शांति आत्मा का मूल स्वभाव है, लेकिन क्रोध और कषायों के संपर्क में आकर व्यक्ति अपनी शांति खो देता है।

अधर्म में जीने वाला नुकसान और धर्म में जीने वाला फायदे में रहता है : श्रमण संघीय प्रवर्तक पूज्य श्री प्रकाश मुनिजी म.सा.

क्रोध और कषायों पर नियंत्रण ही धर्म, स्वभाव में जीना ही सच्ची धर्म साधना : प्रवर्तकश्री

रतलाम, 19 अक्टूबर(सम्यक दृष्टि, प्रकाश मूणत) मालव केसरी पूज्य गुरुदेव श्री सौभाग्यमलजी म.सा. के सुशिष्य, रत्नपुरी के रत्न एवं श्रमण संघीय प्रवर्तक पूज्य श्री प्रकाश मुनिजी म.सा. निर्भय ने धर्मसभा में धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझाते हुए कहा कि धर्म प्रत्येक व्यक्ति के भीतर विद्यमान है। आवश्यकता केवल उसे देखने, समझने और जीवन में धारण करने की दृष्टि विकसित करने की है। धर्म कोई देने या लेने की वस्तु नहीं है, बल्कि उसे अपने आचरण में उतारने वाला व्यक्ति ही सच्चा धर्मी कहलाता है। संसार में अधर्म के मार्ग पर चलने वाला हमेशा नुकसान में रहता है, जबकि धर्म के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति लाभ में रहता है। धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने स्वभाव को पहचानकर जीवन में शांति, संयम और सदाचार अपनाना ही धर्म का वास्तविक स्वरूप है।

मोहन टॉकीज स्थित श्री सौभाग्य प्रकाश दरबार में सोमवार को आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए प्रवर्तकश्री ने कहा कि आत्मा का मूल स्वभाव शांति है। क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषाय आत्मा के स्वभाव नहीं, बल्कि ऐसी वृत्तियां हैं, जो व्यक्ति को उसके वास्तविक स्वरूप से दूर ले जाती हैं। क्रोध का उत्पन्न होना स्वाभाविक परिस्थिति हो सकती है, लेकिन उस पर नियंत्रण रखना धर्म है। जो व्यक्ति अपने क्रोध सहित सभी कषायों को नियंत्रित कर लेता है, वही वास्तविक अर्थों में धर्मी बनता है।

उन्होंने कहा कि जहां आत्मा है, वहीं धर्म का वास है। शरीर के साथ जुड़ी इंद्रियां और मन व्यक्ति को धर्म के मार्ग पर भी ले जा सकते हैं और अधर्म की ओर भी प्रेरित कर सकते हैं। इसलिए मनुष्य को अपने विचारों, व्यवहार और प्रवृत्तियों के प्रति हमेशा सजग रहना चाहिए। यदि व्यक्ति अधर्म से बचने के प्रति जागरूक रहता है, तो वह आत्मकल्याण के मार्ग से कभी विचलित नहीं होता।

परभाव में जीना कषाय, स्वभाव में जीना धर्म

प्रवर्तकश्री ने कहा कि परभाव में जीने का अर्थ है अपने वास्तविक स्वभाव को छोड़कर कषायों में उलझे रहना, जबकि स्वभाव में जीना ही धर्म में जीना है। जिस प्रकार गुण और गुणी का संबंध एक-दूसरे से जुड़ा रहता है, उसी प्रकार धर्म और धर्मी का भी अभिन्न संबंध है। परमात्मा ने आत्मा के जिस स्वभाव का बोध कराया है, वह राग-द्वेष और क्रोध में उलझना नहीं, बल्कि शांत और समभाव में रहना है।

इस बात को समझाते हुए उन्होंने पानी का उदाहरण दिया। पानी का स्वभाव शीतलता है, लेकिन आग के संपर्क में आने पर वह गर्म हो जाता है। आग से हटाते ही वह पुनः ठंडा होने लगता है। इसी प्रकार शांति आत्मा का मूल स्वभाव है, लेकिन क्रोध और कषायों के संपर्क में आकर व्यक्ति अपनी शांति खो देता है। इसलिए जीवन में परिस्थितियां कैसी भी हों, व्यक्ति को अपने भीतर की शीतलता और शांति बनाए रखनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि क्रोध कभी कल्याणकारी नहीं होता। क्रोध में लिया गया निर्णय और क्रोध में कही गई बात अक्सर दुख का कारण बनती है। इसके विपरीत शांति, संयम और समभाव व्यक्ति के जीवन को सुखमय बनाते हैं। आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति अपने भीतर झांककर स्वयं की कमियों को पहचाने और उन्हें दूर करने का निरंतर प्रयास करे।

तपस्वियों ने लिए प्रत्याख्यान, धर्मसभा में उमड़े गुरुभक्त

धर्मसभा का शुभारंभ प्रवचन प्रभाविका श्री सुमनप्रभाजी म.सा. के संबोधन से हुआ। इसके पश्चात प्रवर्तकश्री के सान्निध्य में विभिन्न तपस्वियों ने अपने-अपने तप के प्रत्याख्यान ग्रहण किए। कार्यक्रम का संचालन श्री रखब चत्तर ने किया।

इस अवसर पर सेवाभावी श्री दर्शनमुनिजी म.सा., प्रवचन प्रभाविका श्री सुमनप्रभाजी म.सा. ठाणा-8, महासती श्री चंदनबालाजी म.सा. एवं महासती श्री कल्पनाजी म.सा. मंचासीन रहे। धर्मसभा में प्रदेश सहित देश के विभिन्न स्थानों से आए गुरुभक्तों ने संतों के दर्शन-वंदन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।

कार्यक्रम में श्री धर्मदास जैन श्री संघ, श्री धर्मदास जैन मित्र मंडल ट्रस्ट, श्री सौभाग्य तीर्थ ट्रस्ट, श्री सौभाग्य जैन नवयुवक मंडल, श्री सौभाग्य प्रकाश युवक मंडल, श्री सौभाग्य जैन महिला मंडल, श्री सौभाग्य अणु बहु मंडल तथा श्री सौभाग्य प्रकाश बालक-बालिका मंडल के सदस्यगण उपस्थित रहे।

प्रवर्तकश्री का संदेश यही है कि धर्म का वास्तविक लाभ तभी मिलता है, जब व्यक्ति क्रोध और कषायों को त्यागकर अपने आत्मिक स्वभाव में स्थित हो तथा जीवन में शांति, संयम और समभाव को अपनाए।

Dr.Talera's Multi-speciality Dental Clinic, Thandla 


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