सुख की निरंतर कामना ही अनेक बार दुख का कारण बनती है

सुख की कामना ही दुख का कारण, संतोष और समता से मिलती है शांति

नागपुर (सम्यक दृष्टि न्यूज़) धर्मदास संप्रदाय सुमेरु परम पूज्य गुरुदेव श्री गुलाब मुनि जी म.सा. ने प्रवचन में कहा कि भगवान महावीर ने अपने अनुभव से जीव के कल्याण और मोक्ष का मार्ग बताया है। सुख की निरंतर कामना ही अनेक बार दुख का कारण बनती है। अनंत काल से जीव जन्म-मरण के चक्र में भटक रहा है, फिर भी वास्तविक सुख प्राप्त नहीं कर पा रहा है। इसका मुख्य कारण इच्छाओं और कर्मों का निरंतर बंधन है।

उन्होंने कहा कि जीव सुखी होने के लिए निरंतर प्रयत्न करता है, लेकिन कई बार इन्हीं प्रयत्नों में नए पाप कर्म बांध लेता है। इसके बाद उन कर्मों के फलस्वरूप जीवन में आर्थिक, शारीरिक और मानसिक परेशानियां आती हैं। ऐसी परिस्थितियों में जीव को रोने या शिकायत करने के बजाय उन्हें समता और धैर्य के साथ सहन करना चाहिए। रोने से शांति नहीं आती, सहन करने से शांति आती है।

गुरुदेव ने कहा कि शांति भंग होने के प्रमुख कारणों में अप्राप्त वस्तु को प्राप्त करने की इच्छा, अपनी प्राप्त वस्तुओं की दूसरों से तुलना करना तथा दूसरे को अधिक प्राप्त हुआ देखकर ईर्ष्या करना शामिल है। “उसके पास यह क्यों है, मेरे पास क्यों नहीं?” जैसे विचार मन का संतुलन बिगाड़ देते हैं।

उन्होंने कहा कि ईर्ष्या से सामने वाले का कुछ नहीं बिगड़ता, बल्कि व्यक्ति स्वयं ही भीतर से अशांत होता है। व्यापार, तरक्की, परिवार और सामाजिक जीवन सहित अनेक क्षेत्रों में तुलना और ईर्ष्या देखने को मिलती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि परीक्षा में किसी दूसरे विद्यार्थी को अधिक अंक मिलने पर “उसे ज्यादा क्यों मिले” जैसी भावना भी ईर्ष्या का ही रूप है।

“दूरबीन नहीं, दर्पण बनो” का संदेश देते हुए श्री गुलाब मुनि जी ने कहा कि व्यक्ति को दूसरों में कमियां और उपलब्धियां देखने के बजाय अपने भीतर झांकना चाहिए। कर्म सिद्धांत के अनुसार जीव को अपने पूर्वकृत कर्मों का फल प्राप्त होता है। इसलिए दूसरों की उपलब्धि से ईर्ष्या करने के बजाय प्रमोद भावना रखनी चाहिए और उनकी सफलता में प्रसन्न होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जीवन में संगति का भी विशेष महत्व है। धर्म को समझने वाला मित्र व्यक्ति को गलत मार्ग पर जाने से रोक सकता है। जीवन में जितना और जो कुछ प्राप्त हुआ है, उसमें संतोष रखना आवश्यक है। “संतोषी सदा सुखी” की भावना को जीवन में उतारने की आवश्यकता है।

गुरुदेव ने कहा कि मनुष्य की विडंबना है कि संसार के धन और सुख-सुविधाओं में उसे कभी संतोष नहीं होता, लेकिन धर्म आराधना में थोड़ी-सी साधना करके ही वह संतुष्ट हो जाता है। उन्होंने कहा कि व्यापार वर्षों में उन्नति करने के बाद भी मनुष्य अधिक की इच्छा करता रहता है, जबकि वर्षों से की जा रही सीमित धार्मिक आराधना से वह संतुष्ट हो जाता है। संसार में संतोष और धर्म में निरंतर प्रगति की भावना आवश्यक है।

प्रवचन के दौरान धन्ना जी और शालीभद्र जी के जीवन प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि किस प्रकार एक छोटा-सा निमित्त भी जीवन की दिशा बदल सकता है। शालीभद्र जी के संसार त्याग की बात सुनकर धन्ना जी के मन में भी वैराग्य का भाव जागा और उन्होंने अपनी आठों पत्नियों का त्याग कर संयम मार्ग स्वीकार किया। बाद में धन्ना जी और शालीभद्र जी ने साथ में भगवान के समक्ष दीक्षा ग्रहण की।

शालीभद्र जी के पूर्व भव के सुपात्र दान का प्रसंग बताते हुए गुरुदेव ने कहा कि सीमित साधनों के बावजूद श्रद्धा और निःस्वार्थ भाव से मुनिराज को खीर का आहार कराने का पुण्य उन्हें अगले भव में प्राप्त हुआ। उन्हें अपार सुख-सुविधाएं मिलीं, लेकिन उनमें आसक्ति नहीं हुई। वैराग्य का निमित्त मिलते ही उन्होंने सांसारिक सुख-सुविधाओं का त्याग कर संयम मार्ग अपना लिया।

गुरुदेव ने कहा कि निमित्त छोटा हो सकता है, लेकिन यदि भीतर जागृति हो तो वही निमित्त पूरे जीवन को बदल सकता है। हमारे जीवन में भी अनेक धार्मिक और आध्यात्मिक निमित्त आते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हम उनसे प्रेरणा लेकर अपने जीवन में परिवर्तन लाएं।

उन्होंने कहा कि पावन पर्व तन, मन और वचन को पवित्र बनाने का अवसर है। धन्ना जी और शालीभद्र जी के जीवन से प्रेरणा लेकर प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन को धर्म, संयम, संतोष और आत्मकल्याण की दिशा में ले जाने का प्रयास करना चाहिए।

प्रवचन के अंत में उन्होंने सभी से ईर्ष्या के स्थान पर प्रमोद भावना, असंतोष के स्थान पर संतोष और शिकायत के स्थान पर समता अपनाने का आह्वान किया।

Dr.Talera's Multi-speciality Dental Clinic, Thandla 



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