अनावश्यक देखना, सुनना और बोलना आत्मा के लिए अहितकर, निंदा से बचकर करें समय का सदुपयोग : परम् पूज्य श्री गुलाब मुनिजी म.सा.
नागपुर, 13 अक्टूबर। धर्मदास संप्रदाय सुमेरु परम पूज्य गुरुदेव श्री गुलाब मुनिजी म.सा. ने प्रवचन में कहा कि भगवान महावीर ने अपने अनुभव के आधार पर जीवों के कल्याण के लिए मोक्ष का मार्ग बताया है। सम्यक बोध के अभाव में जीव अनंत काल से दुखी हो रहा है और शांति व समाधि से दूर होता जा रहा है। कर्म बंध के कारण जीव विषय और कषाय में उलझा रहता है। विषयों की पूर्ति नहीं होने पर कषाय उत्पन्न होते हैं। अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए माया, मान और अन्य विकार जन्म लेते हैं। इनसे बचने के लिए आत्मचिंतन, विवेक और सम्यक ज्ञान आवश्यक है।
गुरुदेव ने कहा कि अनावश्यक सुनना भी कषाय का कारण बनता है। इतिहास में प्रसन्नचंद्र राजा और कैकेयी जैसे उदाहरण मिलते हैं। वर्तमान में भी घर-परिवार, संघ और समाज में लोग एक-दूसरे की बुराई और चुगली में लगे रहते हैं। हर कोई अपनी बात को सही साबित करने में जुटा रहता है और सुनने वाले भी इन बातों में उलझ जाते हैं। उन्होंने कहा कि भोजन के रस से भी अधिक आनंद कई बार निंदा के रस में आने लगता है। किसी की निंदा शुरू होने पर समय का पता ही नहीं चलता। कभी-कभी पूरी रात दूसरों की बुराई करने में निकल जाती है। इस प्रकार निंदा करने और सुनने से जीव अपने अनंत भव बिगाड़ लेता है। इसलिए अनावश्यक देखने, बोलने और सुनने से बचना चाहिए।
इंद्रियों का सदुपयोग करें, समय व्यर्थ न गंवाएं
गुरुदेव ने कहा कि आंखों और कानों का उपयोग विवेकपूर्वक करना चाहिए। टीवी और मोबाइल पर अनावश्यक सामग्री देखकर बहुमूल्य समय बर्बाद करना उचित नहीं है। यदि देखना और सुनना ही है तो जिनवाणी सुनें, देव-गुरु के दर्शन करें तथा अच्छे साहित्य और सूत्रों का अध्ययन करें। पांचों इंद्रियां सहज ही नहीं मिली हैं, इनका सदुपयोग करना चाहिए। असंज्ञी जीव में मन नहीं होने से वह सुनकर भी बातों को समझ नहीं पाता, जबकि मनुष्य को मन मिला है। इसलिए विचार करना चाहिए कि उसका उपयोग शुभ विचारों में हो रहा है या अशुभ विचारों में।
मन को बिना लगाम का घोड़ा बताते हुए उन्होंने कहा कि व्यक्ति सामायिक में बैठा होता है, लेकिन उसका मन कहीं और घूम रहा होता है। उन्होंने एक सेठ का प्रसंग सुनाया, जो सामायिक कर रहे थे। घर में किसी के आने पर बहू ने कह दिया कि सेठजी किराना दुकान पर गए हैं। दूसरी बार किसी के आने पर उसने कहा कि सेठजी मोची के पास गए हैं। सेठजी सामायिक में बैठे-बैठे यह सब सुन रहे थे और बहू के झूठ बोलने पर मन ही मन विचार कर रहे थे।
सामायिक पूरी होने पर उन्होंने बहू से पूछा कि उसने झूठ क्यों बोला। बहू ने कहा कि जब घर का सामान लाने की बात हुई थी, तब आपका मन किराना दुकान तक पहुंच गया था और चप्पल टूटने की बात पर आपका मन मोची के पास चला गया था। आप शरीर से यहां बैठे थे, लेकिन मन दूसरी जगह घूम रहा था।
गुरुदेव ने इस प्रसंग के माध्यम से समझाया कि व्यक्ति को अपने मन की गतिविधियों पर ध्यान देना चाहिए। धार्मिक क्रिया के दौरान भी मन विषयों के चिंतन में लगा रहता है, जिससे कर्म बंध होता है। इसलिए मन को साधना और शुभ चिंतन में लगाना आवश्यक है।
प्रतिकूल परिस्थितियों को स्वीकार करना सीखें
गुरुदेव ने कहा कि जीवन में आने वाली प्रतिकूल परिस्थितियों को समझदारी से स्वीकार करना चाहिए। यदि कहीं दुर्गंध आ रही है तो नाक पर कपड़ा बांधकर बचाव किया जा सकता है, लेकिन बार-बार शिकायत और निंदा करके नए कर्म क्यों बांधना? अपने कर्मों के उदय के कारण ही व्यक्ति को विभिन्न परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। जो है, उसे स्वीकार करते हुए विवेकपूर्ण उपाय करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जैन दर्शन में कर्मों के सिद्धांत को समझना जरूरी है। दूसरों की बुराई करने और सुनने की प्रवृत्ति आत्मा के लिए अहितकर है। इसलिए समय मिलने पर स्वाध्याय करें, कुछ नया सीखें और आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ें।
एक दुकानदार का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि एक व्यक्ति ने दुकान का काम जल्दी समाप्त किया और सोचा कि आज घर जाकर आराम करेगा। दुकान बंद कर घर के लिए निकला तो रास्ते में कुछ गप्पें मारने वाले लोग मिल गए। वह उनके साथ बातचीत में ऐसा उलझा कि दो-चार घंटे कब निकल गए, पता ही नहीं चला। आराम करने की उसकी योजना धरी रह गई। गुरुदेव ने कहा कि जीव भी इसी प्रकार अनावश्यक बातों में अपना समय गंवाता है और जाने-अनजाने कर्म बंध करता रहता है।
अनावश्यक बोलने से बचें, वाणी का विवेक रखें
गुरुदेव ने कहा कि कान दो हैं, लेकिन सुनने का विवेक एक होना चाहिए। आंखें दो हैं, लेकिन देखने में विवेक रखना जरूरी है। जीभ एक है, लेकिन उसके दो प्रमुख कार्य हैं—बोलना और भोजन करना। इसलिए वाणी का उपयोग सोच-समझकर करना चाहिए। महाभारत के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अनावश्यक वचन भी बड़े विवाद का कारण बन सकते हैं। बोलने से पहले विचार करना चाहिए कि हमारी बात से किसी को दुख तो नहीं पहुंचेगा।
उन्होंने कहा कि कोई व्यक्ति लंबे समय बाद स्थानक में आए तो उसका स्वागत करने के बजाय यह कहना कि आज सूरज कहां से निकला या रास्ता भूल गए क्या, उचित नहीं है। ऐसे व्यंग्य से व्यक्ति का मन दुखी हो सकता है और वह दोबारा धर्मस्थान आने से भी हिचक सकता है। इससे धर्म के प्रति उसकी रुचि प्रभावित होती है। हर व्यक्ति की परिस्थितियां उसके अपने कर्मों के उदय से जुड़ी होती हैं। इसलिए किसी को ऊंचा-नीचा बोलने या अपमानित करने से बचना चाहिए।
गुरुदेव ने समझाया कि किसी की शारीरिक कमी या कमजोरी का मजाक उड़ाना भी अनुचित है। किसी को बहरा, अंधा, मूर्ख या पागल कहकर अपमानित करना उसके उत्साह को तोड़ सकता है। अनावश्यक वाणी के दुष्परिणामों पर विचार करते हुए उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपने शब्दों की मर्यादा समझनी चाहिए। वाणी का दुरुपयोग स्वयं के लिए भी अहितकर बन सकता है।
आज का कमजोर विद्यार्थी कल बन सकता है अव्वल
गुरुदेव ने एक विद्यार्थी का उदाहरण दिया, जिसे लेखांकन विषय में एटीकेटी मिली थी। उसने मेहनत और लगन से पढ़ाई की तथा अगली परीक्षा में पूरे राज्य में प्रथम स्थान प्राप्त किया। इसके बाद उसने निःशुल्क कक्षाएं शुरू कीं और नाइट स्कूल में विद्यार्थियों को पढ़ाने लगा।
इस प्रसंग से उन्होंने समझाया कि किसी व्यक्ति के जीवन में कब और कैसा परिवर्तन आ जाए, यह कहा नहीं जा सकता। जो आज कमजोर दिखाई दे रहा है, वह कल अपनी मेहनत से आगे बढ़ सकता है। इसलिए किसी का मजाक उड़ाने, ताने मारने या उसे निरुत्साहित करने के बजाय प्रोत्साहित करना चाहिए। अनावश्यक मजाक और कटु वचन कई बार गंभीर कर्म बंध का कारण बनते हैं।
उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति अकेला होता है तो अपनी चिंताओं में उलझा रहता है और जब दो-चार लोग मिल जाते हैं तो दूसरों की बुराई शुरू हो जाती है। हंसी-मजाक में भी जीव अनजाने में कर्म बांध लेता है। इसलिए विशेष रूप से मजाकिया स्वभाव वाले लोगों को अपनी वाणी पर नियंत्रण रखना चाहिए। गुरुदेव ने कहा कि सर्दी हो या धूप सबसे बड़ी चुप, सभी परिस्थितियों में सबसे बड़ा गुण मौन और वाणी का संयम है।
इच्छाओं के पीछे भागने से नहीं मिलेगी वास्तविक शांति
गुरुदेव ने आधुनिक जीवनशैली में सुगंधित पदार्थों और परफ्यूम के प्रति बढ़ते आकर्षण का उल्लेख करते हुए कहा कि बाहरी सुगंध के प्रति अत्यधिक मोह भी आसक्ति का उदाहरण है। उन्होंने परफ्यूम निर्माण में पशुओं के शोषण से जुड़ी बातों का उल्लेख कर श्रोताओं को अनावश्यक उपभोग और मोह से बचने की प्रेरणा दी।
सांप का सुगंधित केतकी, केवड़ा और चंदन के वृक्षों से लिपटे रहने का उदाहरण देते हुए उन्होंने समझाया कि आकर्षण के कारण जीव कई बार कष्ट सहने के बावजूद अपनी आसक्ति नहीं छोड़ता। इसी प्रकार मनुष्य भी विषयों और इच्छाओं के मोह में फंसकर अपने विवेक को खो देता है। इसलिए अनावश्यक इच्छाओं और आकर्षणों से दूरी बनाना जरूरी है।
भोजन में संयम और वाणी में मर्यादा जरूरी
गुरुदेव ने कहा कि शरीर को स्वस्थ रखने के लिए केवल स्वाद के अनुसार भोजन करना उचित नहीं है। भोजन उतना ही ग्रहण करना चाहिए, जितना शरीर के पोषण के लिए आवश्यक हो। इसी प्रकार मन को स्वस्थ रखने के लिए अनावश्यक बोलने से बचना चाहिए।
उन्होंने एक भाई-बहन का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि यात्रा के दौरान दुर्घटनावश चोट लगने के बाद बहन के मुंह का स्वाद चला गया। इस उदाहरण के माध्यम से उन्होंने समझाया कि जीभ को स्वाद का आनंद मिल सकता है, लेकिन अत्यधिक या अनुचित भोजन से शरीर को परेशानी भी हो सकती है। इसलिए भोजन में विवेक और संयम रखना चाहिए।
उन्होंने कहा कि भोजन का चयन शरीर की आवश्यकता के अनुसार करें और वाणी का प्रयोग परिस्थिति व अवसर के अनुसार करें। स्वाद के लिए जरूरत से ज्यादा खाना और बिना सोचे-समझे बोलना, दोनों ही परेशानी का कारण बन सकते हैं।
धर्मस्थान की मर्यादा के अनुसार पहनें वस्त्र
गुरुदेव ने कहा कि वर्तमान समय में देखा-देखी की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। लोग कई बार स्थान और अवसर का विचार किए बिना वस्त्र पहन लेते हैं। धर्मस्थान में धर्म की गरिमा और मर्यादा के अनुरूप वस्त्र धारण करना चाहिए। वहां अंग-प्रदर्शन के बजाय शालीनता और सादगी का ध्यान रखना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि कहां जाना है और वहां किस प्रकार के वस्त्र पहनने चाहिए, इसका विवेक होना चाहिए। धर्मस्थान पर बालों को व्यवस्थित बांधकर आना और धार्मिक वातावरण के अनुरूप आचरण करना भी मर्यादा का हिस्सा है। बाहरी दिखावे और देखा-देखी में बहने के बजाय व्यक्ति को अपने आचरण में संयम रखना चाहिए।
वस्त्रों की मर्यादा समझाने के लिए उन्होंने अमेरिका में एक युवती के साथ हुए अपराध और उससे संबंधित न्यायालय के एक कथित प्रसंग का उल्लेख किया। इस प्रसंग के माध्यम से उन्होंने शालीन वस्त्र पहनने पर जोर दिया। हालांकि, किसी भी प्रकार के यौन अपराध के लिए जिम्मेदारी अपराध करने वाले व्यक्ति की ही होती है; किसी के वस्त्र ऐसे अपराध को उचित नहीं ठहराते। गुरुदेव के प्रवचन का व्यापक संदेश अवसर के अनुरूप वस्त्रों का चयन करने और धार्मिक स्थलों की मर्यादा बनाए रखने से संबंधित था।
उन्होंने कहा कि अनावश्यक देखना, सुनना और बोलना छोड़कर व्यक्ति को अपने समय का सदुपयोग करना चाहिए। मन, वचन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखकर ही आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।
गुरुदेव ने अंत में प्रेरणा दी कि जीवन में संयम, स्वाध्याय, मौन, विवेक और सम्यक बोध को स्थान दें। दूसरों की निंदा करने और अनावश्यक बातों में समय गंवाने के बजाय आत्मचिंतन करें, क्योंकि इंद्रियों का सदुपयोग और कषायों पर नियंत्रण ही शांति, समाधि और मोक्ष मार्ग की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।




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