विनय से ही ज्ञान की प्राप्ति और कषायों के दमन से आत्मकल्याण संभव : परम् पूज्य श्री गुलाब मुनि म.सा.
उत्तराध्ययन सूत्र के प्रथम अध्ययन में बताया विनय का महत्व, गुरु-शिष्य संबंधों और जैन कथाओं के माध्यम से समझाया आत्मकल्याण का मार्ग
नागपुर, 27 अक्टूबर। धर्मदास संप्रदाय सुमेरु परम पूज्य गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने प्रवचन में कहा कि जिनेश्वर देव ने भव्य जीवों के कल्याण के लिए मोक्ष का मार्ग बताया है। भगवान महावीर की वाणी और उत्तराध्ययन सूत्र में आत्मकल्याण का सार समाहित है। इस आगम का अध्ययन और उसके सिद्धांतों का जीवन में पालन करने से आत्मा का उत्थान संभव है। ज्ञान प्राप्त करने के लिए विनय आवश्यक है, जबकि आत्मकल्याण के लिए कषायों का क्षय और स्वयं के दोषों का दमन करना जरूरी है।
गुरुदेव ने कहा कि आगम में चार अनुयोग बताए गए हैं—द्रव्यानुयोग, गणितानुयोग, चरण-करणानुयोग और धर्मकथानुयोग। धर्मकथानुयोग के माध्यम से अनेक लोग धर्म का बोध प्राप्त करते हैं। जिनवाणी का सार साधकों को साधना का मार्ग दिखाता है। साधु-संतों का आचरण स्वयं में एक व्याख्यान है, क्योंकि उनके जीवन और व्यवहार से धर्म को गहराई से समझा जा सकता है।
विनय से ही ज्ञान की प्राप्ति
गुरुदेव ने उत्तराध्ययन सूत्र के प्रथम अध्ययन का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें विनय का महत्व बताया गया है। जिस प्रकार कुएं से पानी निकालने के लिए बाल्टी को नीचे झुकाना पड़ता है, उसी प्रकार ज्ञान प्राप्त करने के लिए मनुष्य को विनम्र बनना पड़ता है। जब तक जीवन में विनय नहीं आएगा, तब तक ज्ञान की वास्तविक प्राप्ति नहीं हो सकती। विनय ही ज्ञान वृद्धि का आधार है।
उन्होंने कहा कि प्राचीन समय में गुरुकुल शिक्षा के प्रमुख केंद्र हुआ करते थे, जहां गुरु विद्यार्थियों को विभिन्न कलाओं और जीवनोपयोगी विद्याओं में निपुण बनाते थे। समय के साथ परिस्थितियां बदलीं और शिक्षा पद्धति में भी परिवर्तन आया, लेकिन ज्ञान प्राप्त करने के लिए विनय का महत्व आज भी उतना ही है।
गुरुदेव ने संथारा के प्रसंग के माध्यम से समझाया कि केवल शारीरिक तपस्या कर लेना पर्याप्त नहीं है। एक शिष्य बार-बार अपने गुरु से संथारा के प्रत्याख्यान करवाने का आग्रह करता था, लेकिन गुरु उसे समय आने की बात कहकर रोक देते थे। शिष्य तपस्या करता रहा, लेकिन उसके मन में क्रोध और नाराजगी बनी रही। जब गुरु ने उसकी स्थिति को समझाया तो स्पष्ट किया कि जब तक कषाय कम नहीं होंगे, तब तक आत्मकल्याण की दिशा में पूर्ण प्रगति नहीं हो सकती। तपस्या के साथ कषायों को कृश करना और मन को निर्मल बनाना भी आवश्यक है।
साधु जीवन में अपरिग्रह और अनासक्ति का महत्व
अणगार शब्द का अर्थ समझाते हुए उन्होंने कहा कि जिनका अपना कोई घर या आश्रम नहीं होता और जो भिक्षा से आजीविका चलाते हैं, वे अणगार कहलाते हैं। उन्होंने भिक्षु और भिखारी के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि भिक्षु विनयपूर्वक भिक्षा ग्रहण करता है, जबकि केवल मांगने की प्रवृत्ति अलग भाव है।
गुरुदेव ने कहा कि जहां संयोग है, वहां वियोग भी निश्चित है। संयोग दो प्रकार के होते हैं—बाह्य और आंतरिक। परिवार, माता-पिता, पुत्र-पुत्री और रिश्तेदार बाह्य संयोग हैं, जबकि राग-द्वेष और कषाय आंतरिक संयोग हैं। इनसे अनासक्त हुए बिना आत्मसाधना की वास्तविक स्थिति प्राप्त करना कठिन है।
उन्होंने कहा कि संसार में जरूरत से ज्यादा परिचय और परिग्रह अनेक परेशानियों का कारण बनते हैं। लोग भविष्य में काम आने की आशा से बड़े अधिकारियों, नेताओं और प्रभावशाली व्यक्तियों से संबंध बनाते हैं, लेकिन ऐसे संबंध हमेशा उपयोगी हों, यह जरूरी नहीं है। कई बार यही संबंध नई उलझनें खड़ी कर देते हैं। इसलिए जीवन में आवश्यकता के अनुरूप ही परिचय और परिग्रह रखना चाहिए।
गुरुदेव ने साधु जीवन की अनासक्ति को स्पष्ट करते हुए कहा कि साधु जहां रहते हैं, वहां धर्म और कर्तव्य के अनुसार व्यवहार करते हैं, लेकिन वहां से विहार करने के बाद उस स्थान और व्यक्तियों के प्रति मोह नहीं रखते। गृहस्थों को भी संबंध निभाते हुए उनमें अत्यधिक आसक्ति से बचना चाहिए।
संसार के संबंधों में उलझने से बढ़ता है दुख
सुभग और सुनंद नामक दो मित्रों की कथा सुनाते हुए गुरुदेव ने बताया कि दोनों संपन्न और बुद्धिमान थे। उनकी मित्रता इतनी गहरी हुई कि उन्होंने अपने होने वाले बच्चों के विवाह का संबंध भी गर्भावस्था में ही तय कर दिया। संयोग से सुभग के यहां पुत्र हुआ, जिसका नाम सुधन रखा गया।
सुधन को अपने पिता से अपार संपत्ति मिली। वह ऐश्वर्य और भोग-विलास में जीवन बिताने लगा। उसके देव मित्र ने उसे इस प्रकार संसार में उलझा देखकर चिंता की और उसे वैराग्य की ओर प्रेरित करने के लिए ऐसी परिस्थिति उत्पन्न की, जिससे उसका वैभव समाप्त हो गया।
निर्धन होने पर सुधन अपने पिता के मित्र के पास पहुंचा। वहां उसे अपने जीवन से जुड़ा पुराना संबंध ज्ञात हुआ। पिता के मित्र ने उसे अपनी पुत्री से विवाह का प्रस्ताव दिया, लेकिन सुधन के मन में संसार के प्रति वैराग्य जाग गया। उसने सांसारिक सुख-सुविधाओं के बजाय आत्मकल्याण का मार्ग चुनने का निश्चय किया।
इस कथा के माध्यम से गुरुदेव ने कहा कि संसार के संबंधों को स्थायी बनाने और उनमें अत्यधिक उलझने का प्रयास मनुष्य को संसार में ही बांधे रखता है। सबके साथ रहकर भी अनासक्त रहना, सभी से प्रेम करना, लेकिन मोह में नहीं बंधना ही आत्मसाधना का महत्वपूर्ण सूत्र है।
विनयहीन शिष्य को नहीं मिलता सम्मान
गुरुदेव ने सूअर के उदाहरण के माध्यम से समझाया कि जीव कई बार श्रेष्ठ गुणों को छोड़कर अपनी बुरी प्रवृत्तियों में ही उलझा रहता है। जिस प्रकार सूअर स्वभाववश गंदगी की ओर आकर्षित होता है, उसी प्रकार अविवेकी जीव सद्गुणों को अपनाने के बजाय राग-द्वेष और कषायों में फंसा रहता है।
उन्होंने कहा कि विनयहीन शिष्य को कहीं भी उचित स्थान नहीं मिलता। जो व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों को सहन करना सीखता है, वही विनय धर्म की आराधना कर सकता है। हर समय और हर परिस्थिति अनुकूल नहीं होती। प्रत्येक जीव के कर्मों का उदय, संस्कार और कषाय अलग-अलग होते हैं। इसलिए जीवन में धैर्य और सहनशीलता आवश्यक है।
गुरुदेव ने कहा कि परिस्थिति से भागना नहीं, बल्कि उसमें समन्वय स्थापित करना और स्वयं को उसके अनुरूप ढालना सीखना चाहिए। कर्मों से बचने के लिए स्थान बदल लेना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि व्यक्ति ट्रेन से यात्रा करता है, लेकिन उसके कर्म मानो प्लेन से चलते हैं और उससे पहले ही पहुंच जाते हैं। आशय यह है कि कर्मों के फल से बचने के बजाय समता और संयम के साथ उनका सामना करना चाहिए।
गुरु के प्रति विनय से प्राप्त हुआ केवलज्ञान
गुरुदेव ने चंद्ररुद्राचार्य और उनके शिष्य का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि शिष्य ने गुरु के प्रति विनय और सेवा का ऐसा भाव रखा कि विवाह के बाद घर पहुंचने से पहले ही उसने दीक्षा ग्रहण कर ली। वह अपने गुरु को कंधे पर लेकर विहार कर रहा था। मार्ग कठिन और ऊबड़-खाबड़ था, फिर भी उसके मन में यही भावना थी कि गुरु को असाता न पहुंचे।
गुरु ने मार्ग की कठिनाइयों के दौरान उसे डांटा और मारा भी, लेकिन शिष्य के मन में उनके प्रति कोई द्वेष उत्पन्न नहीं हुआ। वह सेवा और विनय के भाव में स्थिर रहा। इसी निर्मल भाव के परिणामस्वरूप उसे केवलज्ञान प्राप्त हुआ। जब गुरु को इसका पता चला तो उन्हें अपने व्यवहार पर पश्चाताप हुआ और उन्होंने भी अपने दोष का गहन चिंतन किया।
इसी प्रकार बाहुबली भगवान के प्रसंग का उल्लेख करते हुए गुरुदेव ने कहा कि मान का त्याग और विनय का स्वीकार आत्मकल्याण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। मनुष्य को अपने अहंकार का दमन करना चाहिए, क्योंकि अहंकार छोड़कर झुकना ही आत्मा की उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है।
कर्मों के उदय से कोई नहीं बच सकता
गुरुदेव ने राजा श्रेणिक और उनके पुत्र कोणिक के प्रसंग के माध्यम से कर्मों की गति समझाई। उन्होंने बताया कि राजा श्रेणिक ने अपने पुत्र के प्रति गहरा वात्सल्य रखा और उसके कष्ट दूर करने के लिए हर संभव प्रयास किया, लेकिन आगे चलकर उसी पुत्र ने उन्हें बंदी बना लिया और अनेक कष्ट दिए।
इस प्रसंग के माध्यम से उन्होंने समझाया कि संसार में पद, प्रतिष्ठा, धन और पारिवारिक संबंध होने के बावजूद जीव को अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता है। इसलिए मनुष्य को अपने वर्तमान व्यवहार और भावों के प्रति सजग रहना चाहिए। किसी के प्रति द्वेष रखने के बजाय अपने कर्मों को सुधारने पर ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि दूसरों की गलतियां खोजने और उन्हें बताने में समय गंवाने के बजाय अपनी गलतियों को पहचानना चाहिए। यदि किसी की भूल दिखाई दे तो तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय विवेक और संयम से काम लेना चाहिए। दूसरों की भूलों को क्षमा करना और अपनी भूलों को याद रखकर उनमें सुधार करना ही सच्चे धर्म का लक्षण है।
आत्मदमन से मिलती है आंतरिक शांति
गुरुदेव ने कहा कि स्वयं के दोषों का दमन करना कठिन जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। आत्मदमन का अर्थ अपनी गलतियों को स्वीकार करना, अहंकार छोड़ना और कषायों पर नियंत्रण रखना है। समझ के बिना की गई उपासना मनुष्य को गलत दिशा में भी ले जा सकती है, इसलिए धर्म का आचरण विवेकपूर्वक करना चाहिए।
उन्होंने समझाया कि किसी व्यक्ति की कही हुई बात से हमें तभी अधिक अशांति होती है, जब हम उसे अपने अहंकार से जोड़कर ग्रहण कर लेते हैं। यदि हम हर बात पर प्रतिक्रिया देने लगें तो मन में बैर और द्वेष बढ़ता है। इसलिए अपमानजनक परिस्थितियों में भी संयम बनाए रखना चाहिए और अपने भावों को दूषित नहीं होने देना चाहिए।
गुरुदेव ने कहा कि शिष्य का शांत और विनम्र व्यवहार क्रोधी गुरु को भी शांत कर सकता है। विनय केवल दूसरों के सामने झुकने का नाम नहीं है, बल्कि अपने अहंकार, क्रोध और गलत प्रवृत्तियों पर नियंत्रण पाने की साधना है।
प्रवचन के समापन पर उन्होंने कहा कि जीवन में क्षमा, विनय, सहनशीलता और आत्मचिंतन को स्थान देना चाहिए। दूसरों के दोष देखने के बजाय स्वयं के दोषों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। संसार में रहते हुए भी मोह और आसक्ति से बचना चाहिए, क्योंकि अधिक परिचय और परिग्रह दुख का कारण बनते हैं।
गुरुदेव ने संदेश दिया कि आत्मकल्याण के लिए विनय को अपनाएं, कषायों का दमन करें, परिस्थितियों से पलायन करने के बजाय समभाव से उनका सामना करें और आवश्यकता पड़ने पर अहंकार छोड़कर झुकने में संकोच न करें। यदि झुकने से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है, तो झुक जाना ही श्रेष्ठ है।
Dr.Talera's Multi-speciality Dental Clinic, Thandla




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