मनुष्य को बच्चों की चिंता करने के साथ-साथ अपने जीवन और आत्मकल्याण की चिंता भी करनी चाहिए।

कर्म पर दृष्टि रखने वाला व्यक्ति कभी विचलित नहीं होता : प्रवर्तक पूज्य श्री प्रकाशमुनिजी म.सा.

श्री सौभाग्य प्रकाश दरबार में प्रवचन, कहा—भगवान पर भरोसा है तो उनकी वाणी पर भी विश्वास करें

रतलाम, 28 अक्टूबर(सम्यक दृष्टि, प्रकाश मूणत) कर्म पर जिसकी दृष्टि होती है, वह कभी विचलित नहीं होता। यदि व्यक्ति जीवन में विचलित हो रहा है, तो समझ लेना चाहिए कि उसकी दृष्टि कर्म के सिद्धांत पर नहीं है। संसार में हम भगवान पर तो भरोसा करते हैं, लेकिन उनकी वाणी पर विश्वास नहीं करते। जबकि सत्य यह है कि प्रत्येक जीव को अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है। कर्म जैसा होगा, फल भी वैसा ही मिलेगा। इसलिए जीवन में परिस्थितियां कैसी भी हों, व्यक्ति को अपने कर्तव्य और धर्म के मार्ग से विचलित नहीं होना चाहिए।

उक्त विचार मालव केसरी पूज्य गुरुदेव सौभाग्यमलजी म.सा. के सुशिष्य, रत्नपुरी के रत्न एवं श्रमण संघीय प्रवर्तक पूज्य श्री प्रकाशमुनिजी म.सा. ने बुधवार को मोहन टॉकीज स्थित श्री सौभाग्य प्रकाश दरबार में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए।

प्रवर्तकश्री ने कहा कि परमात्मा का संदेश है कि कर्तव्य करो, लेकिन कर्तव्य से कभी मत भागो। कर्तव्य और मोह एक-दूसरे के विपरीत हैं। जहां कर्तव्य का बोध होता है, वहां मोह का प्रभाव कम हो जाता है और जहां मोह हावी हो जाता है, वहां व्यक्ति अपने कर्तव्यों से विमुख होने लगता है। आज की विडंबना यह है कि मनुष्य मोह में जी रहा है। यही मोह उसे संसार से बांधे रखता है और वह इससे मुक्त नहीं हो पाता। जब तक आत्मा मोह के बंधनों से मुक्त होकर साधना के मार्ग पर आगे नहीं बढ़ेगी, तब तक आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त नहीं हो सकता।

साधनों के बावजूद बच्चों की चिंता, स्वयं के कल्याण पर भी दें ध्यान

प्रवर्तकश्री ने कहा कि आज के बच्चे बहुत पुण्यशाली हैं, क्योंकि उन्हें जीवन में अनेक प्रकार के साधन और सुविधाएं सहज ही उपलब्ध हो रहे हैं। पहले के समय में इतने साधन नहीं हुआ करते थे, फिर भी आज माता-पिता अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित रहते हैं। मनुष्य को बच्चों की चिंता करने के साथ-साथ अपने जीवन और आत्मकल्याण की चिंता भी करनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवनभर परिश्रम करके धन और संपत्ति का संग्रह करता है, लेकिन उसका उपभोग आगे चलकर उसके बच्चों को मिलता है। मेहनत करने वाले व्यक्ति को कई बार जीवन में अपेक्षित सुकून नहीं मिल पाता, जबकि अगली पीढ़ी को बहुत कुछ सहज ही प्राप्त हो जाता है। यह सब कर्मों के विधान का परिणाम है। ऐसी परिस्थितियों को देखकर मन में विकृत भाव नहीं लाने चाहिए। इसके बजाय व्यक्ति को कर्म सिद्धांत को समझकर समभाव बनाए रखना चाहिए।

उन्होंने कहा कि परमात्मा विकृत भावों से मुक्त होकर वीतरागता की अवस्था को प्राप्त हुए। उनकी स्तुति और आराधना करने का उद्देश्य भी अपने भीतर के विकारों को दूर करना होना चाहिए। भगवान के गुणों का स्मरण करते हुए प्रत्येक व्यक्ति को अपने भावों को निर्मल बनाने तथा राग-द्वेष और मोह से मुक्त होने का प्रयास करना चाहिए।

अनंतकाल से भटकती आत्मा का आधार भगवान

प्रवर्तकश्री ने कहा कि आत्मा अनंतकाल से संसार में भटक रही है। इस भटकाव से मुक्ति पाने के लिए भगवान की वाणी और उनके बताए मार्ग को जीवन में अपनाना आवश्यक है। केवल भगवान पर भरोसा करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके उपदेशों पर विश्वास करके उन्हें अपने आचरण में उतारना भी जरूरी है। कर्मों के सिद्धांत को समझने वाला व्यक्ति सुख-दुःख की परिस्थितियों में संतुलित रहता है और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ता है।

प्रवचन के प्रारंभ में सेवाभावी श्री दर्शनमुनिजी म.सा. ने ‘पुच्छिम् सुणम’ के जाप कराए। इस अवसर पर प्रवर्तकश्री से अनेक तपस्वियों ने अलग-अलग तपस्याओं के प्रत्याख्यान ग्रहण किए। कार्यक्रम का संचालन रखब चत्तर ने किया।

धर्मसभा में प्रवचन प्रभाविका श्री सुमनप्रभाजी म.सा. ठाणा-8, महासती श्री चंदनबालाजी म.सा. एवं महासती श्री कल्पनाजी म.सा. मंचासीन रहीं। इस अवसर पर श्री धर्मदास जैन श्रीसंघ, श्री धर्मदास जैन मित्र मंडल ट्रस्ट, श्री सौभाग्य तीर्थ ट्रस्ट, श्री सौभाग्य जैन नवयुवक मंडल, श्री सौभाग्य प्रकाश युवक मंडल, श्री सौभाग्य जैन महिला मंडल, श्री सौभाग्य अणु बहु मंडल तथा श्री सौभाग्य प्रकाश बालक-बालिका मंडल के सदस्यगण उपस्थित रहे।

संकलनकर्ता:- अरुण त्रिपाठी

Dr.Talera's Multi-speciality Dental Clinic, Thandla 



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