समर्पण ही भक्ति और भक्ति ही समर्पण है — श्रमण संघीय प्रवर्तक श्री प्रकाश मुनिजी म.सा.
रतलाम, 24 सितंबर (सम्यक दृष्टि, प्रकाश मुन्नत)। मालव केसरी पूज्य गुरुदेव सौभाग्यमलजी म.सा. के सुशिष्य, रत्नपुरी के रत्न एवं श्रमण संघीय प्रवर्तक पूज्य श्री प्रकाश मुनिजी म.सा. ‘निर्भय’ ने कहा कि समर्पण ही भक्ति है और भक्ति ही समर्पण है। भक्ति की कोई सीमा नहीं होती। जब भक्ति में सच्चे भाव, श्रद्धा और पूर्ण समर्पण जुड़ जाता है, तब वह आत्मा के जागरण का माध्यम बन जाती है। आत्मकल्याण के लिए ज्ञान, दर्शन और चारित्र—इन तीनों की भक्ति आवश्यक है।
मोहन टाकीज स्थित श्री सौभाग्य प्रकाश दरबार में गुरुवार सुबह आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए प्रवर्तकश्री ने कहा कि सम्यक दर्शन भक्ति का मार्ग है। जब तक हृदय में भक्ति का जागरण नहीं होता, तब तक आत्मदर्शन का मार्ग भी पुष्ट नहीं हो पाता। भक्ति श्रद्धा को मजबूत करती है और श्रद्धा जीवन को सही दिशा प्रदान करती है। इसलिए भक्ति में केवल बाहरी प्रदर्शन नहीं, बल्कि आंतरिक समर्पण होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि भक्ति सदैव नमनपूर्वक और विनम्र भाव से करनी चाहिए। जहां अहंकार आ जाता है, वहां भक्ति के भाव धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं। भक्ति जितनी शुद्ध, सरल और निष्कपट होगी, उसका फल भी उतना ही अधिक प्राप्त होगा। सच्ची भक्ति व्यक्ति को अपने भीतर झांकने और अपनी आत्मिक शक्ति को पहचानने की प्रेरणा देती है।
परमात्मा की स्तुति से जागृत होती है शक्ति
प्रवर्तकश्री ने भक्ति की शक्ति को समझाते हुए हनुमानजी का प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि जब हनुमानजी समुद्र के किनारे खड़े होकर सोचते हैं कि इतने विशाल समुद्र को कैसे पार किया जाए, तब जामवंत, नल और नील आदि उन्हें उनकी शक्ति का स्मरण कराते हैं। अपनी सामर्थ्य का बोध होते ही हनुमानजी उसी शक्ति को जागृत कर एक छलांग में समुद्र पार कर जाते हैं।
उन्होंने कहा कि यह प्रसंग हमें संदेश देता है कि हमारे भीतर भी अनंत शक्ति विद्यमान है, लेकिन हम उसे पहचान नहीं पाते। परमात्मा की स्तुति, भक्ति और स्मरण उस सुप्त शक्ति को जागृत करने का कार्य करते हैं। भगवान का नाम मनुष्य को भीतर से जागृत करता है और कठिन परिस्थितियों में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
भाव के बिना भक्ति अधूरी
प्रवर्तकश्री ने कहा कि भक्ति केवल शब्दों, पूजा-पाठ या बाहरी क्रियाओं तक सीमित नहीं है। भक्ति का वास्तविक आधार भाव है। यदि हृदय में भाव नहीं हैं तो भक्ति पूर्ण नहीं हो सकती। भावपूर्ण भक्ति से सोई हुई आत्मा को जगाया जा सकता है और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि यदि व्यक्ति स्वार्थपूर्ण भक्ति से भी शक्ति और संतोष प्राप्त कर सकता है, तो शुद्ध एवं निष्काम भावों से की गई भक्ति से मिलने वाले आनंद की कल्पना की जा सकती है। जब जीव सच्ची भक्ति में उतरता है, तब उसके भीतर अपना-पराया, मान-अपमान और अहंकार जैसे भेद धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं। इसलिए आत्मा को जागृत करने और जीवन को सार्थक बनाने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए।
धर्मसभा को प्रवचन प्रभाविका श्री सुमनप्रभाजी म.सा. ने भी संबोधित किया। कार्यक्रम का संचालन आयुष गंग ने किया। इस अवसर पर सेवाभावी श्री दर्शनमुनिजी म.सा., प्रवचन प्रभाविका श्री सुमनप्रभाजी म.सा. ठाणा-8, महासती श्री चंदनबालाजी म.सा. एवं महासती श्री कल्पनाजी म.सा. मंचासीन रहे।
धर्मसभा में श्री धर्मदास जैन श्री संघ के सदस्यगण, श्री धर्मदास जैन मित्र मंडल ट्रस्ट, श्री सौभाग्य तीर्थ ट्रस्ट, श्री सौभाग्य जैन नवयुवक मंडल, श्री सौभाग्य प्रकाश युवक मंडल, श्री सौभाग्य जैन महिला मंडल, श्री सौभाग्य अणु बहु मंडल तथा श्री सौभाग्य प्रकाश बालक-बालिका मंडल सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। धर्मसभा के दौरान श्रद्धालुओं ने प्रवर्तकश्री के मंगल प्रवचन का श्रवण कर भक्ति, श्रद्धा और समर्पण के मार्ग पर चलने का संदेश ग्रहण किया।




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