जिस व्यक्ति ने जीवन जीने की सही कला सीख ली, उसका जीवन स्वयं ही सुंदर बन जाता है। मनुष्य को अपने सुख के साथ-साथ दूसरों के सुख का भी ध्यान रखना चाहिए।

अपने लिए जो सुख चाहते हैं, वह दूसरों को देना भी सीखें : पूज्य प्रवर्तकश्री प्रकाश मुनिजी म.सा.

आसक्ति ही दुख का कारण, अनासक्त भाव से जीवन जीने पर मिलेगा वास्तविक आनंद; सौभाग्य प्रकाश दरबार में धर्मसभा को किया संबोधित

रतलाम, 17 अक्टूबर (सम्यक दृष्टि, प्रकाश मूणत)  संसार में जन्म लेने के बाद मनुष्य को जीवन जीने की कला सीखनी चाहिए। जीवन का वास्तविक आनंद प्रेम, प्रसन्नता और अनासक्त भाव से जीने में है। मनुष्य अपने लिए जिस सुख की अपेक्षा करता है, वही सुख दूसरों को देने का प्रयास भी करना चाहिए। यदि हम चाहते हैं कि हमारे जीवन में सुख और शांति बनी रहे, तो हमें दूसरों के जीवन में भी सुख और प्रसन्नता लाने का प्रयास करना होगा। दूसरों को सुख देने की भावना ही वास्तविक सुख का आधार बनती है। आसक्ति से दूर रहकर जीवन जीने वाला व्यक्ति ही सच्चे आनंद का अनुभव कर सकता है।

उक्त प्रेरक विचार मालव केसरी पूज्य गुरुदेव सौभाग्यमलजी म.सा. के सुशिष्य, रत्नपुरी के रत्न एवं श्रमण संघीय प्रवर्तक पूज्य श्री प्रकाश मुनिजी म.सा. निर्भय ने मोहन टॉकीज स्थित श्री सौभाग्य प्रकाश दरबार में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।

प्रवर्तकश्री ने जीवन के सार को समझाते हुए कहा कि संसार में आकर जीवन जीना सीखना जरूरी है। लोग मृत्यु की चर्चा तो करते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि जो मृत्यु को प्राप्त होता है, उसका पुनर्जन्म भी होता है। जीवन को आनंद और प्रेम से जीना ही उसकी सार्थकता है। जिस व्यक्ति ने जीवन जीने की सही कला सीख ली, उसका जीवन स्वयं ही सुंदर बन जाता है। मनुष्य को अपने सुख के साथ-साथ दूसरों के सुख का भी ध्यान रखना चाहिए। दूसरों के प्रति सद्भावना और सहयोग का भाव रखने से जीवन में वास्तविक आनंद की अनुभूति होती है।

आसक्ति छोड़ने से जीवन बनेगा आनंदमय

प्रवर्तकश्री ने कहा कि मनुष्य को ममता और आसक्ति में उलझकर जीवन जीने के बजाय अनासक्त भाव अपनाना चाहिए। जब तक व्यक्ति किसी वस्तु, व्यक्ति अथवा परिस्थिति के प्रति अत्यधिक आसक्त रहता है, तब तक उसका मन अपेक्षाओं और चिंताओं से घिरा रहता है। आसक्ति समाप्त होने पर जीवन अधिक सहज और आनंदमय बन जाता है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति प्रवचन सुनने के लिए बैठा है, लेकिन उसका मन घर-परिवार और दूसरी चिंताओं में उलझा हुआ है, तो उसे प्रवचन का वास्तविक लाभ नहीं मिल पाता। धर्मसभा में उपस्थित रहने के साथ मन का भी धर्म से जुड़ना आवश्यक है। जब व्यक्ति एकाग्रता और अनासक्त भाव से धर्मवाणी का श्रवण करता है, तभी उसके विचारों और व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन आता है।

प्रवर्तकश्री ने कहा कि परमात्मा की वाणी मनुष्य को जीवन जीने की सही दिशा प्रदान करती है। संसार की वस्तुओं का उपयोग करते हुए भी उनके प्रति मोह और आसक्ति नहीं रखनी चाहिए। आसक्ति ही दुख का प्रमुख कारण बनती है। व्यक्ति को परिस्थितियों के बीच रहते हुए भी अपने मन को संतुलित रखना सीखना चाहिए। यही आध्यात्मिक जीवन की महत्वपूर्ण सीख है।

जीव शाश्वत है, केवल बदलता है स्वरूप

जीव के अस्तित्व और उसकी शाश्वतता पर प्रकाश डालते हुए प्रवर्तकश्री ने कहा कि जीव की उत्पत्ति कभी नहीं हुई और न ही उसका पूर्ण विनाश होता है। जीव एक शाश्वत द्रव्य है, जो विभिन्न अवस्थाओं में अपना स्वरूप बदलता रहता है। जब जीव का कोई आदि नहीं है, तो उसके अंत का प्रश्न भी नहीं उठता। अनादिकाल से जीव का अस्तित्व बना हुआ है और आगे भी बना रहेगा।

उन्होंने धर्म के माध्यम से जीव के कल्याण और आत्मिक उन्नति का मार्ग समझाते हुए कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में ऐसे विचारों को स्थान देना चाहिए, जो उसे मोह, आसक्ति और दुख से दूर ले जाएं। आत्मचिंतन, धर्मश्रवण और सद्भावना के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन को अधिक सार्थक बना सकता है।

धर्मसभा में संतों का सान्निध्य, तपस्वियों ने लिए प्रत्याख्यान

धर्मसभा के प्रारंभ में प्रवचन प्रभाविका श्री सुमनप्रभाजी म.सा. ने संबोधित किया। कार्यक्रम का संचालन रखब चत्तर ने किया। इस अवसर पर सेवाभावी श्री दर्शनमुनिजी म.सा., प्रवचन प्रभाविका श्री सुमनप्रभाजी म.सा. ठाणा-8, महासती श्री चंदनबालाजी म.सा. एवं महासती श्री कल्पनाजी म.सा. मंचासीन रहे।

धर्मसभा में प्रदेश और देश के विभिन्न स्थानों से आए गुरुभक्तों ने संतों के दर्शन-वंदन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। अनेक तपस्वियों ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार विभिन्न तप आराधनाओं के प्रत्याख्यान ग्रहण किए।

इस अवसर पर श्री धर्मदास जैन श्रीसंघ, श्री धर्मदास जैन मित्र मंडल ट्रस्ट, श्री सौभाग्य तीर्थ ट्रस्ट, श्री सौभाग्य जैन नवयुवक मंडल, श्री सौभाग्य प्रकाश युवक मंडल, श्री सौभाग्य जैन महिला मंडल, श्री सौभाग्य अणु बहु मंडल तथा श्री सौभाग्य प्रकाश बालक-बालिका मंडल के सदस्य उपस्थित रहे। 

धार्मिक संस्कार शिविर में आज होगी चित्रकला प्रतियोगिता

प्रवर्तकश्री की निश्रा में श्री सौभाग्य प्रकाश दरबार में धर्म, संस्कार और कला को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से विभिन्न आयोजन किए जा रहे हैं। इसी क्रम में 18 अक्टूबर, रविवार को दोपहर 1 बजे से धार्मिक संस्कार शिविर के अंतर्गत चित्रकला प्रतियोगिता आयोजित होगी। चातुर्मास आयोजन समिति द्वारा प्रतियोगिता में भाग लेने वाले प्रतिभागियों को पुरस्कृत किया जाएगा।

समिति की ओर से 25 अक्टूबर को सौभाग्य कला महोत्सव का आयोजन भी किया जाएगा। इसके लिए प्रतिभागियों की कृतियां जमा करने की अंतिम तिथि 22-23 अक्टूबर निर्धारित की गई है। महोत्सव में तीन आयु वर्गों—4 से 10 वर्ष, 11 से 14 वर्ष तथा 14 वर्ष से अधिक आयु के प्रतिभागियों को शामिल होने का अवसर मिलेगा।

सौभाग्य कला महोत्सव के दौरान श्री सौभाग्य प्रकाश दरबार में भजन, स्तुति गायन, नृत्य, नाटक, वक्तव्य, कविता पाठ, वाद्य संगीत और समूह प्रस्तुतियों के माध्यम से प्रतिभागी अपनी कला का प्रदर्शन करेंगे। आयोजन का उद्देश्य बच्चों और युवाओं में धार्मिक संस्कारों के साथ रचनात्मकता एवं सांस्कृतिक अभिरुचि को बढ़ावा देना है।


Dr.Talera's Multi-speciality Dental Clinic, Thandla 




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