शांति-समाधि के लिए कई बार मौन रहना भी जरूरी

असफलता सफलता की नींव है, तनाव नहीं समाधान खोजें : परम् पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा.

कर्मों के उदय में निमित्त को दोष न दें, गलतफहमी से रिश्ते न तोड़ें; शांति-समाधि के लिए कई बार मौन रहना भी जरूरी

नागपुर, 23 सितंबर। धर्मदास संप्रदाय सुमेरु परम पूज्य गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने प्रवचन में कहा कि भगवान महावीर ने अपने अनुभव से संसार के जीवों को मोक्ष का मार्ग बताया है। संसार रूपी रंगमंच पर जीव स्वयं ही कर्ता है और स्वयं ही अपने कर्मों का भोगता है। स्वयं पर विश्वास की कमी के कारण जीव दूसरों के भरोसे रहने लगता है और जीवन में आने वाली छोटी-छोटी परिस्थितियों को लेकर तनावग्रस्त हो जाता है।

गुरुदेव ने कहा कि संसार में जो कुछ घटित हो रहा है, उसके पीछे शुभ-अशुभ कर्मों का उदय है। पूर्व के कर्मों के कारण वर्तमान में परिस्थितियां बनती हैं और उन्हीं परिस्थितियों में नए कर्मों का बंध भी होता है। इसलिए हर परिस्थिति के लिए दूसरे व्यक्ति को दोष देना उचित नहीं है। यदि व्यक्ति सच्चा है तो उसे हर बात पर सफाई देने की आवश्यकता नहीं है। कई बार सामने वाले की बात सुनकर भी शांत रह जाना ही बुद्धिमानी है।

उन्होंने कहा कि छोटी-छोटी बातों में व्यक्ति तनाव ले लेता है—मुझे क्यों कहा, मेरे साथ ऐसा क्यों किया, मुझसे ही ऊंची आवाज में क्यों बात की। ऐसी मानसिकता व्यक्ति को कुछ ही क्षणों में आत्मविश्वास से निराशा की ओर ले जाती है। धन, सत्ता और बुद्धि का थोड़ा सा बल मिलते ही जीव के भीतर ‘मैं भी कुछ हूं’ का भाव जाग जाता है। इसके साथ ही मान-सम्मान और अहंकार की भावना भी बढ़ने लगती है।

शांति-समाधि के लिए कई बार मौन जरूरी

गुरुदेव ने कहा कि यदि जीवन में शांति और समाधि चाहिए तो कानों से सुनी हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं है। कई बार सुनी बात को अनसुना करना, आंखों से देखकर भी अनदेखा करना और मुंह होते हुए भी कुछ स्थानों पर मौन रहना आवश्यक होता है। हर जगह बोलना जरूरी नहीं है। कई बार व्यक्ति ऐसी जगह भी बोल देता है जहां मौन रहना चाहिए और बाद में वही शब्द तनाव का कारण बन जाते हैं।

उन्होंने कहा कि पूर्वभवों के कर्मों के कारण भी व्यक्ति को कई बार ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, जहां उसे दूसरों की बातें सुननी पड़ती हैं। ऐसे समय में प्रतिकार के बजाय धैर्य रखना चाहिए।

गलतफहमी से रिश्ते न तोड़ें

रिश्तों में आने वाली गलतफहमियों पर गुरुदेव ने कहा कि छोटी सी बात को बड़ा बनाकर संबंध समाप्त नहीं करना चाहिए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि नाखून बढ़ जाने पर पूरी अंगुली नहीं काटी जाती, बल्कि केवल नाखून काटा जाता है। उसी प्रकार यदि किसी रिश्ते में गलतफहमी हो गई है तो उसे दूर करना चाहिए, रिश्ता नहीं तोड़ना चाहिए।

उन्होंने कहा कि किसी एक जीव से संबंध बिगड़ने पर हमारी अपनी गति भी प्रभावित हो सकती है। इसलिए कर्मों के उदय में निमित्त को दोष देने के बजाय यह समझना चाहिए कि परिस्थितियां मेरे कर्मों के कारण आई हैं। निमित्त हमेशा निर्दोष होता है।

असफलता से घबराएं नहीं, उससे सीखें

गुरुदेव ने कहा कि आपत्ति और असफलता आते ही व्यक्ति तनाव में आ जाता है—कैसे होगा, क्या होगा, मैं कैसे करूंगा, मुझसे नहीं होगा। यही सोच उसे आगे बढ़ने से रोक देती है। जबकि असफलता जैसा कोई दूसरा विद्यालय नहीं है। असफलता ही सफलता की नींव डालती है।

उन्होंने कहा कि असफलता मिलने के बाद सोचने की प्रक्रिया बंद नहीं करनी चाहिए, बल्कि असफलता के कारणों को तलाशना चाहिए। जो व्यक्ति अपनी कमियों को पहचानकर पुनः प्रयास करता है, उसके लिए सफलता का रास्ता खुलता है। असफलता भी कर्मों के उदय का परिणाम हो सकती है और उसका सामना धैर्य के साथ करना चाहिए।

भगवान महावीर के नयसार और मरीचि के भव का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने बताया कि धर्म की प्राप्ति के बाद भी शरीर के प्रति आसक्ति के कारण जीव को अनेक भवों में भटकना पड़ा। इससे यह शिक्षा मिलती है कि आसक्ति केवल शरीर से नहीं होती, बल्कि विचार, पद, वचन और व्यवहार से भी हो सकती है।

ईमानदारी और धैर्य से व्यक्ति संकट से निकल सकता है

गुरुदेव ने एक ईमानदार व्यक्ति का प्रसंग सुनाया, जिसके ऊपर भारी कर्ज था। लोग अपने पैसे मांगने उसके घर आने लगे, लेकिन कठिन परिस्थिति के बावजूद उसने अपना धर्म और ईमानदारी नहीं छोड़ी। उसने सभी को आश्वासन दिया कि वह उनका पैसा चुका देगा।

समय बदला, उसकी बेटी तहसीलदार बनी और बेटा भी बड़ा होकर कमाने लगा। इसके बावजूद उस व्यक्ति ने यह नहीं माना कि अब प्रभाव के कारण उसका कर्ज समाप्त हो गया। उसने धैर्य रखा और जिसके जितने पैसे देने थे, सभी को ईमानदारी से चुका दिया।

गुरुदेव ने कहा कि परिस्थिति चाहे कितनी भी कठिन हो, व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटना चाहिए। ईमानदारी, धैर्य और कर्म के प्रति सजगता व्यक्ति को संकट से बाहर निकलने का रास्ता दिखाती है।

चिंतामणि रत्न सामने होते हुए भी व्यक्ति पहचान नहीं पाया

भाग्य और पुरुषार्थ को समझाने के लिए गुरुदेव ने शिव-पार्वती और चिंतामणि रत्न का प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि एक दुखी व्यक्ति को देखकर पार्वती ने उसकी सहायता करने की इच्छा व्यक्त की। शिव ने कहा कि उसके भाग्य का उदय अभी वैसा ही है। बाद में उसे चिंतामणि रत्न देकर उसकी सहायता करने का प्रयास किया गया, लेकिन वह व्यक्ति सामने रखे रत्न को भी पहचान नहीं सका।

गुरुदेव ने इस प्रसंग के माध्यम से बताया कि अवसर सामने होने पर भी यदि व्यक्ति उसे पहचान नहीं पाए तो उसका लाभ नहीं मिल सकता। इसलिए जीवन में कर्मों के साथ विवेक और पुरुषार्थ का भी महत्व है।

सम्मान के लिए इतना प्रयास, धर्म के लिए कितना?

गुरुदेव ने आत्मचिंतन कराते हुए कहा कि व्यक्ति शारीरिक रूप से असमर्थ होने के बावजूद सम्मान प्राप्त करने के लिए सैकड़ों किलोमीटर दूर चला जाता है। वहां घंटों समय बिताने में उसे दर्द या थकान महसूस नहीं होती, लेकिन घर से थोड़ी दूरी पर जाकर दो सामयिक करने के लिए समय नहीं निकाल पाता।

उन्होंने कहा कि व्यक्ति को विचार करना चाहिए कि वह सम्मान और प्रतिष्ठा के लिए कितना प्रयास करता है और धर्म आराधना के लिए कितना समय देता है। वास्तविक प्राथमिकताओं को पहचानना भी आत्मचिंतन का हिस्सा है।

तिरस्कार हीन भावना लाता है, अनुकम्पा रखें

तेतली प्रधान और उनकी पत्नी कोटिला का प्रसंग सुनाते हुए गुरुदेव ने बताया कि तेतली प्रधान को समाज में बहुत सम्मान मिलता था, लेकिन उनकी पत्नी को उनके व्यवहार से उपेक्षा का अनुभव हुआ और उन्होंने दीक्षा लेने का निर्णय लिया। तेतली प्रधान ने उनसे कहा था कि यदि वे देवगति में जाएं तो उन्हें प्रतिबोध दें।

बाद में कोटिला देवगति में गईं। एक समय ऐसा आया जब तेतली प्रधान को समाज में पहले जैसा सम्मान नहीं मिला। इससे वे अत्यंत व्यथित हो गए और जीवन से निराश होने लगे। उनके जीवन में ऐसी परिस्थितियां बनीं कि वे बार-बार निराशा से घिरते गए। अंततः कोटिला ने देव रूप में उन्हें प्रतिबोध दिया और धर्म का मार्ग समझाया।

गुरुदेव ने इस प्रसंग से कहा कि तिरस्कार हीन भावना को जन्म देता है। इसलिए दूसरों के प्रति अनुकम्पा के भाव रखें। अच्छाई की अनुमोदना करें और बुराई करने वाले के प्रति भी अनुकम्पा रखें।

उन्होंने कहा कि जीवन में असफलता आए तो तनाव में डूबने के बजाय उससे सीखना चाहिए। असफलता को अंत नहीं, बल्कि आगे बढ़ने का अवसर मानना चाहिए। असफलता में सफलता का रास्ता खोजें, कर्मों के उदय में धैर्य रखें और जीवन में शांति, समता एवं समाधि के भाव विकसित करें।


Dr.Talera's Multi-speciality Dental Clinic, Thandla 


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