इच्छा दुख का प्रमुख कारण है। इच्छाओं के पीछे भागता हुआ मनुष्य कभी संतुष्ट नहीं हो पाता।

दुखों को नहीं, दुखों के कारणों को नष्ट करना ही सच्ची धर्म आराधना है : परम् पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा.

सम्यक बोध के अभाव में जीव अनंत जन्म-मरण के चक्र में भटकता है, आठों कर्मों का क्षय होने पर ही मिलती है मोक्ष की प्राप्ति

नागपुर, 19 अक्टूबर। धर्मदास संप्रदाय सुमेरु परम पूज्य गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने अपने प्रवचन में धर्म, कर्म सिद्धांत, सम्यक बोध, मोक्ष मार्ग तथा जीवन में आने वाले सुख-दुख के वास्तविक कारणों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जिनेश्वर देव ने भव्य जीवों के कल्याण के लिए मोक्ष का मार्ग बताया है। भगवान महावीर ने अपने अनुभव से समझाया कि सम्यक बोध के अभाव में जीव अनंत बार जन्म-मरण के चक्र में भटकता रहा है। संसार में रहते हुए मनुष्य शरीर और संसार के लिए तो अनेक प्रकार की आराधना करता है, लेकिन आत्मकल्याण के लिए आवश्यक साधना करना भूल जाता है।

परम् पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि जब जीव संसार और शरीर के प्रति आसक्ति रखकर आराधना करता है, तब वह कर्म बंधन में उलझा रहता है। संसार का कालचक्र निरंतर चलता रहता है। जिस प्रकार गर्मी के बाद वर्षा और वर्षा के बाद पुनः गर्मी का मौसम आता है, उसी प्रकार संसार में सुख-दुख का क्रम चलता रहता है। संसार में कोई भी सुख शाश्वत नहीं है। एक दुख समाप्त होता है तो दूसरा सामने आ जाता है। जब तक शरीर है, तब तक जीव संसार के बंधनों में रहता है। इसलिए मनुष्य को क्षणिक सुखों के पीछे भागने के बजाय कर्म निर्जरा के लिए साधना और आराधना करनी चाहिए।

प्रकृति के अनुकूल जीवन जीने से मिलता है स्वास्थ्य

गुरुदेव ने प्रकृति के अनुरूप जीवन जीने की प्रेरणा देते हुए कहा कि मनुष्य को अपनी दिनचर्या ऋतु और प्रकृति के अनुसार रखनी चाहिए। अत्यधिक कृत्रिम सुविधाओं पर निर्भरता और प्राकृतिक जीवनशैली से दूरी अनेक समस्याओं का कारण बन सकती है। जंगल में रहने वाले पशु-पक्षी और प्रकृति के निकट जीवन बिताने वाले लोग ऋतुओं के अनुरूप अपना जीवन जीते हैं। प्राकृतिक जीवनशैली में शारीरिक श्रम और सहज दिनचर्या का विशेष महत्व है।

उन्होंने कहा कि प्रकृति के नियमों को समझकर जीवन जीना चाहिए। प्रकृति के विरुद्ध जाने के दुष्परिणाम व्यक्ति के साथ पर्यावरण को भी प्रभावित कर सकते हैं। मनुष्य को अपनी आवश्यकताओं और सुविधाओं के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए।

सिद्ध भगवान आठों कर्मों का क्षय कर प्राप्त करते हैं शाश्वत सुख

प्रवचन में गुरुदेव ने सिद्ध पद की व्याख्या करते हुए बताया कि जिन्होंने आत्मा को कर्मों के बंधन से पूर्णतः मुक्त कर लिया है और आत्मा के आठों गुणों को पूर्ण रूप से प्रकट कर लिया है, वे सिद्ध भगवान कहलाते हैं। ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, वेदनीय, मोहनीय, आयुष्य, नाम, गोत्र और अंतराय—ये आठ कर्म हैं, जिनका पूर्ण क्षय होने पर आत्मा मोक्ष प्राप्त करती है।

उन्होंने बताया कि ज्ञानावरणीय और दर्शनावरणीय कर्मों के क्षय से केवलज्ञान और केवलदर्शन प्रकट होते हैं। वेदनीय कर्म के समाप्त होने पर सिद्ध भगवान अव्याबाध सुख प्राप्त करते हैं, जिसमें किसी प्रकार की बाधा नहीं होती। मोहनीय कर्म के क्षय से मोह का अंत होता है तथा शुद्ध सम्यक्त्व और शुद्ध चरित्र प्रकट होते हैं। आयुष्य कर्म समाप्त होने पर जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है। नाम कर्म के क्षय से शरीर का संबंध समाप्त होता है, जबकि गोत्र कर्म के क्षय से ऊंच-नीच का भेद मिट जाता है। अंतराय कर्म के क्षय से आत्मा की शक्तियों में आने वाली बाधाएं समाप्त हो जाती हैं।

गुरुदेव ने कहा कि सिद्ध अवस्था में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होता। वहां न कोई ऊंचा है और न कोई नीचा। इसलिए प्रत्येक जीव को ऐसी साधना करनी चाहिए, जिससे वह कर्मों का क्षय कर शाश्वत सुख की प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ सके।

इच्छा सबसे बड़ा दुख, स्नेह सबसे बड़ा बंधन

परम् पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने जीवन के गूढ़ सिद्धांत को समझाते हुए कहा कि इच्छा दुख का प्रमुख कारण है। इच्छाओं के पीछे भागता हुआ मनुष्य कभी संतुष्ट नहीं हो पाता। इसी प्रकार स्नेह और आसक्ति भी जीव को संसार के बंधनों में बांधते हैं। जिस प्रकार तिल, मूंगफली और सरसों को पिसने पर उनमें से तेल निकलता है, उसी प्रकार जड़ और चेतन के प्रति अत्यधिक आसक्ति जीव को संसार की चक्की में पिसने के लिए विवश करती है।

उन्होंने कहा कि ज्ञानी और अज्ञानी की दृष्टि में बहुत अंतर होता है। अज्ञानी मृत्यु को मिटाना चाहता है, जबकि ज्ञानी जन्म के कारणों को समाप्त करने का प्रयास करता है। ज्ञानी समझता है कि जब तक कर्मों का बंधन बना रहेगा, तब तक जन्म-मरण का क्रम चलता रहेगा। इसलिए आत्मकल्याण के लिए मोह, राग-द्वेष और आसक्ति से दूर रहना आवश्यक है।

गुरुदेव ने यह भी समझाया कि सुख और दुख दोनों कर्मों के उदय से प्राप्त होते हैं। सुख में अत्यधिक लिप्त होने से नए कर्म बंध सकते हैं, जबकि दुख के समय समभाव बनाए रखने वाला व्यक्ति नए कर्म बंधन से बचने का प्रयास कर सकता है। उन्होंने कहा कि दुख आने पर हाय-हाय करने से वेदना बढ़ती है। इसके बजाय शांत रहकर अपने कर्मों को समझना चाहिए और धर्म आराधना के माध्यम से उनके क्षय का प्रयास करना चाहिए।

दुख दूर करने के बजाय उनके कारणों को समझना जरूरी

प्रवचन में मैना सुंदरी का उदाहरण देते हुए गुरुदेव ने बताया कि वह कर्म सिद्धांत को भली-भांति समझती थी। उसे ज्ञात था कि शारीरिक, पारिवारिक, आर्थिक और मानसिक दुख पाप कर्मों के उदय से आते हैं। इसलिए केवल दुख दूर करने की इच्छा रखने के बजाय दुखों के कारणों को समाप्त करने के लिए धर्म की आराधना करनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि कई लोग गुरु भगवंतों के पास जाकर ऐसा मंत्र या उपाय पूछते हैं, जिससे उनके सभी दुख दूर हो जाएं। लेकिन जीवन के दुखों को समाप्त करने के लिए केवल किसी चमत्कारी उपाय की अपेक्षा करना उचित नहीं है। वास्तविक मार्ग सम्यक बोध, समभाव, संयम और कर्म निर्जरा की साधना है। जब आठों कर्म समाप्त हो जाते हैं, तभी आत्मा मोक्ष प्राप्त करती है।

राजा श्रीपाल और मैना सुंदरी की कथा से समझाया कर्म सिद्धांत

गुरुदेव ने अपने प्रवचन में राजा श्रीपाल और राजकुमारी मैना सुंदरी की प्रेरक कथा के माध्यम से कर्म सिद्धांत को विस्तार से समझाया। उन्होंने बताया कि श्रीपाल कुष्ठ रोग से पीड़ित थे। उनका शरीर रोग से प्रभावित था और वे उज्जैनी नगरी के बाहर अपने 700 कुष्ठ रोगी साथियों के साथ रहते थे। उन सभी ने श्रीपाल को अपना राजा बनाया था। रोग के कारण उन्हें नगर में प्रवेश की अनुमति नहीं थी और वे अनेक कठिनाइयों का सामना कर रहे थे।

इसी बीच राजा सिंहरथ की दोनों पुत्रियां सुरसुंदरी और मैना सुंदरी 64 कलाओं का अध्ययन पूरा कर राजमहल लौटीं। मैना सुंदरी धर्म और कर्म सिद्धांत का विशेष ज्ञान रखती थी। उसे बचपन से ही धार्मिक संस्कार प्राप्त हुए थे और उसका धर्म पर अटूट विश्वास था।

राजा ने दोनों पुत्रियों की विद्वत्ता परखने के लिए राजसभा में परीक्षा आयोजित की। इस अवसर पर अनेक राजकुमारों और प्रजा को भी आमंत्रित किया गया। राजा की इच्छा थी कि प्रजा उनकी पुत्रियों के ज्ञान से परिचित हो तथा योग्य राजकुमारों के साथ उनके विवाह संबंध भी तय हो सकें।

राजा ने सुरसुंदरी से पूछा कि मनुष्य को सुखी-दुखी कौन करता है? सुरसुंदरी ने उत्तर दिया कि पिता। इसके बाद उसने स्वयं को बापकर्मी बताया। पुण्य से प्राप्त होने वाले फलों के बारे में पूछने पर उसने धन, यौवन, बुद्धिमत्ता और मनपसंद पति की प्राप्ति जैसे उत्तर दिए। उसके उत्तरों से प्रसन्न होकर राजा ने उसका विवाह उसकी पसंद के राजकुमार से कर दिया।

इसके बाद राजा ने मैना सुंदरी से भी वही प्रश्न पूछे। पुण्य से क्या प्राप्त होता है, इस प्रश्न पर मैना ने विनय, विवेक, चित्त की प्रसन्नता, शीलयुक्त जीवन और मोक्ष मार्ग की प्राप्ति को पुण्य का फल बताया।

जब राजा ने पूछा कि वह आपकर्मी है या बापकर्मी, तब मैना सुंदरी ने स्पष्ट उत्तर दिया कि वह आपकर्मी है। उसके अनुसार प्रत्येक जीव अपने कर्मों के उदय से सुख-दुख प्राप्त करता है। पिता केवल निमित्त होते हैं, किसी के सुख-दुख के वास्तविक कर्ता नहीं।

मैना सुंदरी के इस उत्तर से राजा सिंहरथ अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्हें लगा कि पुत्री ने सबके सामने उनकी बात का विरोध कर उनका अपमान किया है। मंत्रियों ने राजा के मन में उठ रहे क्रोध को समझा और उन्हें वन भ्रमण के बहाने राजसभा से बाहर ले गए। लेकिन राजा के मन में मैना सुंदरी के उत्तर को लेकर आक्रोश बना रहा।

क्रोध में राजा ने मैना सुंदरी का विवाह श्रीपाल से तय किया

वन भ्रमण के दौरान राजा और मंत्री नगर के बाहर पहुंचे, जहां कुष्ठ रोगियों का समूह रहता था। वहां श्रीपाल ने राजा का स्वागत किया और अपनी स्थिति बताते हुए नगर में प्रवेश की पाबंदी तथा जीवन की कठिनाइयों से मुक्ति दिलाने की अपील की।

राजा ने श्रीपाल को अगले दिन राजसभा में आने का आश्वासन दिया। श्रीपाल ने अपनी बीमारी के कारण दूसरों को संक्रमण होने की आशंका जताते हुए संकोच प्रकट किया, लेकिन राजा ने उसे आने के लिए कहा।

अगले दिन श्रीपाल अपने एक साथी के साथ राजभवन पहुंचे। वह अन्य लोगों से दूरी बनाकर खड़ा रहा, क्योंकि उसे चिंता थी कि उसकी वजह से किसी दूसरे को परेशानी न हो।

राजा ने मैना सुंदरी को फिर राजसभा में बुलाया और पूछा कि वह आपकर्मी है या बापकर्मी। मैना सुंदरी ने एक बार फिर दृढ़ता से उत्तर दिया कि वह आपकर्मी है और उसके सुख-दुख उसके अपने कर्मों के उदय से हैं।

राजा ने अपने क्रोध में तत्काल दो वरमालाएं मंगवाईं। एक वरमाला श्रीपाल को दी और दूसरी मैना सुंदरी को। उन्होंने दोनों का विवाह कराने का निर्णय सुना दिया। सभा में उपस्थित लोग राजा के इस फैसले से स्तब्ध रह गए, लेकिन किसी ने विरोध नहीं किया।

मैना सुंदरी ने इस निर्णय को अपने कर्मों के उदय और उन्हें खपाने का अवसर मानकर स्वीकार कर लिया। उसने श्रीपाल के गले में वरमाला डाल दी। दूसरी ओर श्रीपाल को चिंता थी कि उसके कारण राजकुमारी को कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। उसने मैना सुंदरी से कहा कि वह चाहे तो राजमहल में रुक सकती है और उसके साथ आने की आवश्यकता नहीं है।

लेकिन मैना सुंदरी ने अपने निर्णय पर अडिग रहते हुए कहा कि उसने मन से श्रीपाल को अपना पति स्वीकार कर लिया है और अब वह उनके साथ ही जाएगी।

विपरीत परिस्थितियों में भी मैना सुंदरी ने नहीं छोड़ा धर्म का मार्ग

गुरुदेव ने बताया कि जब श्रीपाल मैना सुंदरी को लेकर नगर के बाहर अपने साथियों के पास पहुंचे, तो सभी लोग प्रसन्न हुए कि उनके बीच एक महारानी आई हैं। श्रीपाल ने मैना सुंदरी के रहने की अलग व्यवस्था की, ताकि उनकी बीमारी के कारण उसे किसी प्रकार की परेशानी न हो।

यह प्रसंग बताता है कि स्वयं दुखों से घिरा व्यक्ति भी दूसरों के हित की चिंता कर सकता है। श्रीपाल की संवेदनशीलता और मैना सुंदरी की धर्म के प्रति दृढ़ता दोनों ही प्रेरणादायक हैं।

उधर, मैना सुंदरी के साथ हुए व्यवहार की जानकारी मिलने पर उसकी माता को गहरा आघात लगा। राजा के निर्णय से दुखी होकर वह अपने पीहर चली गईं। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि राजा ने अपनी ही पुत्री के साथ इतना कठोर व्यवहार क्यों किया।

गुरुदेव ने इस कथा के माध्यम से समझाया कि कर्मों का उदय होने पर सांसारिक संबंध भी व्यक्ति को हर परिस्थिति से नहीं बचा सकते। इसलिए मनुष्य को सुख-दुख में समभाव रखना चाहिए और विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म, संयम तथा आत्मविश्वास का साथ नहीं छोड़ना चाहिए।

प्रवचन के अंत में यह संदेश उभरकर आया कि जीवन में आने वाले दुखों से घबराने के बजाय उनके कारणों को समझना चाहिए। राग-द्वेष, मोह और आसक्ति से दूर रहकर सम्यक बोध, तप, त्याग और आराधना के मार्ग पर चलना ही कर्म निर्जरा तथा मोक्ष प्राप्ति का वास्तविक मार्ग है।

कथा आगे जारी रहेगी: मैना सुंदरी की माता श्रीपाल की माता से कैसे मिलीं और श्रीपाल तथा मैना सुंदरी ने किस प्रकार तप-आराधना के माध्यम से अपने जीवन को नई दिशा दी, इसका वर्णन प्रवचन के अगले भाग में किया जाएगा।

Dr.Talera's Multi-speciality Dental Clinic, Thandla 


एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

". "div"