्तों में स्वार्थ प्रवेश करता है तो उनके अंत में देर नहीं लगती। मेरी बात सुनी जाए, मुझे पूछा जाए और मेरे हिसाब से काम किया जाए—जब ऐसी अपेक्षाएं बढ़ने लगती हैं तो संबंधों में तनाव पैदा होता है। इसलिए अपना व्यवहार अच्छा रखना चाहिए, सामने वाला हमारे साथ कैसा भी व्यवहार करे, उस पर अधिक ध्यान नहीं देना चाहिए।

उन्होंने कहा कि “जैसा सप्लाय, वैसा रिप्लाई” वाली मानसिकता से ऊपर उठना होगा। सामने वाला गलत करता है तो उसके जवाब में हम भी गलत व्यवहार करें, यह उचित नहीं है। हमारे लिए महत्वपूर्ण यह है कि हमने सामने वाले के साथ कैसा व्यवहार किया।

शराब का नशा ही नहीं, मोह का नशा भी करता है विवेक को नष्ट

गुरुदेव ने समझाया कि यदि कोई व्यक्ति शराब के नशे में आकर किसी को गाली देता है तो हम उसकी बात को गंभीरता से नहीं लेते, क्योंकि हमें पता है कि वह नशे में है। लेकिन यही बात जब कोई समझदार व्यक्ति कह देता है तो हम तुरंत गुस्सा हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि वास्तव में दूसरा व्यक्ति भी एक प्रकार के नशे में है—वह मोहनीय कर्म के नशे में है।

मोह के नशे में जीव दूसरों की गलतियां देखता है, ऊंचा-नीचा बोलता है, अपशब्द कहता है और राग-द्वेष में फंसकर कर्मों का बंध करता है। यही मोह का नशा जीव को संसार की चार गतियों में भटकाता रहता है। सामने वाले ने हमारे साथ क्या किया, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना यह कि हमने उसके साथ वापस कैसा व्यवहार किया।

उन्होंने कहा कि जिससे प्रेम होता है, उसकी गलतियां भी दिखाई नहीं देतीं। यही मोहनीय कर्म के नशे की शक्ति है। इसलिए प्रेम को निर्मल बनाना होगा और संबंधों को स्वार्थ से मुक्त करना होगा।

शरीर ही नहीं, पद-प्रतिष्ठा की वासना भी बांधती है जीव को

गुरुदेव ने एक संत के अवधि ज्ञान से जुड़े प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि एक बार एक संत को अवधि ज्ञान हुआ उस समय प्रथम देवलोक के इंद्र रूठी हुई इंद्राणी को मना रहे थे और मनाते मनाते उन्होंने अपना मुकुट इंद्राणी के पैरों में रख दिया किंतु इंद्राणी ने उस मुकुट को भी लात मार दी और इंद्र इंद्राणी के पैर को छू करके देख रहे हैं कि कहीं तुम्हें लगी तो नहीं यह सारा दृश्य मुनिराज ने अवधि ज्ञान में देखा तो सहसा उन्हें हंसी आ गई और उनका अवधि ज्ञान चला गया अर्थात इस संसार में जीव स्वार्थ और वासना का कितना गुलाम बना हुआ है।। ये वासना की गुलामी है।

शरीर की वासना के अलावा भी जीव में पद, प्रतिष्ठा, मान और सत्ता की भी वासना होती है। शरीर की वासना तो एक भव को ही बिगाड़ती है लेकिन सत्ता आदि की वासना न जाने कितने भव बिगाड़ देती है। प्रेम का अभाव बैर, शत्रुता, विघटन और अलगाव की स्थिती तक उत्पन्न कर देता है। याद रखना अगर सुंदर, उत्तम, सरल जीवन निःस्वार्थ प्रेम से ही मिलता है। संसार में जीव स्वार्थ और वासना का कितना गुलाम बना हुआ है। उन्होंने कहा कि वासना केवल शरीर से संबंधित नहीं होती। जीव पद, प्रतिष्ठा, मान-सम्मान और सत्ता की वासना में भी फंस जाता है।

शरीर की वासना एक भव को प्रभावित कर सकती है, लेकिन सत्ता, पद और प्रतिष्ठा की वासना न जाने कितने भवों को प्रभावित कर सकती है। उन्होंने कहा कि प्रेम के अभाव में बैर, शत्रुता, विघटन और अलगाव की स्थिति पैदा होती है। यदि जीवन को सुंदर, उत्तम और सरल बनाना है तो उसका आधार नि:स्वार्थ प्रेम ही होना चाहिए।

हर जीव के प्रति अपनत्व जागे, तभी आत्मिक उत्थान

गुरुदेव ने कहा कि भावनाओं से जुड़े संबंध अधिक स्थायी होते हैं। प्रत्येक जीव के प्रति निर्मल भाव रखना चाहिए। जब तक सभी जीवों के प्रति अपनत्व की भावना जागृत नहीं होगी, तब तक मुक्ति का मार्ग प्रशस्त नहीं होगा। दूसरे जीवों के प्रति पराएपन का भाव रखना स्वयं अपने लिए जन्म-मरण की नींव तैयार करना है।

उन्होंने कहा कि कई बार मनुष्य दूसरे के दुख को भी दंभ या नाटक समझ लेता है। ऐसा दृष्टिकोण कर्मबंध का कारण बन सकता है। किसी जीव को दुख में देखकर यह विचार करना चाहिए कि उसके कर्मों के उदय से ऐसी परिस्थिति आई होगी। करुणा, क्षमा और अपनत्व का भाव रखना चाहिए।

धर्म साधना में भी अहंकार और दिखावा नहीं

गुरुदेव ने सामायिक और धार्मिक साधना के संदर्भ में कहा कि धर्म केवल बाहरी क्रियाओं का नाम नहीं है। यदि सामायिक करते हुए भी मन में अहंकार, द्वेष और दूसरों को छोटा समझने का भाव है तो साधना का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं होता।

उन्होंने कहा कि “मेरी विधि सही है, मेरी सामायिक दूसरे की सामायिक से श्रेष्ठ है, मेरी तपस्या बड़ी है”—ऐसा भाव धर्म को अहंकार का माध्यम बना देता है। गुप्त तपस्या के नाम पर अपनी तपस्या का प्रचार करना, अपनी अच्छाइयों की बड़ी-बड़ी बातें करना और अपनी कमियों को छिपाना स्वयं को ही ठगना है।

जहां अहसान जताने का भाव नहीं होता, वहीं वास्तविक प्रेम होता है। आपने किसी के लिए क्या किया, उसका हिसाब रखने के बजाय अपनी गलतियों का हिसाब रखना चाहिए। क्षमा और निर्लोभता बढ़े, ऐसे कार्य करने चाहिए। सभी जीवों के प्रति क्षमा धर्म का भाव रखना चाहिए।

ईमानदारी के साथ धर्म हो तो किसी से डरने की जरूरत नहीं

गुरुदेव ने व्यापार में ईमानदारी का महत्व बताते हुए कहा कि यदि धंधे में ईमानदारी नहीं रखी तो गलत तरीके से कमाया धन किसी न किसी रूप में चला जाएगा। उन्होंने कहा कि अनावश्यक खर्च कम किए जाएं तो जीवन की कई चिंताएं अपने आप कम हो सकती हैं।

उन्होंने एक सेठ का प्रसंग सुनाया। सेठ की दुकान पर एक अधिकारी जांच करने पहुंचा। सेठ ने अपना पूरा बहीखाता अधिकारी के सामने रख दिया और स्वयं दुकानदारी में लग गया। काफी देर तक जांच के बाद भी कोई गड़बड़ी नहीं मिली। इस प्रसंग के माध्यम से गुरुदेव ने कहा कि जब जीवन में ईमानदारी और धर्म साथ हों तो किसी से डरने की आवश्यकता नहीं रहती। सच्चाई व्यक्ति की सबसे बड़ी ताकत होती है।

पाप से डरें, किसी व्यक्ति से नहीं

गुरुदेव ने कोरोना काल का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि निर्धारित समय के बाद दुकान बंद करने के दौरान सामान अंदर रखने में एक दुकानदार को कुछ देर हो गई। कुछ लोग चालान की बात कहते हुए वहां पहुंचे। दुकानदार ने नियमों का हवाला देते हुए उन लोगों की तस्वीर लेने की बात कही और कहा कि यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है तो यह भी पुलिस को बताया जाएगा। यह सुनकर वे लोग वहां से चले गए।

गुरुदेव ने इस प्रसंग के माध्यम से कहा कि व्यक्ति को गलत काम से डरना चाहिए। “डरना है तो पाप से डरो, किसी के बाप से डरने की जरूरत नहीं पड़ेगी।” यदि व्यक्ति का आचरण सच्चा और ईमानदार है तो अनावश्यक भय उसके भीतर नहीं रहेगा।

ईमानदारी से व्यापार करने पर बढ़ा लाभ, ग्राहकों का भी बढ़ा विश्वास

प्रवचन में गुरुदेव ने एक सेठ और उसकी बहू का प्रेरक प्रसंग सुनाया। एक पिता ने अपनी बेटी के विवाह से पहले उससे पूछा कि वह गृहस्थ जीवन चुनेगी या दीक्षा का मार्ग। बेटी ने कहा कि वह दीक्षा के लिए अभी इतनी दृढ़ नहीं है, इसलिए उसका विवाह ऐसे धार्मिक परिवार में किया जाए, चाहे वह परिवार साधारण ही क्यों न हो।

उसका विवाह एक सेठ परिवार में हुआ। परिवार धार्मिक था। ससुर नियमित सामायिक करते थे और रात्रि भोजन का त्याग भी करते थे। लेकिन एक दिन बहू ने देखा कि दुकान पर सामान तौलते समय सेठ बेईमानी कर रहे हैं। वह दुखी हुई और उसने शाम को प्रतिक्रमण के समय ससुर से इस बारे में बात की।

सेठ ने कहा कि व्यापार में ऐसा करना पड़ता है। बहू ने उन्हें समझाया कि भाग्य में जितना लिखा है, उतना मिलेगा ही। उसने आग्रह किया कि वे केवल एक सप्ताह ईमानदारी से व्यापार करके देखें। सेठ ने बहू की बात मान ली।

एक सप्ताह बाद व्यापार में लाभ बढ़ गया, ग्राहक अधिक संतुष्ट रहने लगे और काम भी बढ़ गया। सेठ ने बहू को बताया कि ईमानदारी से व्यापार करने के बाद लाभ पहले से अधिक हुआ है। इसके बाद बहू ने सेठ से सोने का एक बिस्किट खरीदने को कहा। बिस्किट पर सेठ का नाम लिखवाकर उसे लाल कपड़े में बांधा गया और सड़क किनारे रख दिया गया। अगले दिन सफाई करने वाली महिला को वह पोटली मिली। बिस्किट पर सेठ का नाम देखकर वह उसे लेकर सेठ के पास पहुंच गई।

बहू ने कहा कि जो आपके भाग्य में है, वह किसी न किसी रूप में आपके पास लौटकर आएगा। इसके बाद उसी बिस्किट को लाल कपड़े में बांधकर नदी में डाल दिया गया। संयोग से वह एक मछली द्वारा निगल लिया गया। मछली पकड़ने वाले व्यक्ति के हाथ वही मछली लगी। घर जाकर जब उसने मछली को काटा तो उसके भीतर वही पोटली निकली। पोटली पर सेठ का नाम देखकर वह भी सोने का बिस्किट सेठ को लौटाने पहुंच गया।

इस प्रसंग के माध्यम से बहू ने सेठ को समझाया कि जो आपके भाग्य में है, वह किसी न किसी रास्ते से आपके पास आएगा। इसके बाद सेठ को विश्वास हो गया और उसने व्यापार में फिर कभी हेराफेरी नहीं की।

जो भाग्य में है, उसके लिए गलत रास्ता अपनाने की जरूरत नहीं

गुरुदेव ने कहा कि मनुष्य अपने भाग्य पर भरोसा नहीं करता और लगातार “हाय-हाय” करते हुए लालच में पड़ जाता है। इसी कारण वह अनावश्यक कर्मों का बंध कर लेता है। जो आपका है, वह किसी न किसी रूप में आपके पास आएगा और जो आपका नहीं है, उसे गलत तरीके से हासिल करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि जीवन में नि:स्वार्थ प्रेम, क्षमा, निर्लोभता, ईमानदारी और निर्मल व्यवहार को स्थान देना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन आत्मचिंतन करना चाहिए कि वह जिन लोगों से मिल रहा है, उनके साथ उसका व्यवहार स्वार्थ से प्रेरित है या नि:स्वार्थ प्रेम से।

गुरुदेव ने संदेश दिया कि रिश्तों में प्रेम रखें, व्यवहार में ईमानदारी रखें, धर्म में अहंकार न आने दें और प्रत्येक जीव के प्रति अपनत्व का भाव रखें। यही जीवन को सरल बनाने तथा आत्मा के उत्थान की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग है

Dr.Talera's Multi-speciality Dental Clinic, Thandla 



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