परमात्मा की प्राप्ति आत्म जागरण से ही संभव है

आत्म जागरण से ही होती है परमात्मा की प्राप्ति : श्रमण संघीय पूज्य प्रवर्तक श्री प्रकाश मुनिजी म.सा.

इंद्रियों का जागरण नहीं, आत्मा का जागरण है सच्चा जागरण; करुणा और संवेदना सम्यक दर्शन की पहचान

रतलाम, 18 अक्टूबर (सम्यक दृष्टि प्रकाश मूणत)  मनुष्य जीवन मोह-माया में खोने के लिए नहीं, बल्कि आत्मा को जागृत कर परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करने के लिए मिला है। सभी जानते हैं कि संयम उत्तम है और धर्म, ध्यान, तप तथा जप जीवन को श्रेष्ठ बनाने के साधन हैं, लेकिन जानकारी होने के बावजूद बहुत कम लोग इनका वास्तविक जीवन में पालन कर पाते हैं। अब जागने का समय है। अपनी बोधि को जगाइए और समझिए कि केवल इंद्रियों का जागृत होना वास्तविक जागरण नहीं है। परमात्मा की प्राप्ति आत्म जागरण से ही संभव है। यह प्रेरणादायी विचार मालव केसरी पूज्य गुरुदेव सौभाग्यमलजी म.सा. के सुशिष्य, रत्नपुरी के रत्न एवं श्रमण संघीय प्रवर्तक पूज्य श्री प्रकाश मुनिजी म.सा. निर्भय ने व्यक्त किए।

उक्त प्रवचन मोहन टाकीज पर स्थित श्री सौभाग्य प्रकाश दरबार में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने जीवन के वास्तविक उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि परमात्मा का संदेश हमें परभाव से हटकर स्वभाव में आने की प्रेरणा देता है। इस मार्ग पर चलकर अनेक लोगों ने अपना आत्मकल्याण किया और सम्यकत्व की प्राप्ति की है। आत्मा का वास्तविक विकास तभी होता है, जब मनुष्य अपने भीतर झांककर अपनी कमियों को पहचाने और उन्हें दूर करने का प्रयास करें।

करुणा और संवेदना से जागृत होता है सम्यक दर्शन

प्रवर्तकश्री ने कहा कि करुणा का भाव सम्यक दर्शन की महत्वपूर्ण पहचान है। यदि कोई व्यक्ति दूसरों के लिए कुछ करने में समर्थ नहीं है, तो कम से कम उसके मन में शुभभावना और संवेदना अवश्य होनी चाहिए। दूसरों के दुख को समझना और उनके प्रति दया का भाव रखना आत्मिक उन्नति की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

उन्होंने कहा कि जब मनुष्य के भावों में परिवर्तन नहीं आता, तो मोह, माया, मान, लोभ और क्रोध जैसी कषायें उसके जीवन को प्रभावित करती रहती हैं। इन कषायों के कारण राग-द्वेष उत्पन्न होता है और मनुष्य के भीतर दया तथा करुणा का भाव कमजोर पड़ने लगता है। यदि जीवन में करुणा जागृत नहीं होती, तो आत्मिक विकास का मार्ग भी प्रशस्त नहीं हो पाता। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने विचारों, व्यवहार और भावनाओं को निर्मल बनाने का प्रयास करना चाहिए।

स्वयं को सुधारना ही जैन दर्शन का मूल संदेश

पूज्यश्री ने कहा कि जैन दर्शन दूसरों की कमियां निकालने का नहीं, बल्कि स्वयं को सुधारने का दर्शन है। जब व्यक्ति के भीतर अपने दोषों को पहचानने और उन्हें दूर करने की भावना जागृत हो जाती है, तब समझना चाहिए कि उसकी बोधि जागने लगी है। आत्मसुधार की शुरुआत विचारों में परिवर्तन से होती है और धीरे-धीरे इसका प्रभाव व्यक्ति के आचरण तथा व्यवहार में दिखाई देने लगता है।

उन्होंने कहा कि साधु-संत समाज को सही दिशा देने और लोगों को सद् भाव पर चलने की प्रेरणा देने के लिए कार्य करते हैं। प्रवर्तकश्री ने कहा कि जैन दर्शन, खुद को सुधारने का दर्शन है। सुधरने का भाव यदि जाग जाए, तो समझ लेना कि बोधि आ गई। साधु-संत समाज में सुधार के लिए ही कार्य करते है। उनके उपदेशों से प्रेरणा लेकर प्रत्येक व्यक्ति को धर्म, ध्यान, तप, जप और संयम की ओर अग्रसर होना चाहिए। जीवन में केवल धार्मिक बातें जानना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें व्यवहार में उतारना भी आवश्यक है। आत्म जागरण तभी सार्थक होगा, जब व्यक्ति अपने जीवन में सद्भाव, करुणा, संयम और आत्मसुधार को स्थान देगा।

तपस्वियों ने लिए प्रत्याख्यान, धर्मसभा में उमड़े श्रद्धालु

धर्मसभा का शुभारंभ प्रवचन प्रभाविका श्री सुमनप्रभाजी म.सा. के संबोधन से हुआ। इस दौरान रानी-उत्तम मूणत ने पांच उपवास के प्रत्याख्यान ग्रहण किए। अन्य तपस्वियों ने भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार विभिन्न तप आराधनाओं के प्रत्याख्यान लिए।

धर्मसभा में सेवाभावी श्री दर्शनमुनिजी म.सा., प्रवचन प्रभाविका श्री सुमनप्रभाजी म.सा. ठाणा-8, महासती श्री चंदनबालाजी म.सा. एवं महासती श्री कल्पनाजी म.सा. मंचासीन रहे। कार्यक्रम का संचालन रखब चत्तर ने किया।

इस अवसर पर प्रदेश एवं देश के विभिन्न स्थानों से पहुंचे गुरु भक्तों ने दर्शन-वंदन कर संतों का आशीर्वाद प्राप्त किया। धर्मसभा में श्री धर्मदास जैन श्रीसंघ, श्री धर्मदास जैन मित्र मंडल ट्रस्ट, श्री सौभाग्य तीर्थ ट्रस्ट, श्री सौभाग्य जैन नवयुवक मंडल, श्री सौभाग्य प्रकाश युवक मंडल, श्री सौभाग्य जैन महिला मंडल, श्री सौभाग्य अणु बहु मंडल तथा श्री सौभाग्य प्रकाश बालक-बालिका मंडल के सदस्य उपस्थित रहे।

Dr.Talera's Multi-speciality Dental Clinic, Thandla 




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