आत्मकल्याण के मार्ग में सबसे बड़ी चुनौती अपने भीतर छिपे आत्मशत्रुओं पर विजय प्राप्त करना है।

मोह पर विजय प्राप्त किए बिना आत्मा निर्मोही नहीं बन सकती – पूज्य प्रवर्तकश्री प्रकाश मुनिजी म.सा.

आत्मा को योद्धा बनाकर आंतरिक शत्रुओं से लड़ना ही साधना का लक्ष्य : तप आराधना के लिए आत्मबल जरूरी

रतलाम, 01 नवंबर (सम्यक दृष्टि, प्रकाश मूणत) 

युद्ध के मैदान में उतरने वाला योद्धा कभी परिस्थितियों से घबराकर पीछे नहीं हटता। वह पूरी ताकत और साहस के साथ शत्रु का सामना करता है तथा विजय प्राप्त करने के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर देता है। ठीक इसी प्रकार साधना के मार्ग पर चलने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आत्मा को योद्धा बनाना पड़ता है। संसार में रहते हुए मनुष्य अनेक बाहरी चुनौतियों का सामना करता है, लेकिन आत्मकल्याण के मार्ग में सबसे बड़ी चुनौती अपने भीतर छिपे आत्मशत्रुओं पर विजय प्राप्त करना है। जब तक जीव मोह के बंधनों में जकड़ा रहेगा, तब तक निर्मोही बनना और आत्मिक विजय प्राप्त करना संभव नहीं है।

उक्त प्रेरक विचार श्रमण संघीय प्रवर्तक पूज्य श्री प्रकाश मुनिजी म.सा. ने रविवार को मोहन टाकीज स्थित श्री सौभाग्य प्रकाश दरबार में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। मालव केसरी पूज्य गुरुदेव सौभाग्यमल जी म.सा. के सुशिष्य एवं रत्नपुरी के रत्न प्रवर्तकश्री ने कहा कि मोह का तार बहुत मजबूत होता है। इसे तोड़ना अत्यंत कठिन है। मनुष्य की आत्मा मोह के ऐसे बंधनों में उलझी रहती है कि कई बार उसे स्वयं भी इसका अहसास नहीं होता। व्यक्ति बाहर से कितना ही निर्मोही दिखाई दे, लेकिन भीतर कहीं न कहीं मोह की गांठ बंधी रहती है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि जो व्यक्ति स्वयं को मोह से दूर बताता है, उसके चेहरे के भाव भी किसी खास भक्त या परिचित व्यक्ति के आने पर बदल जाते हैं। यह बदलाव उसके भीतर छिपे मोह को उजागर कर देता है। इसके विपरीत जंगल में रहने वाले ऐसे संत, जिनका किसी से कोई व्यक्तिगत लगाव या अपेक्षा नहीं होती और जो केवल अपनी साधना में लीन रहते हैं, वे मोह पर विजय प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ते हैं। वास्तविक साधना वही है, जिसमें व्यक्ति बाहरी दिखावे के बजाय अपने भीतर की कमजोरियों को पहचानकर उन्हें दूर करने का प्रयास करे।

मोह कर्मों का राजा, इससे मुक्ति ही साधना का लक्ष्य

प्रवर्तकश्री ने कहा कि मोह कर्मों का राजा होता है। मोह के कारण ही जीव संसार के बंधनों में फंसता चला जाता है। व्यक्ति परिवार, संबंधों, वस्तुओं और परिस्थितियों के प्रति इतनी आसक्ति बना लेता है कि उनसे अलग होने की कल्पना भी उसे कठिन लगती है। मोह की यही पकड़ आत्मा को उसके वास्तविक स्वरूप से दूर रखती है। परमात्मा की स्तुति और आराधना करते हुए जो व्यक्ति स्वयं मोह के बंधनों से मुक्त होता है, वही दूसरों को भी मुक्ति का मार्ग दिखा सकता है।

उन्होंने कहा कि केवल धार्मिक क्रियाएं कर लेना ही साधना की पूर्णता नहीं है, बल्कि साधना का वास्तविक उद्देश्य आत्मा को निर्मल बनाना और मोह-माया से ऊपर उठाना है। जब तक मनुष्य अपने भीतर राग, आसक्ति और अपेक्षाओं को स्थान देता रहेगा, तब तक आत्मिक शांति प्राप्त करना कठिन रहेगा। इसलिए प्रत्येक साधक को अपने भीतर झांककर यह विचार करना चाहिए कि उसकी आत्मा किन बंधनों में उलझी हुई है।

आत्मबल से ही सफल होती है तप आराधना

प्रवर्तकश्री ने तपस्या के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि तप आराधना केवल शारीरिक सामर्थ्य से नहीं, बल्कि आत्मबल से संपन्न होती है। जिस व्यक्ति का आत्मबल दृढ़ होता है, वह विपरीत परिस्थितियों में भी कमजोर नहीं पड़ता। तपस्या के दौरान आने वाली कठिनाइयों का सामना वही साधक कर सकता है, जिसके भीतर दृढ़ संकल्प, संयम और आत्मविश्वास होता है। आत्मबल ही साधक को निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

प्रवचन के आरंभ में सेवाभावी श्री दर्शन मुनिजी म.सा. ने पुच्छिसुणम के जाप करवाए। इसके पश्चात प्रवर्तकश्री ने विभिन्न तपस्वियों को उनकी तपस्या के प्रत्याख्यान करवाए।

इस अवसर पर प्रवचन प्रभाविका श्री सुमनप्रभाजी म.सा. ठाणा-8, महासती श्री चंदनबालाजी म.सा. एवं महासती श्री कल्पनाजी म.सा. मंचासीन रहे। कार्यक्रम का संचालन रखब चत्तर ने किया।

धर्मसभा में श्री धर्मदास जैन श्री संघ, श्री धर्मदास जैन मित्र मंडल ट्रस्ट, श्री सौभाग्य तीर्थ ट्रस्ट, श्री सौभाग्य जैन नवयुवक मंडल, श्री सौभाग्य प्रकाश युवक मंडल, श्री सौभाग्य जैन महिला मंडल, श्री सौभाग्य अणु बहु मंडल तथा श्री सौभाग्य प्रकाश बालक-बालिका मंडल के सदस्यगण सहित बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।

प्रवचन का संदेश: जिस प्रकार युद्ध का योद्धा मैदान छोड़कर नहीं भागता, उसी प्रकार साधक को भी मोह, माया और आसक्ति के विरुद्ध संघर्ष करते हुए आत्मकल्याण के मार्ग पर दृढ़ता से आगे बढ़ना चाहिए।

संकलनकर्ता:- अरुण त्रिपाठी

Dr.Talera's Multi-speciality Dental Clinic, Thandla 





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