विपरीत परिस्थितियों में समता और संतोष रखें, सद् बुद्धि से प्रशस्त होगा मोक्ष का मार्ग : परम् पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा.
नागपुर, 15 अक्टूबर। धर्मदास संप्रदाय सुमेरु परम पूज्य गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने अपने प्रवचन में जीवन की विपरीत परिस्थितियों, कर्म सिद्धांत, अनावश्यक प्रवृत्तियों और आत्मकल्याण के मार्ग पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जिनेश्वर देव ने भव्य जीवों के कल्याण के लिए मोक्ष का मार्ग बताया है। भगवान महावीर ने अपने अनुभव के आधार पर समझाया कि सम्यक बोध के अभाव में जीव अनंत बार जन्म-मरण के चक्र में भटकता रहा है और अनेक प्रकार के कष्टों को भोगता आया है। जीवन में आने वाली परिस्थितियों को लेकर चिंतित होने के बजाय उनके परिणामों पर चिंतन करना चाहिए। परिणामों पर विचार करने से समस्या का समाधान खोजने में सहायता मिलती है। यदि परिस्थिति को बदलने का अवसर नहीं है, तो अपनी मनःस्थिति बदल लेनी चाहिए।
गुरुदेव ने कहा कि जीवन में कब और कैसी परिस्थिति सामने आ जाएगी, इसका किसी को पता नहीं होता। कई बार व्यक्ति के सामने ऐसी विपरीत परिस्थितियां खड़ी हो जाती हैं, जिनमें अनुकूलता का कोई अवसर दिखाई नहीं देता। ऐसे समय में व्यक्ति को स्वयं को एक मंत्र याद दिलाना चाहिए— "यह मेरे कर्मों का दोष है।" कोई व्यक्ति ताने मारे, अपमान करे अथवा बुराई करे, तो तत्काल प्रतिक्रिया देने के बजाय यह विचार करना चाहिए कि संभव है, पूर्व में स्वयं से भी ऐसी कोई भूल हुई हो, जिसके परिणामस्वरूप आज ऐसी परिस्थिति का सामना करना पड़ रहा है। इस प्रकार का स्वीकार भाव व्यक्ति को कर्मों के परिणाम भोगने में सरलता प्रदान करता है और नए कर्म बंधन से बचने का मार्ग प्रशस्त करता है।
जड़ता और वक्रता से बढ़ता है वैमनस्य
गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि पांचवें आरे के जीवों के दो प्रमुख लक्षण जड़ता और वक्रता हैं। जड़ता व्यक्ति को सही बात समझने नहीं देती, जबकि वक्रता उसे सत्य स्वीकार करने से रोकती है। इन दोनों प्रवृत्तियों के कारण संघ, समाज और परिवार में वैमनस्य बढ़ने लगता है तथा व्यक्ति अपने कल्याण के मार्ग से भटक जाता है।
जीव ने जीवन रूपी रंगमंच पर अनेक भूमिकाएं निभाई हैं। न जाने कितनी बार उसने स्वयं ही विपरीत परिस्थितियों का निर्माण किया होगा, लेकिन सम्यक बोध के अभाव में वह उनके कारणों को समझ नहीं पाता। अनावश्यक देखना, सुनना, बोलना और खान-पान में असंयम रखना भी अनेक समस्याओं को जन्म देता है। गुरुदेव ने कहा कि जब परिस्थितियों के निर्माण में हमारे अपने कर्म कारण बने हैं, तो उनके परिणाम भी हमें ही भोगने होंगे। शारीरिक, पारिवारिक, मानसिक अथवा आर्थिक परेशानी हो, उसे स्वीकार भाव से सहन करने का प्रयास करना चाहिए। यह दुखमा आरा है, इसलिए जीवन में प्रतिकूल परिस्थितियां आना स्वाभाविक है। उन्हें लेकर बार-बार व्याकुल होने के बजाय समता और संयम बनाए रखना चाहिए।
प्रतिक्रिया देने से पहले कुछ समय रुकना जरूरी
गुरुदेव ने समझाया कि जब कभी कोई विपरीत परिस्थिति खड़ी हो जाए, तो तुरंत जवाब नहीं देना चाहिए। कुछ समय रुककर, विचार करके अपनी प्रतिक्रिया देनी चाहिए। जल्दबाजी में दिया गया जवाब कई बार समस्या को और बढ़ा देता है तथा नए कर्म बंधन का कारण बन जाता है।
उन्होंने गुरु और शिष्य का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि एक बार गुरुजी अपने विनयवान और समर्पित शिष्य की परीक्षा लेना चाहते थे। दोपहर लगभग 12 बजे गुरुजी ने शिष्य से कहा कि अभी रात्रि है। शिष्य ने तत्काल प्रतिकार नहीं किया और गुरुजी की बात स्वीकार कर ली। कुछ समय बाद शिष्य ने विनम्रतापूर्वक पूछा कि भगवन, आपने यह बात किस अपेक्षा से कही थी? गुरुजी ने समझाया कि महाविदेह क्षेत्र में उस समय रात्रि थी।
इस प्रसंग के माध्यम से गुरुदेव ने बताया कि कई बार कहने वाले का आशय कुछ और होता है और सुनने वाला उसका अर्थ कुछ और निकाल लेता है। इसी गलतफहमी से विपरीत परिस्थितियां खड़ी हो जाती हैं। इसलिए किसी की बात सुनते ही प्रतिक्रिया देने के बजाय उसके आशय को समझने का प्रयास करना चाहिए।
दूसरों की आलोचना से विचलित हुए बिना करते रहें सत्कर्म
गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि जब कोई व्यक्ति अच्छा कार्य करता है, तो उसकी टांग खींचने वाले और बीच में बाधाएं उत्पन्न करने वाले भी मिल जाते हैं। कुछ लोग गलत बातें कहकर उसका मनोबल गिराने का प्रयास करते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति अच्छा कार्य करना छोड़ दे। उसे अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ रहकर कार्य करते रहना चाहिए। कई बार सफलता मिलने पर वही लोग साथ खड़े दिखाई देते हैं।
उन्होंने कहा कि हमें संसार के प्रत्येक व्यक्ति से प्रशंसा पाने की अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए। हमारा उद्देश्य जगत के लोगों से प्रमाणपत्र प्राप्त करना नहीं, बल्कि जगतपति के सामने अपने आचरण को सही रखना होना चाहिए। इसलिए दूसरों की आलोचना से विचलित हुए बिना अपने कर्तव्य और सत्कर्म के मार्ग पर आगे बढ़ते रहना चाहिए।
अनावश्यक सुनने और देखने से होते हैं अनर्थ
प्रवचन के दौरान गुरुदेव ने एक सटोरिये का प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि एक व्यक्ति प्रवचन में आया, जहां छह लेश्या और आठ कर्मों के सिद्धांत पर चर्चा हो रही थी। वहां मौजूद एक सटोरिये ने प्रवचन में बताए गए अंकों को लॉटरी अथवा सट्टे के नंबर समझ लिया। संयोग से उसका लगाया हुआ नंबर खुल गया और उसे धन प्राप्त हो गया। अगले दिन वह गुरुदेव के पास पहुंचा और कहने लगा कि आपने तो मेरा उद्धार कर दिया, आपके बताए अंक लगाने से मुझे लाभ हो गया।
इस प्रसंग के माध्यम से गुरुदेव ने समझाया कि व्यक्ति कई बार अपनी समझ के अनुसार बातों का गलत अर्थ निकाल लेता है। अनावश्यक सुनने और देखने की प्रवृत्ति उसे सही ज्ञान से दूर कर सकती है और अनर्थ का कारण बन सकती है।
उन्होंने कहा कि अनावश्यक खाने से बीमारियां उत्पन्न होती हैं और अनावश्यक बोलने से विवाद खड़े हो जाते हैं। व्यक्ति बिना सोचे-समझे कुछ कह देता है और बाद में उसी के परिणाम उसे भुगतने पड़ते हैं। ऐसी प्रवृत्तियां व्यक्ति को सत्कर्म से भी दूर कर देती हैं। इसलिए अपनी इंद्रियों पर संयम रखना और आवश्यकता के अनुसार ही व्यवहार करना जरूरी है।
अनावश्यक प्रवृत्तियों में समय गंवाने के बजाय धर्म आराधना करें
गुरुदेव ने कहा कि जीव आजीविका चलाने के लिए अनेक प्रकार की गतिविधियां करता है, लेकिन कई बार वह आवश्यकता से अधिक प्रवृत्तियों में उलझकर तनाव और परेशानी को आमंत्रित कर लेता है। यदि इसी समय का उपयोग धर्म आराधना, स्वाध्याय और सामायिक में किया जाए, तो जीवन अधिक शांतिपूर्ण बन सकता है।
उन्होंने एक सेवानिवृत्त व्यक्ति का उदाहरण देते हुए बताया कि उसके पास 50 लाख रुपये थे, जिनसे उसका जीवन आसानी से गुजर सकता था। लेकिन धन को दोगुना करने के लालच में उसने अपनी पूंजी ऐसी कंपनी में लगा दी, जो बाद में धोखाधड़ी करने वाली निकली। परिणामस्वरूप उसे अपनी पूरी रकम गंवानी पड़ी। गुरुदेव ने समझाया कि अधिक लाभ की अनावश्यक लालसा व्यक्ति को उपलब्ध साधनों से भी वंचित कर सकती है। इसलिए किसी भी निर्णय से पहले विवेक और संतोष को महत्व देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जीव खाली बैठकर भी अनावश्यक गतिविधियों में लगा रहता है। धार्मिक प्रवचन के दौरान भी कुछ लोग सामायिक के उपकरणों की चोटी बनाने, आसन के धागे निकालने या दूसरे प्रकार की व्यर्थ गतिविधियों में समय गंवाते हैं। कुछ लोग दूसरों के दुपट्टे बांधकर भी अनावश्यक प्रवृत्ति करते हैं। ऐसी गतिविधियां अनर्थदंड का कारण बन सकती हैं और बिना किसी आवश्यकता के कर्म बंधन बढ़ा सकती हैं।
गुरुदेव ने कहा कि समय मिला है, तो उसका उपयोग स्वाध्याय, सामायिक और आत्मचिंतन में करना चाहिए। जीवन में समय, शक्ति और संपत्ति का उपयोग विवेकपूर्वक करना ही समझदारी है।
गाड़ी के अनावश्यक उपयोग से भी हो सकती है जीव हिंसा
गुलाब मुनिजी म.सा. ने इंद्रिय संयम का उदाहरण देते हुए कहा कि जब व्यक्ति नई गाड़ी खरीदता है, तो कई बार केवल उसे चलाकर देखने या आनंद लेने के लिए अनावश्यक चक्कर लगाने निकल पड़ता है। ऐसे अनावश्यक आवागमन में मार्ग में रहने वाले छह काय के जीवों की हिंसा की संभावना रहती है। व्यक्ति को भले ही इससे आनंद मिले, लेकिन उसकी यह प्रवृत्ति कर्म बंधन का कारण बन सकती है।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपनी प्रत्येक गतिविधि के औचित्य पर विचार करना चाहिए। केवल मन की इच्छा पूरी करने के लिए कोई कार्य करना आवश्यक नहीं है। यदि किसी गतिविधि से कोई वास्तविक लाभ नहीं है, तो उससे बचना चाहिए। अनावश्यक प्रवृत्तियों को कम करने से व्यक्ति अपने समय और ऊर्जा का सदुपयोग कर सकता है तथा नए कर्म बंधन से बचने का प्रयास कर सकता है।
संबंधों में विश्वास और आध्यात्म में श्रद्धा का महत्व
गुरुदेव ने कहा कि जिस प्रकार गणित में एक का, भोजन में नमक का और मिठाई में शक्कर का विशेष महत्व है, उसी प्रकार संबंधों में विश्वास का महत्व है। विश्वास के बिना कोई भी संबंध अधिक समय तक टिक नहीं सकता। इसी प्रकार आध्यात्मिक जीवन में श्रद्धा का विशेष स्थान है। श्रद्धा के अभाव में आध्यात्मिक साधना का वास्तविक महत्व समझना कठिन हो जाता है।
उन्होंने कहा कि जीवन में सबसे महत्वपूर्ण सद्बुद्धि है। सद्बुद्धि से ही शांति और समाधि की प्राप्ति होती है तथा व्यक्ति कर्म बंधन से बचने का मार्ग समझ पाता है। यदि जीवन को निर्मल और उच्च बनाना है, तो अपनी गलतियों को स्वीकार करने की आदत विकसित करनी होगी। अपनी भूल स्वीकार करने से भावों में सरलता आती है, जबकि अपनी गलती को सही सिद्ध करने के लिए तर्क-वितर्क करना नए कर्म बंधन का कारण बन सकता है।
गुरुदेव ने श्रोताओं को आत्मचिंतन की प्रेरणा देते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं से पूछना चाहिए कि उसके स्वभाव में कितनी सरलता है और क्या वह अपनी गलतियों को स्वीकार करता है अथवा उनका बचाव करने लगता है। व्यक्ति स्वयं और केवलज्ञ भगवान ही उसके अंतरंग भावों को पूर्णतः जान सकते हैं। इसलिए दूसरों से अपनी कमियां छिपाने के बजाय स्वयं के सामने उन्हें स्वीकार करना चाहिए।
इच्छाओं पर नियंत्रण से मिलती है वास्तविक शांति
गुलाब मुनिजी म.सा. ने कहा कि जीवन में जो भी कर्म उदय में आएं, उन्हें स्वीकार भाव से भोगने का प्रयास करना चाहिए। अनावश्यक देखना, सुनना और बोलना भी दुख का कारण बनता है। जब व्यक्ति अपने कर्मों के परिणामों को समता से स्वीकार करता है, तो उसके भीतर शांति और समाधि का भाव विकसित होता है।
उन्होंने कहा कि पुण्य के उदय से मनुष्य को सुख-सुविधाएं और पांचों इंद्रियां प्राप्त हुई हैं। इनका उपयोग करते समय संयम और मर्यादा बनाए रखना आवश्यक है। संयम के अभाव में इंद्रियों के सुखों के पीछे भागने से अनर्थदंड और नए कर्म बंधन की संभावना बढ़ जाती है।
यदि कुछ सुनने का मन हो, तो पहले आत्मा से पूछना चाहिए कि क्या यह सुनना उचित है? कहीं घूमने जाने की इच्छा हो, तो विचार करना चाहिए कि क्या वहां जाना वास्तव में आवश्यक है? आत्मा की आवाज सुनने और विवेक से निर्णय लेने पर व्यक्ति अनावश्यक गतिविधियों से बच सकता है।
गुरुदेव ने प्रेरक सूत्र दिया— "मन की माने वो मानी, आत्मा की माने वो ज्ञानी।"
उन्होंने कहा कि किसी भी कार्य को करने से पहले स्वयं से पूछें कि इसकी आवश्यकता क्या है, क्या यह मेरे लिए उपयोगी है और यदि मैं इसका उपभोग नहीं करूंगा, तो क्या मेरा काम नहीं चल सकता? इस प्रकार का आत्मचिंतन धीरे-धीरे अनावश्यक वस्तुओं, गतिविधियों और इच्छाओं के प्रति अरुचि पैदा कर सकता है। यही संयम की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
परिणाम मनचाहा न मिले तो संतोष भाव रखें
गुरुदेव ने कहा कि कई बार व्यक्ति बहुत प्रयास और निवेश करने के बाद भी मनचाहा परिणाम प्राप्त नहीं कर पाता। ऐसी स्थिति में उसे अपनी गलती से सीख लेते हुए संतोष भाव रखना चाहिए। यह विचार करना चाहिए कि मेरे पुरुषार्थ के बावजूद इस समय इतना ही लाभ होना था। संतोष का यह भाव व्यक्ति को अनावश्यक चिंता और नए कर्म बंधन से बचाने में सहायक होता है।
उन्होंने समझाया कि समय से पहले और भाग्य के बिना किसी को कुछ नहीं मिलता। अधिक साधन होने से ही अधिक शांति मिले, यह आवश्यक नहीं है। कई बार कम साधनों में भी व्यक्ति अधिक शांतिपूर्ण जीवन जीता है, जबकि अधिक साधन होने पर भी इच्छाओं के कारण अशांत रहता है।
वास्तविक शांति तभी प्राप्त होती है, जब व्यक्ति अपनी इच्छाओं को नियंत्रित करना सीखता है। इच्छाओं की निरंतर पूर्ति के पीछे भागने के बजाय उपलब्ध परिस्थितियों में संतोष रखना चाहिए। पुरुषार्थ करना आवश्यक है, लेकिन परिणाम के प्रति अत्यधिक आसक्ति और लालसा से बचना भी उतना ही जरूरी है।
सरलता, स्वीकारता, संयम, संतोष और समर्पण से बनेगा जीवन श्रेष्ठ
प्रवचन के समापन में परम् पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने जीवन को श्रेष्ठ बनाने के लिए पांच महत्वपूर्ण गुणों को अपनाने की प्रेरणा दी।
1. सरलता: अपने व्यवहार और विचारों में सरलता रखें। छल-कपट और अनावश्यक तर्क-वितर्क से बचें।
2. स्वीकारता: अपनी भूलों और जीवन में आने वाली परिस्थितियों को स्वीकार करने का भाव विकसित करें। अपनी गलतियों को सही सिद्ध करने के बजाय उनसे सीखें।
3. संयम: इंद्रियों, वाणी, इच्छाओं और गतिविधियों पर नियंत्रण रखें। अनावश्यक प्रवृत्तियों से बचकर समय और ऊर्जा का सदुपयोग करें।
4. संतोष: पुरुषार्थ करने के बाद भी परिणाम मनचाहा न मिले, तो व्यर्थ की चिंता करने के बजाय संतोष भाव रखें। इच्छाओं को सीमित करना सीखें।
5. समर्पण भाव: अपने उपकारी व्यक्तियों के प्रति सदैव कृतज्ञता और समर्पण रखें। उनके उपकारों को याद रखें और विनम्रता के साथ जीवन जिएं।
गुरुदेव ने कहा कि यदि ये पांचों गुण जीवन में आ जाएं, तो व्यक्ति को सही मार्ग स्वयं दिखाई देने लगता है। जब जीव दूसरे जीवों को अपने समान समझने लगता है, तो उसके भीतर करुणा, संवेदनशीलता और संयम का विकास होता है। इससे दूसरों के प्रति अनुचित व्यवहार करने की प्रवृत्ति कम होती है और नए कर्म बंधन से बचने में सहायता मिलती है।
परम् पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा. के प्रवचन का संदेश यह है कि विपरीत परिस्थितियों में घबराने के बजाय उन्हें स्वीकार करें, अपनी गलतियों का बचाव करने के बजाय उन्हें सुधारें और अनावश्यक प्रवृत्तियों में समय गंवाने के बजाय धर्म आराधना व आत्मचिंतन करें। सरलता, स्वीकारता, संयम, संतोष और समर्पण को जीवन में अपनाकर ही व्यक्ति शांति, समाधि और आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है।




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