अनावश्यक सुनना, बोलना और देखना भी कर्म बंधन का कारण है : परम् पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा.
नागपुर, 14 अक्टूबर। धर्मदास संप्रदाय सुमेरु परम पूज्य गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने अपने प्रवचन में जीवन के वास्तविक उद्देश्य, कर्म सिद्धांत, अनावश्यक बोलने-सुनने की प्रवृत्ति, इंद्रियों के सदुपयोग तथा खानपान में संयम के महत्व को विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि भगवान महावीर ने अपने अनुभव के आधार पर जीव के कल्याण और मोक्ष प्राप्ति का मार्ग बताया है। संसार में जीव अनंत काल से दुखों का अनुभव करता आ रहा है। सम्यक बोध के अभाव में उसे शांति और समाधि प्राप्त नहीं हो पाती। जब जीव को सही समझ आ जाती है, तब वह परिस्थितियों को समभाव से स्वीकार करना सीखता है और उसके जीवन में वास्तविक शांति का मार्ग प्रशस्त होता है।
गुरुदेव ने कहा कि संसार में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है, जिसके जीवन में कभी दुख नहीं आया हो या भविष्य में दुख की परिस्थिति नहीं आएगी। भक्त हो या भगवान, अमीर हो या गरीब, मालिक हो या नौकर, प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में सुख-दुख की परिस्थितियां आती रहती हैं। इसलिए जब भी जीवन में कोई विपरीत परिस्थिति आए, तब एक सूत्र सदैव याद रखना चाहिए कि 'यह मेरे कर्मों का उदय है।' इस भावना को स्वीकार करने से व्यक्ति दूसरों के प्रति दोषारोपण करने से बचता है और नए कर्म बंधन से बचने का प्रयास करता है।
उन्होंने कहा कि जब पुण्य का उदय होता है, तब कोई व्यक्ति आपका अहित नहीं कर सकता और जब पाप कर्म का उदय होता है, तब कोई दूसरा व्यक्ति आपको उस परिस्थिति से बचा नहीं सकता। जीव स्वयं अपने कर्मों का कर्ता भी है और भोक्ता भी। जब तक वह अपने जीवन में आने वाली परिस्थितियों को स्वीकार नहीं करता, तब तक जन्म-मरण के चक्र में भटकता रहता है। सम्यक दृष्टि यही है कि व्यक्ति परिस्थितियों को समझे, उनसे सीखे और अपने आचरण को बेहतर बनाने का प्रयास करे।
अनावश्यक सुनने और बोलने से अशांत होता है मन
गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि जीवन में अनेक ऐसी बातें होती हैं, जिन्हें सुनने और सुनाने से कोई लाभ नहीं होता। बुराई करना, चुगली करना, आरोप लगाना और ताने देना अनावश्यक बातों की श्रेणी में आते हैं। व्यक्ति जब ऐसी बातों को सुनता है और उन्हें मन में बार-बार दोहराता है, तब वह स्वयं ही अपनी शांति खो बैठता है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जब कोई कुत्ता भौंकता है, तब हम यह सोचकर परेशान नहीं होते कि वह ऐसा क्यों कर रहा है। हम जानते हैं कि भौंकना उसका स्वभाव है। लेकिन जब कोई व्यक्ति हमारे बारे में कुछ कह देता है, तो हम उसी बात को पकड़कर बैठ जाते हैं। बार-बार सोचते हैं कि उसने ऐसा क्यों कहा, मेरे साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया। इस प्रकार हम दूसरों के शब्दों को अपने मन पर हावी कर लेते हैं और स्वयं अशांत हो जाते हैं।
गुरुदेव ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति तप, त्याग और ज्ञान की बड़ी आराधना नहीं कर सकता, तो कम से कम अनावश्यक बोलने से बचने की साधना तो कर ही सकता है। यह भी आत्मकल्याण का एक महत्वपूर्ण मार्ग है। मनुष्य के पास बंगला, गाड़ी और सभी सुख-सुविधाएं होने के बावजूद यदि मन में शांति नहीं है, तो इन सुविधाओं का वास्तविक सुख अनुभव नहीं हो सकता।
उन्होंने कहा कि जब किसी की बुराई की चर्चा चलती है, तब लोग घंटों तक उसे सुनने में रुचि लेते हैं। एक के बाद दूसरी बात सुनने की उत्सुकता बनी रहती है। इसके विपरीत जब स्वाध्याय और धर्म की बात होती है, तब नींद आने लगती है और मन नहीं लगता। व्यक्ति को इस प्रवृत्ति पर विचार करना चाहिए। जिस समय का उपयोग आत्मचिंतन और धर्म आराधना में होना चाहिए, वह समय दूसरों की बुराई सुनने-सुनाने में व्यर्थ चला जाता है।
राजा कुमारपाल ने समझा संसार की अस्थिरता का सत्य
गुरुदेव ने राजा कुमारपाल और आचार्य श्री हेमचंद्र सूरीश्वरजी से संबंधित प्रसंग सुनाते हुए कहा कि राजा कुमारपाल धार्मिक संस्कारों से युक्त थे और अपने गुरु के निर्देशों का पालन करते थे। पाटन में कुबेरदत्त नाम के एक सेठ रहते थे। उनके पास करोड़ों की संपत्ति, विशाल हवेली, हाथी, घोड़े और अनेक प्रकार के वैभव थे। लेकिन उनके कोई संतान नहीं थी और उनका आयुष्य पूर्ण हो गया।
सेठ के निधन के बाद हवेली में उनकी पत्नी और परिवार के कुछ सदस्य रह गए। उस समय ऐसी व्यवस्था थी कि जिस परिवार में संपत्ति की देखभाल करने वाला कोई नहीं होता था, उसकी संपत्ति राजकोष में ले ली जाती थी। यह जानकारी मिलने पर कुछ लोग राजा के पास पहुंचे और उन्हें सेठ की संपत्ति तथा परिवार की स्थिति के बारे में बताया।
राजा ने पूरी बात सुनी और मंत्रीगण के साथ सेठ की हवेली की ओर प्रस्थान किया। वहां पहुंचने से पहले ही उन्हें दूर से सैकड़ों ध्वजाएं दिखाई दीं। ध्वजाओं को हवा के साथ दिशा बदलते देखकर राजा के मन में विचार आया कि जिस प्रकार हवा के रुख के साथ ध्वजाएं बदलती हैं, उसी प्रकार संसार में मनुष्य की परिस्थितियां भी बदलती रहती हैं। संसार का वैभव स्थायी नहीं है।
हवेली पहुंचने पर राजा ने सेठानी को चिंतित देखा। उन्हें आशंका थी कि अब उनकी सारी संपत्ति उनसे छिन जाएगी। राजा ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा कि चिंता मत करो, यह सब तुम्हारा ही है। मैंने तुम्हें अपनी बहन माना है। जब भी कोई आवश्यकता हो, मुझे बताना। राजा ने सेठानी को भरोसा दिलाया कि उनके साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा।
हवेली में बंधे हाथियों और घोड़ों को देखकर राजा ने उनके कानों की ओर ध्यान दिया, जो लगातार हिल रहे थे। इस दृश्य से उन्हें जीवन की अस्थिरता का बोध हुआ। उन्होंने अनुभव किया कि मनुष्य का जीवन भी क्षणभंगुर है और संसार का वैभव सदैव रहने वाला नहीं है।
इस प्रसंग के माध्यम से गुरुदेव ने समझाया कि धर्म की रक्षा करने वाले की धर्म रक्षा करता है। जिस व्यक्ति की वाणी, विचार और व्यवहार में धर्म होता है, वह दूसरों के प्रति अन्याय करने से बचता है। पूर्व में किए गए धर्म संस्कार भी वर्तमान जीवन में धर्म के प्रति रुचि और सद्बुद्धि का आधार बनते हैं।
संसार में सब कुछ छोड़कर जाना है
गुरुदेव ने कहा कि मनुष्य जीवनभर धन-संपत्ति, मकान, वाहन और अन्य साधनों को एकत्रित करने में लगा रहता है। वह इनके लिए अनेक प्रकार के प्रयास करता है, लेकिन आज तक ऐसी कोई व्यवस्था नहीं बनी कि मनुष्य अपनी सांसारिक संपत्ति को अपने साथ लेकर जा सके। मृत्यु के बाद सब कुछ यहीं छूट जाता है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को इस सत्य को समझते हुए अपने जीवन में धर्म, संयम और सदाचार को महत्व देना चाहिए। धन और वैभव का उपयोग अच्छे कार्यों में होना चाहिए, न कि अहंकार और अनावश्यक इच्छाओं की पूर्ति में।
इस भाव को व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा—
अर्थात मनुष्य संसार में अकेला आता है और यहां से जाते समय सांसारिक वस्तुएं तथा संबंध भी साथ नहीं ले जा सकता। इसलिए जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल संग्रह करना नहीं, बल्कि आत्मकल्याण के लिए प्रयास करना होना चाहिए।
इंद्रियों का दुरुपयोग भी बांधता है कर्म
गुरुदेव ने कहा कि मनुष्य को जो शरीर और इंद्रियां मिली हैं, उनका उपयोग सत्कर्म और धर्म आराधना के लिए करना चाहिए। आंखें गुरु दर्शन और सद्-दर्शन के लिए मिली हैं, कान जिनवाणी सुनने के लिए मिले हैं तथा वाणी का उपयोग सत्य, मधुर और हितकारी बोलने के लिए करना चाहिए। लेकिन जब इन साधनों का उपयोग दूसरों की बुराई देखने-सुनने और अनावश्यक बातें बोलने में किया जाता है, तब व्यक्ति अपने जीवन की अमूल्य शक्ति व्यर्थ गंवाता है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि हम अपनी गाड़ी किसी को आवश्यकता पड़ने पर देते हैं और वह व्यक्ति उसे खराब करके लौटा देता है, तो अगली बार गाड़ी देने से पहले हम विचार करेंगे। फिर कर्म सत्ता से मिले इस शरीर का उपयोग करते समय हम सावधानी क्यों नहीं रखते?
यह शरीर सत्कर्म करने के लिए मिला है। हमें विचार करना चाहिए कि हमारी आंखें क्या देख रही हैं, हमारे कान क्या सुन रहे हैं और हमारी वाणी से कैसे शब्द निकल रहे हैं। इन सभी का प्रभाव हमारे मन और आचरण पर पड़ता है।
गुरुदेव ने कहा कि अनावश्यक देखना भी मन को विचलित करता है। बाजार में दुकानदार अपने सामान की बिक्री के लिए आकर्षक प्रदर्शन करते हैं। जब हम बिना आवश्यकता के उन वस्तुओं को देखते हैं, तो कई बार अनावश्यक खरीदारी करने लगते हैं। धीरे-धीरे घर में इतना सामान जमा हो जाता है कि उसकी वास्तविक आवश्यकता ही नहीं रहती। इसलिए इच्छाओं पर नियंत्रण रखना और आवश्यकता के अनुसार वस्तुओं का उपयोग करना भी संयम का हिस्सा है।
ताने सुनकर बार-बार विचार करना बढ़ाता है अशांति
गुरुदेव ने पारिवारिक जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि सास किसी गलती पर बहू को कुछ कह देती है, तो बहू को उस बात को बार-बार मन में दोहराने से बचना चाहिए। लेकिन कई बार वह पूरे दिन उसी बात के बारे में सोचती रहती है कि मुझे ऐसा क्यों कहा गया। शाम को पति के घर आने पर भी वही बात दोहराई जाती है। इस प्रकार एक छोटी-सी बात धीरे-धीरे बड़े विवाद का कारण बन जाती है।
उन्होंने समझाया कि यदि व्यक्ति प्रत्येक बात को पकड़कर बैठ जाए, तो उसका जीवन अशांत हो जाता है। अनावश्यक बातों को बार-बार याद करना ऐसा है, जैसे व्यक्ति स्वयं ही अपने मन में उन बातों को दोहराता रहे। इससे न समस्या का समाधान होता है और न मन को शांति मिलती है।
गुरुदेव ने कहा कि जीवन में कई बार ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, जहां व्यक्ति को अपमानजनक बातें सुनकर भी अपना कार्य करना पड़ता है। इसे कर्मों के उदय के सिद्धांत से समझना चाहिए। हमें दूसरों के व्यवहार के कारण अपने विवेक और शांति को नहीं खोना चाहिए, बल्कि धैर्य और संयम के साथ परिस्थितियों का सामना करना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि इच्छाओं की अनियंत्रित पूर्ति के कारण व्यक्ति गलत रास्ते पर जा सकता है। परिवार की आवश्यकताओं और इच्छाओं में अंतर समझना जरूरी है। रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मूलभूत जरूरतों के साथ जीवन में धर्म, संतोष और संयम को भी स्थान देना चाहिए।
कर्म सत्ता की दृष्टि से कोई क्रिया छिपी नहीं
गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि मनुष्य को सदैव अपने आचरण के प्रति सावधान रहना चाहिए। मन, वचन और काया से की गई प्रत्येक क्रिया का अपना महत्व है। व्यक्ति जो सोचता है, बोलता है और करता है, उसका प्रभाव उसके जीवन पर पड़ता है।
उन्होंने कर्म सत्ता का उदाहरण देते हुए कहा कि मानो एक कैमरा हर समय हमारे कार्यों पर नजर रख रहा हो। इसलिए हमें अपने व्यवहार में सजगता रखनी चाहिए। किसी दूसरे की गलती देखकर उसका उपहास करने या उसे दोष देने के बजाय स्वयं अपने आचरण को सुधारने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने समझाया कि दूसरों की कमियों पर ध्यान देने से पहले व्यक्ति को अपने भीतर झांकना चाहिए। आज यदि हम किसी के प्रति गलत व्यवहार करते हैं, तो भविष्य में हमें भी वैसी ही परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए अनावश्यक बोलने, दूसरों की निंदा करने और इंद्रियों का दुरुपयोग करने से बचना चाहिए।
भोजन में भी संयम और विवेक जरूरी
प्रवचन में गुरुदेव ने खानपान की आदतों पर भी विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भोजन केवल स्वाद के लिए नहीं, बल्कि शरीर को स्वस्थ रखने और धर्म आराधना करने योग्य बनाए रखने के लिए करना चाहिए। व्यक्ति को विचार करना चाहिए कि वह क्या खा रहा है, क्यों खा रहा है, कब खा रहा है, कहां खा रहा है और किस प्रकार खा रहा है।
उन्होंने कहा कि "हम जीने के लिए खा रहे हैं या खाने के लिए जी रहे हैं?" इस प्रश्न पर प्रत्येक व्यक्ति को विचार करना चाहिए। जीभ को हर समय कुछ नया और स्वादिष्ट खाने की इच्छा होती है, लेकिन स्वाद की इस इच्छा के कारण शरीर को परेशानी उठानी पड़ती है। इसलिए भोजन का चयन केवल जीभ की पसंद के आधार पर नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और आवश्यकता को ध्यान में रखकर करना चाहिए।
गुरुदेव ने कहा कि "दाल-रोटी सबसे मोटी, बाकी झंझट खोटी।" इसका आशय यह है कि सामान्य, सादा और शरीर के अनुकूल भोजन को महत्व देना चाहिए। अत्यधिक चटपटे और अनावश्यक खाद्य पदार्थों के प्रति आकर्षण से बचना चाहिए।
उन्होंने कहा कि कई बार लोग बफेट में आवश्यकता से अधिक भोजन ले लेते हैं। स्वाद के चक्कर में थाली में जरूरत से ज्यादा खाद्य पदार्थ भर लेते हैं और बाद में भोजन व्यर्थ चला जाता है। यह प्रवृत्ति संयम और संवेदनशीलता के विपरीत है। भोजन उतना ही लेना चाहिए, जितनी आवश्यकता हो।
भोजन का समय, तरीका और उद्देश्य समझें
गुरुदेव ने बताया कि भोजन करने का समय और तरीका भी महत्वपूर्ण है। व्यवस्थित ढंग से बैठकर भोजन करना चाहिए तथा बैठते समय रीढ़ की हड्डी सीधी रखने का प्रयास करना चाहिए। भोजन के दौरान शांति, मर्यादा और अनुशासन बनाए रखना चाहिए।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपनी दिनचर्या में संयम विकसित करना चाहिए। जिस प्रकार धर्म आराधना के लिए समय निर्धारित किया जाता है, उसी प्रकार भोजन और अन्य दैनिक कार्यों में भी अनुशासन होना चाहिए।
गुरुदेव ने उदाहरण दिया कि जब व्यक्ति सामायिक करता है, तो उसे लगता है कि अब धर्म आराधना का निर्धारित समय पूरा हो गया। लेकिन जब टीवी या मोबाइल देखने की बात आती है, तो वह एक घंटे बाद भी कहता है कि थोड़ा और देख लेते हैं। यह मन की चंचलता और विषयों के प्रति आसक्ति को दर्शाता है।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपने समय का सदुपयोग करना चाहिए। भोजन शरीर को साधना के योग्य बनाए रखने के लिए है, जबकि जीवन का व्यापक उद्देश्य आत्मकल्याण और कर्म निर्जरा होना चाहिए। इसलिए भोजन में स्वाद के साथ स्वास्थ्य, आवश्यकता और संयम का भी ध्यान रखना आवश्यक है।
यतना से बैठना, सुनना, देखना, बोलना और चलना सीखें
गुरुदेव ने प्रवचन के समापन भाव में कहा कि मनुष्य को जीवन की सामान्य क्रियाओं में भी सजगता और यतना रखनी चाहिए। बैठना, सुनना, देखना, बोलना और चलना जैसी सामान्य प्रतीत होने वाली क्रियाएं भी विवेकपूर्वक की जानी चाहिए। व्यक्ति को अनावश्यक बोलने, सुनने और देखने से बचते हुए अपनी इंद्रियों का सदुपयोग करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि शरीर और इंद्रियां हमें सत्कर्म करने के लिए मिली हैं। यदि हम इनका उपयोग धर्म आराधना, स्वाध्याय, गुरु दर्शन और आत्मचिंतन में करते हैं, तो हमारा जीवन सार्थक बन सकता है। इसके विपरीत यदि हम इन्हें निंदा, चुगली, अनावश्यक इच्छाओं और असंयमित खानपान में लगाते हैं, तो अशांति बढ़ती है।
गुरुदेव ने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि जीवन में सुख-शांति प्राप्त करने के लिए दूसरों को बदलने से पहले स्वयं को बदलना जरूरी है। दुख की परिस्थिति में कर्मों के उदय को स्वीकार करना, दूसरों की निंदा से बचना, वाणी पर संयम रखना, इंद्रियों का सदुपयोग करना और भोजन में विवेक बनाए रखना आत्मकल्याण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
सम्यक बोध, स्वाध्याय, संयम और सजग आचरण के माध्यम से ही जीव नए कर्म बंधन से बचने तथा मोक्ष मार्ग पर आगे बढ़ने का प्रयास कर सकता है। यही गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा. के प्रवचन का मूल संदेश रहा।




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