भगवान को भी भोगने पड़ते हैं पुण्य और पाप : प्रवर्तक परम् पूज्य श्री प्रकाश मुनिजी म.सा.
रतलाम, 27 सितंबर (सम्यक दृष्टि, प्रकाश मुन्नत) साता यानी पुण्य का फल तो अपने आप भोग लिया जाता है, लेकिन असाता यानी पाप का फल भोगना ही पड़ता है। मनुष्य को ही नहीं, तीर्थंकर भगवान को भी पुण्य और पाप का फल भोगना पड़ता है। संसार में रहते हुए सुख-सुविधाओं का उपभोग करने के बावजूद यदि व्यक्ति उनके प्रति अनासक्त बना रहे, तो समझना चाहिए कि वह मोक्ष के बहुत करीब पहुंच रहा है। मोक्ष प्राप्ति के लिए जीवन में अनासक्ति का भाव आवश्यक है।
उक्त विचार मालव केसरी पूज्य गुरुदेव सौभाग्यमल जी म.सा. के सुशिष्य, रत्नपुरी के रत्न एवं श्रमण संघीय प्रवर्तक पूज्य श्री प्रकाश मुनिजी म.सा. निर्भय ने मोहन टाकीज स्थित श्री सौभाग्य प्रकाश दरबार में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
प्रवर्तकश्री ने कहा कि आसक्ति व्यक्ति को संसार की वस्तुओं से बांध देती है। आसक्ति के कारण व्यक्ति कपड़े, भोजन और अन्य सांसारिक साधनों को अपने सुख का आधार मानने लगता है। इसके विपरीत अनासक्ति की अवस्था में व्यक्ति वस्तुओं का उपयोग तो करता है, लेकिन उनके प्रति मोह और ममत्व नहीं रखता। संसार में सुख भोगते हुए भी यदि मनुष्य भीतर से अनासक्त रह सके तो उसकी आत्मिक उन्नति होती है।
उन्होंने कहा कि संयम के साथ साधना अत्यंत जरूरी है। केवल ज्ञान प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं है। ज्ञान को साधना और आचरण के माध्यम से जीवन में उतारना आवश्यक है। तीर्थंकरों ने भी साधना के माध्यम से केवलज्ञान की अवस्था प्राप्त की। साधना के बिना आत्मा की वास्तविक शक्ति का अनुभव नहीं हो सकता।
प्रवर्तकश्री ने कहा कि दुनिया की संपत्ति बाहर से आती है, लेकिन वास्तविक ज्ञान अंदर से आता है। बाहरी वस्तुएं कर्मों के अधीन होती हैं। वे आज मिलती हैं तो कल बिछुड़ भी सकती हैं। संसार की प्रत्येक वस्तु परिवर्तनशील है, इसलिए उनके प्रति अत्यधिक आसक्ति दुख का कारण बन सकती है। इसके विपरीत ज्ञान आत्मा की आंतरिक संपदा है, जो व्यक्ति को आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ाती है।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक आत्मा में अनंत शक्ति विद्यमान है, बस उसे जागृत करने की आवश्यकता है। मनुष्य को अपनी आंतरिक शक्ति को पहचानकर साधना के माध्यम से उसे विकसित करना चाहिए। साधना का माध्यम कोई भी हो सकता है, लेकिन उसका अंतिम लक्ष्य आत्मकल्याण और मोक्ष की ओर बढ़ना होना चाहिए।
प्रवर्तकश्री ने जिनवाणी एवं साधु-साध्वियों के मार्गदर्शन को आत्मिक जागरण का महत्वपूर्ण माध्यम बताते हुए कहा कि जिनवाणी की प्रेरणा तथा साधु-साध्वियों के त्याग, तप और संयम ने अनेक भव्य आत्माओं को संसार-सागर से पार उतरने का मार्ग दिखाया है। धर्म का उद्देश्य केवल धार्मिक क्रियाओं तक सीमित नहीं, बल्कि आत्मा को पहचानने और उसे कर्मबंधन से मुक्त करने का पुरुषार्थ करना है।
उन्होंने कहा कि साधु-साध्वी और श्रावक-श्राविका धर्म के चार महत्वपूर्ण आधार हैं। चारों एक-दूसरे के पूरक हैं। श्रावक-श्राविकाओं के सहयोग के बिना धर्म की गतिविधियां आगे नहीं बढ़ सकतीं और साधु-साध्वियों के मार्गदर्शन के बिना समाज को आध्यात्मिक दिशा मिलना कठिन है। साधु-साध्वी संयम एवं साधना के माध्यम से समाज को प्रेरणा देते हैं, वहीं श्रावक-श्राविका सेवा और सहयोग के माध्यम से धर्म की प्रभावना में सहभागी बनते हैं।
धर्मसभा को प्रवचन प्रभाविका श्री सुमनप्रभाजी म.सा. ने भी संबोधित किया। उन्होंने धर्म, संयम एवं साधना के महत्व पर प्रकाश डालते हुए श्रद्धालुओं को आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।
धर्मसभा का संचालन आयुष गंग ने किया। इस दौरान सेवाभावी श्री दर्शनमुनिजी म.सा., प्रवचन प्रभाविका श्री सुमनप्रभाजी म.सा. ठाणा-8, महासती श्री चंदनबालाजी म.सा. एवं महासती श्री कल्पनाजी म.सा. मंचासीन रहे।
धर्मसभा में श्री धर्मदास जैन श्री संघ के सदस्यगण, श्री धर्मदास जैन मित्र मंडल ट्रस्ट, श्री सौभाग्य तीर्थ ट्रस्ट, श्री सौभाग्य जैन नवयुवक मंडल, श्री सौभाग्य प्रकाश युवक मंडल, श्री सौभाग्य जैन महिला मंडल, श्री सौभाग्य अणु बहु मंडल एवं श्री सौभाग्य प्रकाश बालक-बालिका मंडल के सदस्यगण सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।




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